शनिवार, 26 जुलाई 2014

मौलाना सलमान हुसैनी नदवी और आतंकवाद एक नज़र

मौलाना सलमान हुसैनी नदवी और आतंकवाद एक नज़र 


नाम मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी यकायक चर्चा का विषय बन गये आखिर कौन है मौलाना नदवी। मौलाना नदवी भारत के प्रतिष्ठा इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम नदवा, लखनऊ, में शरीयत के संकाय के डीन है जाहिर है की वह इस्लामी सर्किल में एक प्रभावशाली धर्मशास्त्री और उर्दू और अरबी में अनेक धार्मिक पुस्तको के लेखक प्रचण्ड विद्वान, एक बड़ा नाम। यह बताना गलत होगा की मौलाना सलमान हुसैनी नदवी सुन्नी मत के नामचीन वेदान्ती है। दारुल उलूम नदवा, लखनऊ, का स्थान दारुल उलूम, देवबंद के समकक्ष है। इसके अलावा मौलाना ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की अदालत, अपने उच्चतम निर्णय लेने वाली संस्था के एक सदस्य है।

हालिया दिनों में मौलाना सैयद सलमान का सऊदी सरकार को लिखा अरबी में एक भावुक पत्र चर्चा का विषय बना हुआ है और उस पत्र के माद्यम से मौलाना ने इस बात की इच्छा जताई है की वह सऊदी सरकार को भेट स्वरुप ५००००० भारतीय सुन्नी युवा मुसलमानो का एक मिलिशिया देना चाहते है जो "शक्तिशाली वैश्विक इस्लामी सेना" का हिस्सा होंगे तथा जो ईराक़ में शिया मुसलमानो के ख़िलाफ़ तथाकथित ख़लीफ़ा बग़दादी की मदद करेंगे। मौलाना के द्वारा लिखे पत्र से भारत के मुसलमानो यहां तक ​​कि रूढ़िवादी मुसलमानों को झटका लगा है।

विद्वान मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी का मत है है की यह इनको आतंकी कहना गलत होगा तथा यह ग्रुप भविष्य में वह  एकल "शक्तिशाली वैश्विक शक्ति" में खुद को बदल सकता है और सभी जिहादी संगठनों की 'परिसंघ "एक के लिए बुलाया गया और नेक काम"' है का सुझाव दिया। 

इससे पहले, मौलाना नदवी ने अबू बकर अल बगदादी, कुख्यात सुन्नी आतंकवादी गुट इराक और सीरिया (आईएसआईएस) के इस्लामी राज्य और वह इराक सीरिया सीमा पर स्थापित करने की बधाई दी और 'खलीफा' को मान्यता दी है। अबू बकर अल बगदादी ने इराक में हज़ारो मुसलमानो को क़त्ल किया इस्लामिक और ईसाई महत्व की इमारतों को नेस्तनाबूद करने तथा शरीयत प्रशासन लागू कर झेत्र में भय का पर्याय बना हुआ है। हालिया फ़तवे के माद्यम से बगदादी हुकूमत ने छेत्र में रहने वाली महिलाओ को ख़तना करवाने का हुकूम जारी किया है।


