मंगलवार, 8 अगस्त 2017

आज की राजनीती 






बीजेपी की प्रयोगशाला में यह सफल परीक्षण के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे है की भारत की विभिन्न जातियों में धुर्वीकरण करो जैसे मुसलमानो में शिया-सुन्नी में धार्मिक धारणाओं के बीच विभाजन एवं टकरार मसलन ३ - तलाक़ का मामला, सुन्नी में इस प्रथा में मान्यता है शिया नहीं मानता २. शिया समुदाय को धार्मिक मतो के आधार पर सुन्नी समुदाय से भिन्नता पैदा कर वोटो का धुर्वीकरण ३. लखनऊ जो शिया समुदाय का मरकज़ हैं वहाँ शिया धर्म गुरुओ का सत्ता पक्ष के प्रति रुझान इसके संकेत दे रहे है। ४. बाबरी मस्जिद विवाद में शियो का प्रस्ताव और उनकी पहल शिया - सुन्नी विवाद की बुनियाद साबित होगा। 
सत्ता पक्ष पिछले कुछ समय से हिन्दू-मुस्लमान दंगा कराने में सफल नहीं हो पा रहे है उसका मुख्य कारण दलितों का सत्ता पक्ष से मोह-भंग उससे निपटने के किये दलितों पर बड़ी जातो का उत्पीड़न बढ़ गया है और उन्हें डरा-धमका कर अपने पाले में लाने के प्रयास बढ़ गये है बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व का दलित परिवार में भोजन करना उन्हें पुनः अपने साथ जोड़ने का एक प्रयास है। दलित समाज में नेतृत्व का आभाव जो कुछ हद तक युवा जैसे जिग्नेश, चंद्रशेखर की भूमिका अहम हो जाती है। बहन मायावती यह बर्दाश नहीं करेगी की नेतृत्व की बागड़ोर युवा के हाथो में जाये और वो कारन बनेगा दलित समाज के वोटो के धुर्वीकरण का। 
पाकिस्तान या चीन से कंट्रोल्ड युद्ध की सम्भावना कम है मगर नाकारा भी नहीं जा सकता यदि पाकिस्तान का सिविल कण्ट्रोल अस्थिर होता है तो हो सकता है दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व अपनी आवाम को मुर्ख बनाने हेतु ऐसा करे मगर सम्भावना कम है। २०१९ का चुनाव बीजेपी केवल और केवल जातीय समीकरण, बेईमानी और उन्माद पैदा कर जीत सकती है याद रहे मौजूदा सरकार को ३१% वोट मिले थे यदि २% वोट इधर-उधर हो गये तो काफी उलट-फेर हो सकता हैं इससे बचने के लिए मेरी राय में कानूनी प्रावधानों में बदलाव कर सकते है क्योकि राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति के आलावा उच्च न्यायालय में भी इनका समर्थक आ चूका है। एक साल दस महीना दिलचस्प होगा ऊंट किस करवट बैठता है।

रविवार, 16 अप्रैल 2017

तीन तलाक़ 




सैकड़ो साल पहले भी अरब कारोबारी भारत आते और अपने साथ कालीन और मेवे इत्यादि तिजारत के लिये लाते उससे बेचने में काफी समय लग जाता और वह वेश्यावृत्ति को तर्जी न देकर समुन्द्री किनारों पर बसे गॉव में शादी कर लेते और कभी कभी उनको बरसो रहना होता था तो उन शेखो से बच्चे भी होते थे। लाये हुए सामान को बेच कर वे भारत से मसाले और दुसरी चीज़े अपने जहाज़ों में भरते और अपने परिवार से विदा हो अपने मुल देश रवाना हो जाते। इस दौरान उसकी पत्नी उसके बच्चे / बच्चो की देखभाल करती और उसके वापस आने की राह तकती। उस ज़माने में शायद ३ तलाक़ का प्रचलन नहीं था क्योकि ईमानदारी और खुदा का खौफ मौजुद था। कुछ सालो बाद जब वो फिर भारत आते तो उसी परिवार के पास रुकते जो उसका था और वापस जाने से पहले कई सालो के खर्चे के पैसे दे जाते। 
आज भी केरला के  समुद्र तट पर इस प्रकार के परिवार देखे जा सकते है। इतिहास यह भी बताता है की अपने जवान बच्चो को वे अपने कारोबार में भी बराबर का हिस्सेदार बनाते और प्रोत्साहित करते। शायद यही कारण था केरला में इस्लाम का प्रचार और प्रसार अधिक हुआ और खाड़ी देशों में रोज़गार के प्रति लालसा आज भी देखी जा सकती है। 

