भारतीय धर्म दर्शन-आत्महत्या
आमतौर से भारत को उन देशो की सूचि में नहीं रखा गया जहाँ आत्महत्या की वारदाते अधिक होती है यहां के लोग आत्महत्या जैसी वारदात से दूर रहते थे। इसका कारण यही था कि भारत में अधिकांश लोग अपने आध्यात्मिक ग्रंथों के ज्ञान से परिपूर्ण थे। यहां तक कि उनका अध्ययन न करने वाले लोग भी इधर उधर प्रवचन सुनकर या चर्चाओं के माध्यम से इतने ज्ञानी तो हो ही जाते हैं कि सुख दुःख को जीवन का हिस्सा समझकर उनका सेवन और सामना करने में सझम हो जाते थे। भले ही भारतीय शिक्षा पद्धति में अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन शामिल नहीं है पर लोग अपने परिवार के बड़े सदस्यों के माध्यम से इनकी विषय सामग्री से परिचित रहते हैं। अब स्थिति बदल रही है। अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के चलते आज की बुजुर्ग पीढ़ी भी अपने अध्यात्मिक ग्रंथ से दूर हो गयी है तो फिर नयी पीढ़ी से से कोई अपेक्षा करना व्यर्थ ही है।
आत्महत्या (लैटिन suicidium,
sui caedere से,
जिसका अर्थ है "खुद को मारना") जानबूझ कर अपनी मृत्यु का कारण बनने के लिए कार्य करना है। आत्महत्या अक्सर निराशा के चलते की जाती है, जिसके लिए अवसाद, द्विध्रुवीय विकार, मनोभाजन, शराब की लत या मादक दवाओं का सेवन जैसे मानसिक विकारों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। तनाव के कारक जैसे वित्तीय कठिनाइयां या पारस्परिक संबंधों में परेशानियों की भी अक्सर एक भूमिका होती है। आज छोटे-छोटे बच्चे भी पढ़ाई के दबाव में कक्षा में ख़राब प्रदर्शन और परामर्श के अभाव में आत्महत्या जैसे कामो को अन्जाम देने लगे है जो चिंता का विषय है। आत्महत्या को रोकने के प्रयासों में आग्नेयास्त्रों तक पहुंच को सीमित करना, मानसिक बीमारी का उपचार करना तथा नशीली दवाओं के उपयोग को रोकना तथा आर्थिक विकास को बेहतर करना तथा समय-समय पर परामशकर्ता की सेवाऍ लेना शामिल हैं।
कोई व्यक्ति आत्महत्या क्यों और कब करता है? अक्सर देखा गया है कि जब लोग जीवन से पूरी तरह निराश हो जाते हैं और उनमें अपनी समस्याओं का सामना करने की हिम्मत नहीं रह जाती, तब वे अपनी जीवनलीला समाप्त करने का असाधारण निर्णय लेते हैं। कई बार
यह एक सुचिन्तित निर्णय होता है, लेकिन अधिकांश मामलों में पाया गया है कि यह कदम क्षणिक भावावेश में उठाया जाता है। प्रेम में
असफलता, परीक्षा में आशा के अनुरूप परिणाम न आना, पारिवारिक तनाव और आर्थिक परेशानी आत्महत्या के पीछे आम तौर पर इसी तरह के कारण होते हैं। यदि व्यक्ति
आत्महत्या करने के प्रयास में सफल हो गया, तब तो वह हर चीज़ से मुक्त हो गया लेकिन जो इस प्रयास में असफल हो जाते थे, उन पर दोहरी मार पड़ती थी। जाहिर है
कि जो व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर होगा, वह जिंदगी से कितना परेशान हो चुका होगा। यदि वह