नदवी ने बगदादी को मुबारकबाद दे कर और 'खलीफा' को मान्यता देकर वे ऐसा करने वाले पहले एशियाई धर्मशास्त्री है। ऐसा में नदवी ने वैश्विक इस्लामीकरण प्रवृत्ति को ललकारा है और युवा भारतीय मुसलमानों की बढ़ती कट्टरता को प्रोत्साहित किया जो चिंता का विषय है। मुस्लिम मिलिशिया जुटाने के उनके प्रस्ताव जो विदेशी भूमि पर लड़ने हेतु भारतीय सुन्नी मुस्लिम युवा को प्रेरित करता है, जिससे सामान्य रूप से भारतीय मुस्लिम क्वार्टर में एक हलचल पैदा कर दी है। इसके परिणाम स्वरुप मुंबई के चार शिक्षित मध्यम वर्ग मुस्लिम लड़कों (दो इंजीनियरिंग छात्रों, एक मेडिकल छात्र, और एक कॉल सेंटर की कर्मचारी) इराक और सीरिया में एक शातिर सांप्रदायिक युद्ध ज़िहाद में शामिल होने हेतु अपने देश से भाग गए हैं और अपने माता-पिता को यह सन्देश भेजा है की अब उनसे उनकी मुलाकात जन्नत में होगी। इस प्रकार के सन्देश प्रसारित होने से भारतीय सुन्नी मुस्लिम युवा जो वहाबी विचारधारा के पोषक है उनमे आतंकी गतिविधि में शामिल होने की होड़ लगने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह भी सवाल उठना शुरू हो गया है की क्या सुन्नी - वहाबी विचारधारा पोषक युवा पाकिस्तानी युवाओं के रास्ते जा रहे हैं। नदवी का बेतुका प्रस्ताव और सऊदी अरब सरकार को अरबी में लिखा गया पत्र भारत में सक्रीय विभिन्न इस्लामिक चरमपंथियों के किये उत्साहवर्धक सन्देश है और उनको उनके मिशन के प्रति उत्साहित करने वाला कदम। अब समय गया है की मुसलमानो को यह तय करना होगा की वह वहाबी विचारधारा उनके और उनके परिवार के लिए घातक है या नहीं तथा वहाबी विचारधारा इस्लामिक मूल विचारधारा से किस प्रकार भिन्न है, अब हिंदुस्तानी मुसलमानो को दो श्रेढ़ी में विभाजित करना भी आवश्यक होगा . वहाबी विचारधारा का पोषक . गैर-वहाबी अन्यथा सारे मुसलमानो पर आतंकी या आंतकवाद के लेबल लगने से बचाया जा सके। यह भी ज़रूरी होगा की मौलाना नदवी को मुस्लिम युवाओं कट्टरपंथी में लगे हुए उग्रवादी तत्वों को प्रोत्साहित / आतंक भड़काने के खिलाफ भारतीय कानून तोड़ा है तथा उनके आचरण की उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिये और भारितीय दंडसहिता के अन्तर्गत आंतकवाद को प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न धाराओ में मुकदमा कायम होना चाहिये। मौजूदा सरकार की चुप्पी पुरे मामले को और रहस्यमय बना रही है।

रविवार, 20 जुलाई 2014

भाजपा का चाल चरित्र और चेहरा सामने आ चूका है। अमित शाह बीजेपी के नए अध्यक्ष बन गए हैं, जिसको साहेब की वफ़ादारी के इनाम के रूप में देखा जा रहा है। नरेंद्र मोदी ने अमित शाह के भाजपा का अध्यक्ष बनाकर साफ़ कर दिया है अब पार्टी हिंदुत्व की जमीन का प्रसार और विस्तार करेगी। विकास का भ्रम अब टूटता नजर आ रहा है अमित शाह अब सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं समूचे देश की अमन पसंद जनता के लिए चुनौती बन गए हैं, यह आशंका गैर भाजपा दलों की हैं उत्तर प्रदेश इसकी प्रयोगशाला होगी और सफल होने की स्थिति में यही प्रयोग देश के दूसरे प्रदेशो में क्रियान्वित होगा ऐसी आशंका जताई जा रही है। वे किसी राष्ट्रीय पार्टी के पहले ऐसे अध्यक्ष होंगे जिन पर हत्या/ मुठभेड़ से लेकर किसी महिला की जासूसी का आरोप चस्पां हो। नरेन्द्र मोदी ने सरकार के साथ पार्टी संगठन पर अब पूरी तरह कब्ज़ा जमा लिया है। उत्तर प्रदेश में मजहबी गोलबंदी और पार्लीमेंट्री इलेक्शन की सफलता का ईनाम अमित शाह बीजेपी का राष्ट्रिय अध्यक्ष के रूप में मिल गया है। उत्तर प्रदेश में जो किया और जो काम जारी है, उससे कोई भी अनभिज्ञ नहीं है और वह मौजूदा राज्य सरकार के लिये तो चुनौती बना ही हुआ था अब इसका दायरा राष्ट्रीय हो गया है। अब पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण तक की जिम्मेदारी उनके कंधो पर आ गई है।

लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के निर्देश पर गुजरात के दागी नेता अमित शाह को जब उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाकर भेजा था तभी कई दलों ने आशंका जताई थी कि अब उत्तर प्रदेश में दंगों की जमीन तैयार हो जाएगी। और यह आशंका मुजफ्फरनगर से सच साबित हुई। बीच चुनाव में अमित शाह ने शामली में वोट से हिसाब बराबर करने का जब एलान किया तो चुनाव आयोग समेत सभी इनकी इस राजनैतिक प्रतिभा के कायल हो गए। उत्तर प्रदेश में पश्चिम से से जिस मजहबी गोलबंदी की शुरुआत अमित शाह के आने के बाद हुई उसका असर पूर्वांचल तक गया। जमीन अमित शाह ने तैयार की तो मोदी ने नर्म हिंदुत्व की फसल को ढंग से काटा।