समय बदला शेखो ने आंध्र प्रदेश का रुख किया वो आंध्र आते और हिन्दुस्तानी दलाल उनके रहने और खाने की व्यवस्था करते। दलालो का एक दुसरा समुह गॉव कस्बों में गरीब परिवार को सम्पर्क करता जिनके घरो में कम उम्र की खुबसूरत लड़किया होती उनको शेख की अमीरी और ख़ूबी के बारे में बताया जाता उनसे यह भी बताया जाता की यदि वे अपनी बेटी की शादी शेख से कर दे तो उसका जीवन सुधर जायेगा वह रानी की तरह महलो में रहेगी और शेख उनके घरो को पैसे हीरे-जवाहरात से भर देगा, ऐसा सुनहरा अवसर कम आता है मौके का फायदा उठाओ यह ख़ुदा की रहमत है शेख ने तुम्हारी बेटी पसन्द कर ली है इत्यादि। गरीबी से तंग परिवार दिल मार के ऐसे प्रस्ताव पर अधिकांश हामी भर देता। किराये के सड़क चाप मौलवी निकाह की रस्म अदा करवाते और वह कमसीन शेख की बीवी बन जाती,शेख अपने भारत प्रवास में अपनी वासना पुरी करता और फिर उसे अरब ले जाने का झाँसा दे अपने वतन वापस चला जाता। वह कमसीन कुछ दिन इन्तेज़ार करती और अपनी किस्मत और खुदा की मर्ज़ी मान बाकि की ज़िन्दगी युही गुज़ार देती। 

समय और बदला और इन्टरनेट युग में देश और दुनिया ने प्रवेश किया चीज़े आसान हो गयी लोग अब अपनी प्रोफाइल इन्टरनेट पर डालने लगे इस आभासी दुनिया ने लोगो को ठगना शुरू कर दिया सोशल मीडिया पर प्रेम फिर मिलने की चाहत फिर शादी की बाते और अन्तः शादी। कन्या पक्ष को लड़के के विषय में वही मालुम होता जो उसकी फ़र्ज़ी प्रोफाइल पर दर्ज होता या लड़के के द्वारा बताया गया होता जो अधिकांश झुठ होता। लड़की प्रेम जाल में फस विवाह कर लेती कुछ महीनो सालो सब कुछ ठीक ठाक चलता फिर शुरू होती घरेलु हिंसा फिर वह दिन भी आ जाता जब हीरो अपनी ब्याहता से यह कह कर चला जाता की ऑफिस के काम से या कारोबार के काम से किसी दुसरे शहर जा रहा है और ५-६ दिनों में वापस आ जायेगा। मगर आता तलाक़ का मैसेज वह भी व्हाट्सप पर। 

फिर बात वही है शादी की तो क्या रजिस्टर्ड करवाई, लड़के के परिवार और उसकी नौकरी/कारोबार के बारे में तफ्तीश की नहीं तो भुगतो मौलवी अपनी फीस ले कर निकल लिया लड़का भागे या रहे उसकी बला से। 

३ तलाक़ और हलाला दो अगल चीज़ है-अमुमन देखा गया है ३ तलाक़ की प्रथा और उसका इस्तेमाल वह पुरुष करते है जो विदेशो में रहते हुए भारत की गरीब लड़की से उनके परिवार को धन दौलत की लालच दे कम उम्र की लड़की से शादी कर अपनी वासना पुरी कर वापस विदेश चले जाते है और ३ तलाक़ जैसी कुप्रथा का इस्तेमाल कर आज़ाद होना चाहते है। 