इस प्रयास में असफल हो गया, तो कानून उसकी मदद करने के बजाय उसे अपराधी मानकर जेल की सींखचों के पीछे पहुंचा देता है। अभी तक भारत में लागू कानून के तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले (और उसमें असफल रहने वाले) व्यक्ति के लिए एक वर्ष की सामान्य कैद और साथ में अदालत से निर्धारित जुर्माना भरने की सजा तय की गई है। तथा धारा ३०९ के तहत उसे अपराध की श्रेणी में रख दिया गया है।
भारतीय धर्मग्रंथों में कहा गया है कि :
आत्मत्यागनि पतिताश्च नाशौचोदकभाजः।
“आत्म हत्या करने वाला तथा पतित जीवन बिताने वाले मनुष्य का न तो अशौच होता है न ही वह जलांजलि और श्राद्ध के भागी होते हैं”
अर्थात आत्महत्या करना प्रकृति के प्रति कितना बड़ा अपराध है इस बात से भी समझा जा सकता है कि ऐसा करने वालों को जलांजलि देना या उनका श्राद्ध करना भी धर्म से परे माना जताा है। मूल बात यह है कि समय के अनुसार सुख दुःख आते जाते हैं उनके लिये प्रसन्न होना या दुःखी होना अज्ञानियों का काम है।
इस्लाम के अनुसार इंसान को केवल जीने का अधिकार दिया गया है, मौत का अधिकार नहीं दिया गया। यही कारण है कि इस्लाम ने आत्महत्या को हराम क़रार दिया है और उल्मा ने इसे भयानक अपराध होने के कारण, उसे कबीरा गुनाहों में गिना है। कबीरा गुनाह की विभिन्न परिभाषाएं की गई हैं। इनमें सबसे ज़्यादा व्यापक और संपूर्ण फरिभाषा यह है कि जिस गुनाह पर कोई हद (सज़ा) या लानत बयान की गई हो, या वो गुनाह किसी ऐसे गुनाह के बराबर हो जिस के अंजाम देने पर कोई लानत आई हो, हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास फ़रमाते हैं किः जिस गुनाह पर अल्लाह ने दोज़ख़ के अज़ाब की धमकी दी हो या उसे अपने ग़ुस्से और लानत का पात्र बताया हो, कबीरा है, अल्लामा इब्ने क़य्यम का ख़याल है कि जो गुनाह स्वंय निषेध हो, कबीरा हैं और जिनसे इसलिए मना किया गया हो कि वो किसी बुराई का कारण बनते हैं वो सगीरा हैं, बहेरहाल कबीरा गुनाहों पर बड़ी लानत हुई हैं, और उनके अंजाम देने वाले को सख़्त तरीन सज़ाओं का पात्र क़रार दिया गया है। वैसे तो अल्लाह चाहे तो बड़े से बड़ा गुनाह अपने फ़ज़्ल व करम से माफ़ कर सकता है, और चाहे तो छोटे से छोटे गुनाह पर पूछताछ कर सकता है, लेकिन क़ुरान व सुन्नत के सिलसिले में जो कुछ मालूम होता है वो ये है कि कबीरा गुनाह या तो कफ़्फ़ारात (सज़ा व बदले) द्वारा माफ़ होते हैं या तौबा द्वारा।
इस रौशनी में देखा जाए तो आत्महत्या ऐसा गुनाह है कि जिसके करने वाले पर कोई हद आदि जारी नहीं हो सकती और ना वो तौबा कर सकता है, क्योंकि आत्महत्या करने के बाद वो इस काबिल ही नहीं रहता कि इस पर अपराध से सम्बंधित कार्रवाई की जा सके या वो तौबा कर के अपना गुनाह माफ़ करा सके। क़ुराने करीम की नीचे दो आयतों से आत्महत्या की हुर्मत पर रौशनी पड़ती है। एक जगह इरशाद फ़रमाया गया:
