शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

व्यापम का सत्य 


नारायण सिंह भदौरिया की मार्मिक कहानी जिनके पुत्र रामेन्द्र सिंह ने व्यापम में नाम आने के बाद आत्महत्या कर ली थी। 62 साल के नारायण ग्वालियर के ऐसे पुराने इलाके में रहते हैं जहाँ अब बंद हो चुकी जेसी मिल के हज़ारों मज़दूर बसे हैं। बिना पूरे प्लास्टर वाले इस छोटे से पुराने घर की सफ़ाई लगता है वर्षों से नहीं हुई है। कांच मिल के इस मोहल्ले में सभी लोग एक दूसरे से भली-भाति परिचित है और मोहल्ले में आने जाने वालो तथा मोहल्ले में होने वाली प्रत्येक गतिविधीयों पर बखुबी नज़र रखते है। नारायण सिंह भदौरिया बताते है उनके पुत्र का नाम व्यापमं घोटाले में आने के बाद नारायण के बेटे रामेन्द्र सिंह ने ०७ जनवरी को आत्महत्या कर ली थी। एक रात पहले परिवार वालों के साथ खाना खाकर अपने कमरे में गये रामेन्द्र ने उसी रात फांसी लगा कर अपनी जान दे दी। उसके चार दिन बाद रामेन्द्र की माँ कुसमा देवी ने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर के एक बोतल तेज़ाब पी लिया और जिससे उनकी भी मौत हो गई। नारायण भदौरिया पत्नी के आखिरी शब्द याद कर रुआँसे हो उठते है "जीवन की सभी गलतियों को माफ़ कर दीजियेगा" "इन दिनों मैं ईश्वर से दो बार प्रार्थना करता हूँ कि जल्दी बुलावा भेज दे।  चार दिनों के भीतर ही बेटे और बीवी को गंवाने के बाद अब मुझे मरने की जल्दी है" ये कहना है नारायण सिंह भदौरिया का। वह अपने जीवन से निराश और हताश है। 

रामेन्द्र सिंह ने एमबीबीएस की पढाई २०१३ में जीआर मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर से पूरी की फिर एक वर्ष सरकारी अनुबंध के अनुपालन हेतु गुना सरकारी हस्पताल चले गये। मन न लगने के कारण गुना सरकारी हस्पताल की नौकरी त्याग कर वापस ग्वालियर वापस आ के ग्वालियर के एक निजी बिड़ला हस्पताल में नौकरी शुरू कर दी तथा खुद के कमाये हुए ७५००० रुपये सरकारी खज़ाने में जमा कर सरकारी अनुबंध मुक्ति प्राप्त कर ली। जीवन सामान्य रूप से चल रहा था और परिवार अच्छे दिन आने के प्रति आशावान था। 

भदौरिया परिवार पर पहाड़ तब टूटा जब २२ अक्टूबर २०१३ को जीआर मेडिकल कॉलेज में जारी जांच के बाद रामेन्द्र का नाम प्रकाश में आया रामेन्द्र पर इल्ज़ाम था की उसने प्री मेडिकल परीक्षा के दौरान 'फ़र्ज़ी आदमी से अपनी जगह परीक्षा दिलवाई है, हालांकि उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई। कुछ महीनों बाद ही नारायण भदौरिया के घर रामेन्द्र के मेडिकल कॉलेज से एक सन्देश पहुंचा जिससे पता चला उसकी डिग्री निलंबित कर दी गई थी। बाद में कई बार रामेन्द्र को थाने में पूछताछ के लिए बुलाया जाता रहा इस मानसिक आघात से वे डिप्रेशन के शिकार भी हो गये। पिता नारायण ने बताया, "बेटा मरीज़ हो गया और २०१४ की हमारी दीवाली तो अस्पताल में उसका उपचार कराने में बीती".

स्थानीय पुलिस का दावा है कि रामेन्द्र ने अपनी 'प्रेमिका' द्वारा ठुकराए जाने की वजह से आत्महत्या की थी। लेकिन स्थानीय सूत्रों के अनुसार इसकी सम्भावना प्रबल है कि घोटाले में नाम आ जाने के कारण रामेन्द्र से उनकी महिला मित्र ने भी नाता तोड़ लिया हो। पिता नारायण बेटे के प्रेम से इनकार नहीं करते और ये भी बताते हैं कि उसके विवाह संबंधी योजना का उन्होंने शुरू में विरोध भी किया था परन्तु अंतः पुत्र के दबाव और समझाने पर परिवार शादी के लिये तैयार था। 

नारायण भदौरिया को इस बात का अफ़सोस है कि रामेन्द्र की मौत के अगले ही दिन व्यापमं घोटाले की जांच करने वाली एसटीएफ ने कहा कि उनका नाम तो पहले ही अभियुक्तों की सूची से हटा दिया गया है। हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि रामेन्द्र की मौत के बाद उनकी माँ कुसमा ने भी आत्महत्या कर ली। ये मामला इस बात का भी गवाह है कि व्यापमं घोटाले की जांच पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। 

पिता नारायण कहते हैं, "बेटा होनहार निकला था तो उम्मीदें बंध गई थी, अब तो रिश्तेदारों के लाये भोजन से काम चलता है" 
बीबीसी हिन्दी के सौजन्य से 