मामला लालच और उसके दुष्परिणाम से सम्बंधित है लालच में शादी फिर तलाक़ फिर लालच में वापस उसी के पास जाने की चाहत यानि उसे दूसरे मर्द से शादी फिर सुहागरात फिर तलाक़ फिर इद्दत फिर पहले पति से शादी। 
१. तलाक़ के बाद फिर उसी मर्द के पास जाने की ईक्षा  
२. विदेशी से शादी क्यों 
३. मौलवी की मिली भगत 
४. उल्मा-कौंसिल की निष्क्रियता 
५. बीजेपी का राजनैतिक मुद्दा 
६. मुसलमानो में धुर्वीकरण की पुरज़ोर कोशिश 

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

कैशलेस एक घातक प्रयोग 





आतंकवाद, काला धन, और नकली प्रचलित मुद्रा पर आँकुश लगाने की नियत से शुरू की गयी नोटबंदी अपने मक़सद में असफलता का कृतिमान बनाती स्पष्ट रूप से दिख पड़ती है। आतंकवाद का आतंक बेतस्तूर जारी है, देश में प्रचलित अधिकांश मुद्रा बैंको में जमा हो गयी और कुछ लोगो या समुह की मिलीभगत से कुछ भ्रष्ट बैंक अधिकारियो की सहयता से काला धन सफ़ेद करने की कवायद ने अपनी पहचान बनायी। यह सरकारी दावा की नकली मुद्रा का अन्त होगा और अच्छे दिन आयेगे ने भी यह बता दिया की यह सब जुमला था, नये नोट के आते ही नकली नोटो की बड़ी बड़ी खेप पकड़ी गयी। कुल मिला कर यह कहना गलत न होगा की विमुद्रीकरण अपने मक़सद में बुरी तरह विफल रहा और इस बेतुके फैसले की राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अर्थशास्री एवं वित्तीय विशेषज्ञों के द्वारा आलोचना झेलने के बाद सरकार बचाव की मुद्रा में आयी और विमुद्रीकरण की पुरी कवायत को कैशलेस से जोड़ने के प्रति सक्रीय हो गयी। 

कैशलेस को हींग की गोली की तरह दिखाया जा रहा है, जिसे खाते ही बदहज़मी खत्म हो जाएगी। प्रधानमंत्री को कैशलेस की वकालत करनी पड़ी और एक जनसभा में बोलना पड़ा की उनके एक मित्र में बताया की अब तो भिखारी भी स्वपिंग मशीन रखते है। भारत को कैशलेस करना है और उसको बढ़ावा देना के उद्देश्य से प्रधानमंत्री स्वम् PayTM के ट्रेडमार्क राजदूत की भुमिका में PayTM के विज्ञापन में मुख्य अभिनेता की भूमिका में प्रकट हुए जो विवादों के घेरे में आयी। एक राष्ट्रीय विपक्षी दल के नेता ने तो यहाँ तक कह दिया PayTM अर्थात "पे टू मोदी"। भारत जैसे बहु विविध देश में जहाँ भाषा खान-पान ५० किलोमीटर पर बदल जाता है पूर्वावश्यकता का अभाव है बिजली ८-१० घण्टे आती है एटीएम १० किलोमीटर में एक होता है बैंक ब्लॉक/तहसील में पाये जाते है अधिकांश लोग प्लास्टिक मनी के बारे में बहुत कम जानते है ऐसे में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री का सपना साकार होता तो नही दिखायी देता बल्कि इससे अराजकता का जन्म अवश्य होगा। स्वपिंग मशीन की उपलब्धता तथा उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिलता से भरी है और जिस प्रकार प्रधानमंत्री की सार्वजनिक उद्घोषणा की हमे कैशलेस समाज की स्थापना करनी है एक भ्रमात्मक ब्यान के सिवा कुछ नही है आम भारतीयों की अज्ञानता को भुनाने का एक सुनियोजित प्रयास लगता है जो नोटबंदी से ध्यान हटाने की दिशा में एक कोशिश मात्र है। नोट बंदी से कुछ नही होने वाला, यह सिर्फ आम जनता पर बोझ है।