"और तुम अपने आप को क़त्ल न करो, बिलाशुबा अल्लाह तआला तुम पर मेहरबान है, और जो शख़्स ज़ुल्म व अत्याचार से ऐसा करेगा तो हम उसे ज़रूर आग में डालेंगे" (अलनिसाः 29-30)
इस आयत में मुफ़स्सिरीन ने आत्महत्या को भी दाख़िल किया है। इस्लाम ने हर तरह के ख़ूँन ख़राबे को हराम क़रार दिया है, चाहे ख़ुद को क़त्ल करना हो या दूसरे को क़त्ल करना हो, और इसकी ये सज़ा भी निर्धारित कर दी है कि हम उसे आख़िरत में दोज़ख़ के अज़ाब की दर्दनाक सज़ा देंगे। एक आयत में फ़रमाया गयाः
"और अपने आप को अपने हाथों से हलाकत में मत कर डालो।" (अल-बक़राः 195)
इल्म की रौशनी में यह वाज़े हो जाता है की आत्महत्या जैसे कृत्य को किसी भी धर्म की मान्यता नहीं मिली है जाहे विभिन्न देशो की सरकारे इसे कानूनी मान्यता दे दे खुदा /ईश्वर की नज़र में यह गुनाहे कबीरा ही रहे गा। इस लिये सलह यह है अपनी दिक्क़तों को अपने विश्वाशपात्र दोस्त रिश्तेदार और अच्छे मनोवैज्ञानिक से साझा करे राय ले और आत्महत्या जैसे घृणित विचारो से दूर रहते हुए सफलता के लिए सही दिशा में प्रयत्न करे।
ईसाई धर्म में आत्महत्या को एक पाप माना जाता है जो कि मुख्य रूप से मध्यकाल के संत ऑगस्टीन और संत थॉमस एक्युइनॉस जैसे प्रभावशाली इसाई विचारकों के लेखों पर आधारित है, लेकिन उदाहरण के लिए आत्महत्या को बाइज़ेन्टाइन इसाई जस्टिनियन की धर्म संहिता में पाप नहीं माना जाता था। कैथोलिक सिंद्धांत के अनुसार यह तर्क "तुम हत्या नहीं करोगे" (मेथ्यू 19:18 में जीसस द्वारा नए वचन के अंतर्गत लागू) तथा साथ ही यह पर आधारित है, इसलिए यह दुनिया के लिए ईश्वर की महा-योजना के साथ हस्तक्षेप करता है। आत्महत्या “प्राकृतिक आदेश” के विरुद्ध है आत्महत्या करने वाले के भीतर जिम्मेदारी के भाव को कम कर देता है।
यहूदी धर्म जीवन के मूल्य के महत्व पर ध्यान केन्द्रित करता है और आत्महत्या को दुनिया में ईश्वर की अच्छाइयों को अस्वीकार करने के तुल्य मानता है।
ईसाई धर्म में आत्महत्या को एक पाप माना जाता है जो कि मुख्य रूप से मध्यकाल के संत ऑगस्टीन और संत थॉमस एक्युइनॉस जैसे प्रभावशाली इसाई विचारकों के लेखों पर आधारित है, लेकिन उदाहरण के लिए आत्महत्या को बाइज़ेन्टाइन इसाई जस्टिनियन की धर्म संहिता में पाप नहीं माना जाता था। कैथोलिक सिंद्धांत के अनुसार यह तर्क "तुम हत्या नहीं करोगे" (मेथ्यू 19:18 में जीसस द्वारा नए वचन के अंतर्गत लागू) तथा साथ ही यह पर आधारित है, इसलिए यह दुनिया के लिए ईश्वर की महा-योजना के साथ हस्तक्षेप करता है। आत्महत्या “प्राकृतिक आदेश” के विरुद्ध है आत्महत्या करने वाले के भीतर जिम्मेदारी के भाव को कम कर देता है।
यहूदी धर्म जीवन के मूल्य के महत्व पर ध्यान केन्द्रित करता है और आत्महत्या को दुनिया में ईश्वर की अच्छाइयों को अस्वीकार करने के तुल्य मानता है।