एक खबर में कहा गया है कि जुलाई (2013) में सीबीआई द्वारा अदालत में पेश की गई चार्जशीट में गुजरात के 7 पुलिस अफसरों के नाम शामिल किए गए थे। इन पर फर्जी मुठभेड़ के साथ यह भी आरोप लगाया गया था कि इशरत व उसके तीन साथियों की हत्या के बाद इन्होंने ही कार में एके-47 रायफल रख दी थी, जिससे कि इन्हें आतंकी बताया जा सके। चार्जशीट में यह भी कहा गया था कि इस रायफल की व्यवस्था राजेंद्र कुमार ने की थी और इसकी जानकारी अमित शाह को थी। तुलसीराम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ समेत ऐसे कई और मामले अमित शाह पर हैं। अब ये अमित शाह चाल चरित्र और चेहरा की बात करने वाली पार्टी के मुखिया बन गए हैं।

मौजूदा हालात और बदलते राजनैतिक परिपेक्छ में यह नज़्म बिल्कुल सटिक बैठती है -

हम काफिरों को बक्श दे रहमत मेरे ख़ुदा !
आ दिल में बस,तू छोड़ दे जन्नत मेरे ख़ुदा !

हर लम्हा सुर्ख है यहाँ इन्सां के खून से
क्यों सिरफिरों को बख्श दी ताक़त मेरे ख़ुदा


अल - सऊद का यहूदी कनेक्शन

आज हम इस्लामी इतिहास के हवाले से यह समझाने की कोशिश करे गे की और कैसे इस्लामिक पवित्र स्थानों को अब्द अल वहाब और इस्लामी ख़लीफ़ा ने नष्ट करने की साज़िश की और सऊद परिवार की इसमें क्या भूमिका थी जो ब्रिटिश सरकार के सैन्य समर्थन के द्वारा बनाई गई एक सलफ़ी उन्माद की पीठ पर नज्दी सामंती प्रभुओं सऊद परिवार के द्वारा कब्जा किया गया। 

इतिहासकारों की माने तो सऊद १४५० ई. के आसपास नज्द में बसे थे और वह अन्ज़ा जनजाति के थे और मूल रूप से यहूदियों धर्म के माननेवाले चतुर सामंती प्रभुओं में थे। किंग फैसल (१९०६-१९७५) जिसने अरब पर १९६४ - १९७५ के बीच शासन किया और अपने यहूदी मूल के होने की पुष्टि की। सितम्बर १७, १९६९ को वाशिंगटन पोस्ट को दिए एक साक्षात्कार में, किंग फैसल ने कहा की "हम सऊदी परिवार यहूदियों के चचेरे भाई हैं" किंग फैसल बयान की व्याख्या का आधार समझने के लिये यह जानना आवश्यक होगा की यहूदियों के पैगंबर इसहाक वंश (علیھ السلا م) के हैं और अरबों के पैगंबर इस्माइल के वंशज (علیھ السلا م) होते हैं, इस तरह वे रिश्ते में चचेरे भाई हुए।
पैगंबर मोहम्मद के आगमन के समय (صلى الله عليه و آله وسلم) काबा बुतपरस्त मूर्ति भक्तों के कब्जे में था और इतिहासकारो के अनुसार ३६० मूर्तियों की पूजा सम्पन होती थी जो काबा के चारो ओर स्थित थी ऐसी ही स्तिथि आज भी है काबा के चारो और भव्य इमारते होटल और मॉल मौजूद है। सलफ़ी / वहाबी हुकूमत के पश्चात अपने को ईश्वर का आदर्श भग्त कहने वाले वहाबियों ने मूर्ति पूजा और क़ुरान की हदीसो को धता बता कर क़ुरान और अल्लाह को ही अपना सिद्धांत माना। १९२५ ई में इस्लामिक गढ़, मक्का और मदीना की भव्य मस्जिदो पर कब्ज़ा कर इस्लामिक इस्लामी शिक्षाओं के रूप में दुनिया में सलफ़ी / वहाबी सिद्धांतो का प्रचार और प्रसार शुरू कर दिया जो आज तक चालू है। सऊदी शाही खानदान जिनके पुरखे यहूदी थे उन्हों ने इस्लामिक धरोहर को ज़मींदोज़ कर उनकी पहचान ख़त्म कर दी या खत्म करने का भरसक प्रयास किया ताकि नये धर्म की बुनियाद मज़बूत हो सके। इस प्रकार एक नया धर्म वहाबी मसलक वजूद में आया।