अफवाह




राजनीति के गलियारे में चर्चित अफवाह का अपना आस्तित्व होता है चाहे बुनयादी तौर पर वह अफ़वाह एक बेतुकी सी और निराधार लगे परन्तु उसके आस्तित्व को नकारना एक भूल हो सकती है आवश्यकता होती है उस अफवाह का अपनी राजनीतिक सुझ-बुझ और राजनीतिक परिपेक्ष में विश्लेषण किया जाये। कल श्री लाल कृष्ण आडवाणी का स्पीकर और संसदीय मामलों के मंत्री के प्रति गुस्से का इज़हार और संसद न चल पाने के लिये दोनों को ज़िम्मेदार ठहराने के बाद ऐसा आभास होता है बीजेपी में सब कुछ ठीक नही है। प्रधानमंत्री का अपने सांसदों को यह आदेश की वे अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र में जाये और अपने मतदाता को विमुद्रीकरण से होने वाले लाभ से अवगत कराये, यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल। विमुद्रीकरण के कारण मतदाताओ में असंतोष और व्याप्त आक्रोश सांसदों को अपने चुनावी क्षेत्र में जाना और मतदाताओ को सम्बोधित करना एक जोखिम भरा कार्य हो सकता है जबकि वह भलीभांति जानते है अगले २-३ सालो में उन्हें उन्ही के सहारे संसद में जाना है। 
कल एक अफवाह चर्चा में थी परन्तु तुरन्त ही उसपर विराम लग गया, कहते है बीजेपी में चुनाव से पहले शामिल हुए १२० सांसदों ने श्री आडवाणी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की है और उनसे आग्रह किया है कि विमुद्रीकरण से उत्पन राजनीतिक उथल-पुथल को विराम दे और देश की बागडोर संभाले। कांगेस ने इस घटनाक्रम में साथ देने से इन्कार किया है उसका मानना है ऐसा करने से श्री मोदी को लोगो की सहानभूति प्राप्त होगी और यह सच भी है, ज्ञात हो श्री मोदी की कार्यशैली को लेकर बीजेपी अंतर्धारा में काफी असंतोष व्याप्त है।

बुधवार, 7 दिसंबर 2016


विमुद्रीकरण नफ़ा और नुक्सान

काले धन पर तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक एक व्यक्ति द्वारा देखे गये सपने को साकार करने का एक प्रयोग मात्र दिख पड़ता है जो कहने को तो काले पैसे आतंकवाद और बाजार में चल रही नकली मुद्रा को ख़त्म करने की अवधारणा से शुरू होकर कैशलेस सोसाइटी में परिवर्तित हो गया केवल एक ही दिन में नोटबंदी जैसा अहम फैसला लेने वाले पीएम मोदी को शायद इस बात का आकलन करने में विफल रहे या यु कहा जाये उनके सलाहकारों ने उन्हें विमुद्रीकरण की जटिलता के विषय में सही जानकारी नही दी या इस बात का सही आकलन नही किया गया कि नोट बदली में कितने नये नोट की आवश्यकता होगी विमुद्रीकरण का शुरूआती दिनों में लोगो ने मिश्रित प्रतिकिर्या व्यक्त की शायद लोगो को भी इससे होने वाली दिक्कतों का अन्दाज़ नही था किसी ने भी यह नही सोचा था की अपनी जमा पूंजी बैंक में डालने के पश्चात अपने ही पैसे की निकासी मुश्किल या नामुमकिन हो जायेगी उस पर रिज़र्व बैंक की नीत नये दिन बदलते दिशा निर्देशों ने पुरे देश में भ्रम की स्थिति उत्पन कर दी यकीनन ये सपना सुदूर भविष्य की  दुनिया है और सुंदर भी है लेकिन ये आसान नहीं है और उनका यह प्रिय ख्वाब अभी से सवालों के घेरे में है इसलिये विपक्ष सरकार की खिल्ली उड़ा रहा है जबकि सरकार भी मुश्किल समझ रही है ज्वालनशील मुद्दे पर खामोश रहने वाले प्रधानमंत्री को यह बोलना पड़ा की यह समस्या अल्पकालीन है और शीघ्र इसका समाधान होगा और देश से ५० दिनों का समय माँगा है जिसमे से करीब २८ दिन निकल चुके है और समस्या का समाधान नज़र नही आता 