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

व्यापम कितना व्यापक 

सुधांशु त्रिवेदी का व्यापम घोटाले से क्या रिश्ता है? क्या टेलीविज़न पर अक्सर दिखने वाला बीजेपी का न भूलने वाला चेहरा सुधांशु त्रिवेदी, व्यापम घोटाले से किस प्रकार जुड़े है? क्या अभी सुधांशु त्रिवेदी व्यापम में बड़े पद पर नहीं थे?
इन सारे प्रकरण से मध्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री अनभिज्ञ नहीं है पार्टी की छवि और साख बचाने की नियत से उन्होंने छुपी साध ली है, ऐसा दावा है इण्डिया संवाद का। मगर मौजूदा हालत और अंगगिनित मौतों के बाद प्रधानमंत्री ने जो रिपोर्ट तलब की है उसमे सुधांशु त्रिवेदी
, मास्टरमाइंड पंकज त्रिवेदी, पियूष त्रिवेदी और सुधीर शर्मा के सम्बन्धो की विस्तृत जानकारी मांगी गयी है। 
यह कैसी विडंबना और मूर्खता है की भाजपा व्यापम पर पार्टी का बचाव उसी आदमी से करवा रही है जो स्वम् व्यापम घोटाले से जुड़ा हुआ है। सूत्रों की माने तो सुधांशु त्रिवेदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के काफी करीबी और और गृह मंत्री राजनाथ सिंह का आशीर्वाद प्राप्त है जो मध्य प्रदेश के कभी सबसे बड़े घोटाला में शामिल कई प्रमुख खिलाड़ियों के साथ परिचित था। "त्रिवेदी" अब अधिक व्यापक रूप में टीवी स्क्रीन पर पार्टी का बचाव करने के लिए अपनी सेवाएं दे रहे है, "भाजपा के एक पदाधिकारी ने कहा।"
सूत्र बताते है की सुधांशु त्रिवेदी अपने रसूक का इस्तेमाल कर मध्य-प्रदेश भवन, नई-दिल्ली में बतौर सम्पर्क अधिकारी (व्यापम) कार्यरत थे और उसी दौरान उनका सम्पर्क पंकज त्रिवेदी से हुआ जो PEB में बतौर परीक्षा नियंत्रक के पद पर आसीन थे पंकज त्रिवेदी के माध्यम से सुधांशु त्रिवेदी मध्य-प्रदेश के मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा और रेत माफिया सुधीर शर्मा के सम्पर्क में आये जो सत्ता की दलाली करता था। अब टीम पूरी तरह से घोटाला करने और नौकरी से लालसा रखने वालो और मेडिकल कॉलेज में दाखिले की इच्छा रखने वालों लोगो के लिये काम करने को तैयार था। कहते है व्यापम ने कुछ ही दिनों में उद्योग का रूप ले चुका था। 
और आज जो कुछ हो रहा है वह दुनिया के सामने है। सूत्रों का कहना है मध्य प्रदेश में क्षेत्रीय समाचार ने जब पुरे घोटालो को उजागर करना शुरू किया और ताबतोड़ गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हुआ और पिछले साल पंकज त्रिवेदी की गिफ्तारी के उपरान्त सुधांशु त्रिवेदी अब के पार्टी के प्रवक्ता ने चुपचाप व्यापम में अपने कार्यभार से इस्तीफा दे दिया है।

शनिवार, 4 जुलाई 2015

जुमले की सरकार 





हमारे देश में नाटक, नौटंकी और तमाशे को समाज में सदा से एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है मसलन पहले मदारी भालु ले कर चलते थे मोहल्लो में करतब दिखाते भीड़ जुड़ती भालू का नाच होता छोटे बच्चो को भालू की पीठ पर बिठाया जाता कहते थे ऐसा करने से बच्चे को डर नहीं लगता।  मुझे भी मेरी दादी ने भालू की पीठ पर बिठाया। मदारी बन्दर का खेल दिखाते और जुडी भीड़ से उगाई करते।

कुछ इसी प्रकार से तमाशा सार्वजनिक स्थलों पर होता जहाँ आस-पास काफी सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तर होते। यहाँ के खेल मोहल्लो के खेल से काफी जुदा होते थे मसलन एक उस्ताद होता और एक जम्हुरा। यहाँ खोई जवानी वापस लाने की, ल-ईलाज पायरिया, काकोता बवासीर की दवाये बेचीं जाती यानि कुल मिला कर भीड़ को बेवकूफ बनाने का खेल। उस्ताद पकी दाढ़ी वाला और जम्हूरा काली दाढ़ी वाला। उस्ताद ज़ोर की आवाज़ लगता जम्हूरे - जी उस्ताद, इस दवा के खाने से क्या होता है - उस्ताद जवानी वापस आती है और बीवी रोते हुए कहती है मेरे सरताज माफ़ कर दो - उस्ताद: जम्हूरे और क्या होता है। उस्ताद घर का आँगन बच्चो की किलकारी से गूंजने लगता है।  और न जाने क्या संवाद होते मगर होते रोचक थे।

कुछ देर बाद चोरी से लोग जवानी वापस आने की दवाईया खरीदने आ जाते थे शाम तक कमाई कर उस्ताद और जम्हूरा नदारत हो जाते और लोग इस बात का इंतेज़ार करते रहते कि बीवी कब सरताज माफ़ कर दो कहेगी। अब यही पकी दाढ़ी और काली दाढ़ी ने अपना पैर भारत की राजनीत में जमा लिया है। जुमले बेचे जाते है और अच्छे दिनों की सौगात समझ के लोग खरीदते जा रहे है।