इब्न अब्द अल वहाब (१७०३-१७९९), का जन्म नज्द के उययना नामक शाहर में १७०३ में हुआ था वह बानो तमीम जनजाति के थे। शुरुआती दिनों में इनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर अपने पिता की देख रेख में हुई उसके पश्चात आगे की पढ़ाई के लिए मक्का और मदीना चले गये जो इस्लामिक शिक्षा का केन्द्र माना जाता था। अध्यन की समाप्ति के उपरांत वह वहाँ से बसरा, दक्षिणी इराक चले गए तथा बसरा में कुछ समय बिताया। इतिहासकारो की माने बसरा में आवास के दौरान इब्न अब्द अल वहाब ने इस्लाम धर्म के खिलाफ विद्रोह कर अपनी नई सोच विकसित किया गया था। १७४० ई. में वह अपने पैतृक शहर उययना लौटे उस समय तक अपनी विचारधारा को वह पूरी तरह से इस्लाम के खिलाफ एक विद्रोही के रूप में तब्दील कर दिया था। वहाब के अनुसार अरब प्रायद्वीप के मुसलमानों और दुनिया की उस की पूरी आबादी मुश्रिकीन है का दावा कर अपनी नई विचारधारा का प्रचार शुरू कर दिया है और उनका कहना था की उनके द्वारा दिए गए उपदेश ही असली इस्लाम का पैगाम है।

शुरुआती दिनों में अब्दअल वहाब अपने नए धर्म में उस्मान इब्ने मुअम्मार को अपने साथ ले कर अपने पैतृक गॉव उययना में अपने नये धर्म का प्रचार और प्रसार किया और एक फिक्र पैदा की उसमे सफलता के बाद बाकि बचे लोगो को बलपूर्वक अपने साथ आने के लिये बाध्य किया जिसमे उसे सफलता प्राप्त हुई। अब्दल वहाब की पहली आंतकवादी घटना को अपने साथियो के साथ अंजाम दिया। एक रात को इब्ने मुअम्मर के साथ अपने कुछ वफादारों की मदद से रसूल के एक साहेबा हज़रात ज़्याद इब्ने अल खत्ताताब की कब्र को नष्ट कर दिया और गिफ्तारी के अंदेशे को देखते हुए अपने साथियो के साथ उययना से भाग गये।

उययन से भागने के पश्चात अब्दाल वहाब ने मोहम्मद इब्न सऊद जो मध्ययुगीन काल में सामंती प्रभुओं में से एक था और सत्ता, पैसा और औरतो का शौकीन ज़मीदार था जिसका प्रभुत्व डिरिय्या नामक झेत्र में बहुत अधिक था और वह नज्द कबीले से सम्बन्ध रखता था, ने इब्न अब्द अल वहाब को संरक्षण दिया था और जल्दी से वहाबी पर आधारित अरब प्रायद्वीप में एक राज्य के गठन की संभावना की कल्पना की जाने गयी तथा, नए धार्मिक सिद्धांत के प्रचार और प्रसार की ज़िम्मेदारी इब्न अब्दअल वहाब ने संभाली।

इब्न अब्द अल वहाब और मोहम्मद इब्न सऊद के बीच एक आंतरिक गठबंधन स्थापित हुआ जो इस्लाम की मूल विचारधारा से भिन्न था तथा वहाबी विचाधारा पर आधारित एक राज्य की स्थापना के लिए एक राजनीतिक साजिश के तहत काम की शुरुआत की गयी जो वर्ष १७४४ ई में अस्तित्व में आया और पहली बार सऊदी राज्य की नीव रखी गयी। इस गठबंधन को और मज़बूती देने की गर्ज़ से सऊद ने अपनी बहन की शादी अब्दुल वहाब से सम्पन करा दी। गठबंधन की शर्तों के अनुसार, इब्न अब्द अल वहाब जिसका काम नए धर्म में लोगों को बदलने और आम जनता में धार्मिक कट्टरता बना था धार्मिक मामलों के लिए वास्तविक मंत्री बने तथा योजना के अनुसार सऊद को यह ज़िमेदारी सौपी गयी की वह राज्य की सीमा का विस्तार करे जिसमे वह सफल हुआ। अब नया राज्य पूर्णतः वहाबी विचारधारा को समर्पित राज्य की शक्ल में वजूद में आया जिसमे धार्मिक कट्टरपंथियों का इस्तेमाल किया गया।

१९० सालो (१७४४ -१९३२) के बीच, सऊद और अब्दुल वहाब की सयुंक्त सेना ने अरब प्रायद्वीप के सभी मुस्लिम शासकों के साथ युद्ध लड़े और विजय प्राप्त की सन १९३२ में अब्दुल अजीज सऊदी ने एक नवगठित राज्य की स्थापना की तथा स्वम् को उस राज्य के राजा के रूप में घोषित किया तथा अरब प्रायद्वीप से इस्लाम और मुसलमानों के सफाए में अंततः सफल रहे। अब अरब को एक नया नाम मिला सऊदी अरबिया। अब्दुल वहाब इब्राहिम अल शम्मारी की पुस्तक, 'वहाबी आंदोलन: सत्य और रूट्स', के अनुसार किंग अब्दुल अजीज इब्न सउद, पहले सउदी राजशाही जो १९३२ में स्थापित हुई उनके वंशज यहूदी मूल के थे और वह मोरडेचे बिन इब्राहिम बिन मोइशे जो बसरा के एक यहूदी व्यापारी के उत्तराधिकारी थे।