नोटबंदी का फैसला लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने वर्तमान अर्थव्यवस्था से १००० तथा ५०० रुपये की ८० फीसदी से ज़्यादा मुद्रा हटा दी है बाजार में कैश की किल्लत है और ऐसे में सरकार ने देश में कैशलैस सोसायटी की बहस को जन्म दे दिया है सवाल यह है कि क्या ये संभव है यह बहस इस बात को लेकर है कि क्या भारत अभी कैशलेस अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है या फिर मोदी सरकार ने आगामी चुनावों के मद्देनजर एक नया शिगूफा छेड़ दिया है एक सवाल यह भी है कि क्या यह हमारे देश के सामाजिक एवं आर्थिक ढांचे के अनुरूप फिट बैठेगा विशेषज्ञ मानते हैं कि अभी देश को कैशलेस बनने में कम से कम १० से १५ साल लग जाने का अनुमान है

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव प्रोफेसर शार्दुल चौबे ने बताते हैंवे कहते हैं- हम अभी ३ जी ४ जी पर ही अटके हुए हैं डिजिटल अज्ञानता के बारे में तो सोचा ही नहीं गया है देश के डिजिटल बनने में अभी कम से कम १० से १५ साल लग सकते हैं वे कहते हैं सरकार ने अचानक से नोटबंदी का फैसला लेकर देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है प्रोफेसर शार्दुल चौबे अनुसार यह फैसला ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज कर लिया गया है जहां निरक्षरता तो चरम पर है ही बल्कि भुखमरी गरीबी अशिक्षा भी बहुत है। बाजार विश्लेषक प्रदीप सुरेका कहते हैं देश की १२५ करोड़ की आबादी में से अधिकांश लोग गरीब और अशिक्षित हैं जिनके लिए कैशलेस लेनदेन की बात बेमानी है उन्हें कैशलेस की आदत डालने से पहले शिक्षित करना पड़ेगा जो अपने आप में एक बड़ा काम है देश की एक बड़ी आबादी को शिक्षित करने के बाद समस्या यहीं खत्म नहीं होती बल्कि देश के कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं वहां नकदी रहित लेनदेन सोचना बेमानी होगा। अर्थशास्त्री नितिन पंत कहते हैं- देश के जिस एक तबके को स्मार्टफोन चलाना तक नहीं आता उनके लिए ई-बैंकिंग की डगर बहुत कठिन है देश के ७० करोड़ लोगों के पास ही बैंक खाता है इनमें से २४ करोड़ खाते पिछले एक साल में प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खुले हैं और वे इसे लेकर कितने सजग है यह भी सोचने वाली बात है


दरअसल पीएम मोदी का कैशलेस सोसायटी का सपना आने वाले समय एवं भूमंडलीकरण पर नजर है भूमंडलीकरण के कारण मुद्रा वस्तु व्यक्ति को निरंतर क्षेत्रीय सीमा का अतिक्रमण करने के लिए मजबूर किया जा रहा है यकीनन डिजिटल मनी और ऑन लाइन ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देना अच्छी बात है लेकिन जैसा की पहले कहा देश की साक्षरता दर ही ७४ फीसदी है ऐसे में डिजिटल मनी ग्रामीण असाक्षर जनता के लिए एक बड़ा मायाजाल है क्योकि जब अभी हाल ही में आईसीआईसीआई बैंक सहित तमाम बड़े बैंकों के लाखों एटीएम पिन नंबर हैक कर लिए गये तो ऐसे में गांवों और कस्बो की जनता कैसी अपनी साइबर सुरक्षा कर पायेगी ये एक अहम सवाल है