यह कहना गलत न होगा की इस्लामिक आतकवाद का पोषक सऊदी अरब अपनी वहाबी विचाधारा को स्थापित करने हेतु दुनिया के तमाम सेक्युलर देशो में अपने गिरोह के माध्यम से वहाबी विचारधारा के ख़िलाफ़ लोगो की निर्मम हत्या करवा रहा है और दुनिया के प्रभुत्वशाली देशो का मूक समर्थन प्राप्त है। सऊदी अरब ऐसे आतंकवादी समूहों में हथियार और पैसे बांट रहा है जो वहाबी तकफ़ीरी सोच वाले हैं जिसका उद्देश्य पूरे मिडल ईस्ट में तकफ़ीरी विचारों पर आधारित खिलाफत की स्थापना और अन्य मुसलमानों को काफिर बताकर मार देना है। तकफ़ीरी किसी भी सेक्युलर राज्य या सेक्युलर सत्ता को वैध नहीं मानते और उन्हें हटाकर तथाकथित इस्लामी राज्य स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन भी तकफ़ीरी वहाबी खतरे से ग्रस्त है कि जहां यह खतरा है कि सीरिया जाकर लड़ने वाले ब्रिटिश तकफ़ीरी निवासी वापस ब्रिटेन आकर तकफ़ीरी राज्य के गठन के लिए लड़ाई शुरू कर सकते हैं।

मुसलमानो आओ पुरानी रिवायत और क़ुरान के इल्म की रौशनी में गौरक्षा का अभियान छेड़ो और बंद करवाओ गाय का क़त्ल और यदि इस अभियान में राष्ट्रवादी हिन्दू संगठन का साथ लेना पड़े तो गुरेज़ नहीं। 

भारत में गौ हत्या को रोकने के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाया जाता रहा है अलकबीर नाम के स्लाटर हाउस में हर रोज़ हजारों गाय काटी जाती हैं कुछ साल पहले हिन्दू संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ मुहिम भी छेड़ी थी, लेकिन जब यह पता चला कि इसका मालिक कोई मुसलमान नहीं, बल्कि गैर मुस्लिम यानी जैनी है तो आन्दोलन को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया यह जगज़ाहिर है कि गौहत्या से सबसे बड़ा फ़ायदा गौ तस्करों और गाय के चमड़े का कारोबार करने वाले बड़े कारोबारियों को ही होता है।

इन वर्गों के दबाव के कारण ही सरकार गौहत्या पर पाबंदी लगाने से गुरेज़ करती है। वरना दूसरी क्या वजह हो सकती है कि जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता हो, उस देश की सरकार गौहत्या को रोकने में नाकाम है।

क़ाबिले-गौर है कि भारत में मुस्लिम शासन के दौरान कहीं भी गौवध को लेकर हिन्दू और मुसलमानों में टकराव का वाकिया देखने को नहीं मिलता। अपने शासनकाल के आखिरी साल में जब मुगल बादशाह बाबर बीमार हो गया तो उसके प्रधान ख़लीफा निज़ामुद्दीन के हुक्म पर सिपाहसालार मीर बकी ने गैर मुस्लिमों को परेशान करना शुरू कर दिया। जब इसकी ख़बर बाबर तक पहुंची तो उन्होंने क़ाबुल में रह रहे अपने बेटे हुमायूं को एक पत्र लिखा। बाबरनामे में दर्ज इस पत्र के मुताबिक़ बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को नसीहत करते हुए लिखा- ''हमारी बीमारी के दौरान मंत्रियों ने शासन व्यवस्था बिगाड़ दी है, जिसे बयान नहीं किया जा सकता। हमारे चेहरे पर कालिख पोत दी गई है, जिसे पत्र में नहीं लिखा जा सकता। तुम यहां आओगे और अल्लाह को मंजूर होगा तब रूबरू होकर कुछ बता पाऊंगा। अगर हमारी मुलाकात अल्लाह को मंजूर न हुई तो कुछ तजुर्बे लिख देता हूं जो हमें शासन व्यवस्था की बदहाली से हासिल हुए हैं, जो तुम्हारे काम आएंगे-

1. तुम्हारी जिन्दगी में धार्मिक भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। तुम्हें निष्पक्ष होकर इंसाफ करना चाहिए। जनता के सभी वर्गों की धार्मिक भावना का हमेशा ख्याल रखना चाहिए। 

2. तुम्हें गौहत्या से दूर रहना चाहिए। ऐसा करने से तुम हिन्दोस्तान की जनता में प्रिय रहोगे। इस देश के लोग तुम्हारे आभारी रहेंगे और तुम्हारे साथ उनका रिश्ता भी मजबूत हो जाएगा। 
3. तुम किसी समुदाय के धार्मिक स्थल को न गिराना। हमेशा इंसाफ करना, जिससे बादशाह और प्रजा का संबंध बेहतर बना रहे और देश में भी चैन-अमन कायम रहे।''

हदीसों में भी गाय के दूध को फ़ायदेमंद और गोश्त को नुकसानदेह बताया गया है।

1. उम्मुल मोमिनीन (हज़रत मुहम्मद साहब की पत्नी) फ़रमाती हैं कि नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सलल्लाह फ़रमाते हैं कि गाय का दूध व घी फ़ायदेमंद है और गोश्त बीमारी पैदा करता है।

2. नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सलल्लाह फरमाते हैं कि गाय का दूध फ़ायदेमंद है। घी इलाज है और गोश्त से बीमारी बढ़ती है। (इमाम तिबरानी व हयातुल हैवान) 
3. नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सलल्लाह फ़रमाते हैं कि तुम गाय के दूध और घी का सेवन किया करो और गोश्त से बचो, क्योंकि इसका दूध और घी फ़ायदेमंद है और इसके गोश्त से बीमारी पैदा होती है। (इबने मसूद रज़ि व हयातुल हैवान) 
4. नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सलल्लाह फ़रमाते हैं कि अल्लाह ने दुनिया में जो भी बीमारियां उतारी हैं, उनमें से हर एक का इलाज भी दिया है। जो इससे अनजान है वह अनजान ही रहेगा। जो जानता है वह जानता ही रहेगा। गाय के घी से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक कोई चीज़ नहीं है। (अब्दुल्लाबि मसूद हयातुल हैवान)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम सदैव ही पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहते थे और अपने मन व आत्मा को "वहिय" अर्थात ईश्वरीय आदेशों के मधुर संगीत से तृप्त करते थे। इसी स्थिति में ईमान अर्थात ईश्चर पर विश्वास और इरफ़ान अर्थात उसकी पहचान उनके अस्तित्व पर इतनी छा गई थी कि शेष सभी विशेषताओं पर पर्दा सा पड़ गया था। पैग़म्बरे इस्लाम (स) कहते थे कि यदि आकाश और धरती, तराज़ू के एक पलड़े में रखे जाएं और अली को ईमान दूसरे पल्ड़े में तो निश्चित रूप से अली का ईमान उनसे बढ़कर होगा।

वे ईश्वर की गहरी पहचान और विशुद्ध मन के साथ ईश्वर की उपसना करते थे क्योंकि उपासना केवल कर्तव्य निभाने के लिए नहीं होती बल्कि उसके माध्यम से बुद्धि में विकास और शारीरिक शक्तियों में संतुलन होता है। यही कारण है कि जो व्यक्ति पवित्र एवं विशुद्ध भावना के साथ उपासना करता है वह सफल हो जाता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि संसार के लोग दो प्रकार के होते हैं। एक गुट अपने आप को भौतिक इच्छाओं के लिए बेच देता है और स्वयं को तबाह कर लेता है तथा दूसरा गुट स्वयं को ईश्वर के आज्ञा पालन द्वारा ख़रीद लेता है और स्वयं को स्वतंत्र कर लेता है।

अली अलैहिस्सलाम साहस, संघर्ष तथा नेतृत्व का प्रतीक हैं। वे उन ईमान वालों का उदाहरण हैं कि जो क़ुरआन के शब्दों में ईश्वर का इन्कार करने वालों के लिए कड़े व्यवहार वाले और अपनों के लिए स्नेहमयी व दयालु हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अधीनस्थ लोग विशेषकर समाज के अनाथ बच्चे व असहाय लोग उन्हें एक दयालु पिता के रूप में पाते और उनसे अथाह प्रेम करते थे परन्तु ईश्वर का इन्कार करने वालों से युद्ध और अत्याचारग्रस्तों की सुरक्षा करते हुए रक्षा क्षेत्रों में उनके साहस और वीरता के सामने कोई टिक पाने का साहस नहीं कर पाता था। ख़ैबर के युद्ध में जिस समय विभिन्न सेनापति ख़ैबर के क़िले का द्वार खोलने में विफल रहे तो अंत में पैग़म्बरे इस्लाम ने घोषणा की कि कल मैं इस्लामी सेना की पताका ऐसे व्यक्ति को दूंगा जिसपर ईश्वर और पैग़म्बरे इस्लाम का विश्वास और प्रेम है। दूसरे दिन लोगों ने यह देखा कि सेना की पताका हज़रत अली अलैहिस्सलाम को दी गयी और उन्होंने ख़ैबर के अजेय माने जाने वाले क़िले पर उनके द्वारा विजय प्राप्त हुई।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम बड़ी ही कोमल प्रवृत्ति के स्वामी थे। उनकी यह विशेषता उनके कथन और व्यवहार दोनों में देखने को मिलती है। इस्लाम के आरम्भिक काल के एक युद्ध में अम्र बिन अब्दवुद नामक अनेकेश्वरवादियों का एक योद्धा, अपनी पूरी शक्ति के साथ हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले में आ गया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उसे पछाड़ दिया। यह देखकर वे उसकी छाती पर से उठ गए, कुछ दूर चले और फिर पलटकर उसकी हत्या कर दी।

वास्तव में हज़रत अली अलैहिस्सलाम साहस और निर्भीक्ता का प्रतीक होने के साथ ही साथ नैतिकता और शिष्टाचार का एक परिपूर्ण उदाहरण भी थे। वे ईश्वरीय कर्तव्य निभाते समय केवल ईश्वर को ही दृष्टि में रखते थे। यही कारण था कि अम्र बिन अब्दवुद की अपमान जनक कार्यवाही के पश्चात उन्होंने अपने क्रोध को पहले शांत किया फिर कर्तव्य निभाया ताकि उसकी हत्या अपनी व्यक्तिगत भावना के कारण न करें।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अद्धितीय जनतांत्रिक सरकार की स्थापना की। उनके शासन का आधार न्याय था। समाज में असत्य पर आधारित या किसी अनुचति कार्य को वे कभी भी सहन नहीं करते थे। उनके समाज में जनता की भूमिका ही मुख्य होती थी और वे कभी भी धनवानों और शक्तिशालियों पर जनहित को प्राथमिक्ता नहीं देते थे। जिस समय उनके भाई अक़ील ने जनक्रोष से अपने भाग से कुछ अधिक धन लेना चाहा तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने पास रखे दीपक की लौ अपने भाई के हाथों के निकट लाकर उन्हें नरक की आग के प्रति सचेत किया। वे न्याय बरतने को इतना आवश्यक मानते थे कि अपने शासन के एक कर्मचारी से उन्होंने कहा था कि लोगों के बीच बैठो तो यहां तक कि लोगों पर दृष्टि डालने और संकेत करने और सलाम करने में भी समान व्यवहार करो। यह न हो कि शक्तिशाली लोगों के मन में अत्याचार का रूझान उत्पन्न होने लगे और निर्बल लोग उनके मुक़ाबिले में न्याय प्राप्ति की ओर से निराश हो जाएं।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम ने कहा कि हे अली, जिब्राईल ने मुझे तुम्हारे बारे में एक एसी सूचना दी है जो मेरे नेत्रों के लिए प्रकाश और हृदय के लिए आनंद बन गई है। उन्होंने मुझसे कहाः हे मुहम्मद, ईश्वर ने कहा है कि मेरी ओर से मुहम्मद को सलाम कहों और उन्हें सूचित करो कि अली, मार्गदर्शन के अगुवा, पथभ्रष्टता के अंधकार का दीपक व विश्वासियों के लिए ईश्वरीय तर्क हैं। और मैंने अपनी महानता की सौगंध खाई है कि मैं उसे नरक की ओर न ले जाऊं जो अली से प्रेम करता हो और उनके व उनके पश्चात उनके उत्तराधिकारियों का आज्ञाकारी हो। आज उसी मार्गदर्शक के लिए हम सब शोकाकुल हैं। वह सर्वोत्तम और अनुदाहरणीय व्यक्तित्व जिसने संसार वासियों को अपनी महानता की ओर आकर्षित कर रखा था।

उस रात भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम रोटी तथा खजूर की बोरी, निर्धनों और अनाथों के घरों ले गए। अन्तिम बोरी पहुंचाकर जब वे घर पहुंचे तो ईश्वर की उपासना की तैयारी में लग गए। "यनाबीउल मवद्दत" नामक पुस्तक में अल्लामा कुन्दूज़ी लिखते हैं कि शहादत की पूर्व रात्रि में हज़रत अली अलैहिस्सलाम आकाश की ओर बार-बार देखते और कहते थे कि ईश्वर की सौगंध मैं झूठ नहीं कहता और मुझसे झूठ नहीं बताया गया है। सच यह है कि यह वही रात है जिसका मुझको वचन दिया गया है।

भोर के धुंधलके में अज़ान की आवाज़ नगर के वातावरण में गूंज उठी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम धीरे से उठे और मस्जिद की ओर बढ़ने लगे। जब वे मस्जिद में प्रविष्ठ हुए तो देखा कि इब्ने मल्जिम सो रहा है। आपने उसे जगाया और फिर वे मेहराब की ओर गए। वहां पर आपने नमाज़ आरंभ की। अल्लाहो अकबर अर्थात ईश्वर उससे बड़ा है कि उसकी प्रशंसा की जा सके। मस्जिद में उपस्थित लोग नमाज़ की सुव्यवस्थित तथा समान पक्तियों में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पीछे खड़े हो गए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के चेहेर की शान्ति एवं गंभीरता उस दिन उनके मन को चिन्तित कर रही थी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नमाज़ पढ़ते हुए सज्दे में गए। उनके पीछे खड़े नमाज़ियों ने भी सज्दा किया किंतु हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ठीक पीछे खड़े उस पथभ्रष्ट ने ईश्वर के समक्ष सिर नहीं झुकाया जिसके मन में शैतान बसेरा किये हुए था। इब्ने मुल्जिम ने अपने वस्त्रों में छिपी तलावार को अचानक ही निकाला। शैतान उसके मन पर पूरी तरह नियंत्रण पा चुका था। दूसरी ओर अली अपने पालनहार की याद में डूबे हुए उसका गुणगान कर रहे थे। अचानक ही विष में बुझी तलवार ऊपर उठी और पूरी शक्ति से वह हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सिर पर पड़ी तथा माथे तक उतर गई। पूरी मस्जिद का वातावरण हज़रत अली के इस वाक्य से गूंज उठा कि फ़ुज़्तो व रब्बिलकाबा अर्थात ईश्वर की सौगंध में सफल हो गया।

आकाश और धरती व्याकुल हो उठे। जिब्राईल की इस पुकार ने ब्रहमाण्ड को हिला दिया कि ईश्वर की सौगंध मार्गदर्शन के स्तंभ ढह गए और ईश्वरीय प्रेम व भय की निशानियां मिट गईं। उस रात अली के शोक में चांदनी रो रही थी, पानी में चन्द्रमा की छाया बेचैन थी, न्याय का लहू की बूंदों से भीग रहा था और मस्जिद का मेहराब आसुओं में डूब गया था।

कुछ ही क्षणों में वार करने वाले को पकड़ लिया गया और उसे इमाम के सामने लाया गया। इमाम अली अलैहिस्सलाम ने जब उसकी भयभीत सूरत देखी तो अपने सुपुत्र इमाम हसन से कहा, उसे अपने खाने-पीने की वस्तुएं दो। यदि मैं संसार से चला गया तो उससे मेरा प्रतिशोध लो अन्यथा मैं बेहतर समझता हूं कि उसके साथ क्या करूं और क्षमा करना मेरे लिए उत्तम है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के एक अन्य पुत्र मुहम्मद हनफ़िया कहते हैं कि इक्कीस रमज़ान की पूर्व रात्रि में मेरे पिता ने अपने बच्चों और घरवालों से विदा ली और शहादत से कुछ क्षण पूर्व यह कहा, मृत्यु मेरे लिए बिना बुलाया मेहमान या अपरिचित नहीं है। मेरा और मृत्यु की मिसाल उस प्यासे की मिसाल है जो एक लंबे समय के पश्चात पानी तक पहुंचता है या उसकी भांति है जिसे उसकी खोई हुई मूल्यवान वस्तु मिल जाए।

इक्कीस रमज़ान का सवेरा होने से पूर्व अली के प्रकाशमयी जीवन की दीपशिखा बुझ गई। वे अली जो अत्याचारों के विरोध और न्यायप्रेम का प्रतीक थे वे आध्यात्म व उपासना के सुन्दरतम क्षणों में अपने ईश्वर से जा मिले थे। अपने पिता के दफ़न के पश्चात इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने दुख भरी वाणी में कहा था कि बीती रात एक एसा महापुरूष इस संसार से चला गया जो पैग़म्बरे इस्लाम की छत्रछाया में धर्मयुद्ध करता रहा और इस्लाम की पताका उठाए रहा। मेरे पिता ने अपने पीछे कोई धन-संपत्त नहीं छोड़ी। परिवार के लिए केवल सात सौ दिरहम बचाए हैं।