व्यापम का सत्य
नारायण सिंह भदौरिया की मार्मिक कहानी जिनके पुत्र रामेन्द्र सिंह ने व्यापम में नाम आने के बाद आत्महत्या कर ली थी। 62 साल के नारायण ग्वालियर के ऐसे पुराने इलाके में रहते हैं जहाँ अब बंद हो चुकी जेसी मिल के हज़ारों मज़दूर बसे हैं। बिना पूरे प्लास्टर वाले इस छोटे से पुराने घर की सफ़ाई लगता है वर्षों से नहीं हुई है। कांच मिल के इस मोहल्ले में सभी लोग एक दूसरे से भली-भाति परिचित है और मोहल्ले में आने जाने वालो तथा मोहल्ले में होने वाली प्रत्येक गतिविधीयों पर बखुबी नज़र रखते है। नारायण सिंह भदौरिया बताते है उनके पुत्र का नाम व्यापमं घोटाले में आने के बाद नारायण के बेटे रामेन्द्र सिंह ने ०७ जनवरी को आत्महत्या कर ली थी। एक रात पहले परिवार वालों के साथ खाना खाकर अपने कमरे में गये रामेन्द्र ने उसी रात फांसी लगा कर अपनी जान दे दी। उसके चार दिन बाद रामेन्द्र की माँ कुसमा देवी ने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर के एक बोतल तेज़ाब पी लिया और जिससे उनकी भी मौत हो गई। नारायण भदौरिया पत्नी के आखिरी शब्द याद कर रुआँसे हो उठते है "जीवन की सभी गलतियों को माफ़ कर दीजियेगा" "इन दिनों मैं ईश्वर से दो बार प्रार्थना करता हूँ कि जल्दी बुलावा भेज दे। चार दिनों के भीतर ही बेटे और बीवी को गंवाने के बाद अब मुझे मरने की जल्दी है" ये कहना है नारायण सिंह भदौरिया का। वह अपने जीवन से निराश और हताश है।
रामेन्द्र सिंह ने एमबीबीएस की पढाई २०१३ में जीआर मेडिकल कॉलेज, ग्वालियर से पूरी की फिर एक वर्ष सरकारी अनुबंध के अनुपालन हेतु गुना सरकारी हस्पताल चले गये। मन न लगने के कारण गुना सरकारी हस्पताल की नौकरी त्याग कर वापस ग्वालियर वापस आ के ग्वालियर के एक निजी बिड़ला हस्पताल में नौकरी शुरू कर दी तथा खुद के कमाये हुए ७५००० रुपये सरकारी खज़ाने में जमा कर सरकारी अनुबंध मुक्ति प्राप्त कर ली। जीवन सामान्य रूप से चल रहा था और परिवार अच्छे दिन आने के प्रति आशावान था।
भदौरिया परिवार पर पहाड़ तब टूटा जब २२ अक्टूबर २०१३ को जीआर मेडिकल कॉलेज में जारी जांच के बाद रामेन्द्र का नाम प्रकाश में आया रामेन्द्र पर इल्ज़ाम था की उसने प्री मेडिकल परीक्षा के दौरान 'फ़र्ज़ी आदमी से अपनी जगह परीक्षा दिलवाई है, हालांकि उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई। कुछ महीनों बाद ही नारायण भदौरिया के घर रामेन्द्र के मेडिकल कॉलेज से एक सन्देश पहुंचा जिससे पता चला उसकी डिग्री निलंबित कर दी गई थी। बाद में कई बार रामेन्द्र को थाने में पूछताछ के लिए बुलाया जाता रहा इस मानसिक आघात से वे डिप्रेशन के शिकार भी हो गये। पिता नारायण ने बताया, "बेटा मरीज़ हो गया और २०१४ की हमारी दीवाली तो अस्पताल में उसका उपचार कराने में बीती".
स्थानीय पुलिस का दावा है कि रामेन्द्र ने अपनी 'प्रेमिका' द्वारा ठुकराए जाने की वजह से आत्महत्या की थी। लेकिन स्थानीय सूत्रों के अनुसार इसकी सम्भावना प्रबल है कि घोटाले में नाम आ जाने के कारण रामेन्द्र से उनकी महिला मित्र ने भी नाता तोड़ लिया हो। पिता नारायण बेटे के प्रेम से इनकार नहीं करते और ये भी बताते हैं कि उसके विवाह संबंधी योजना का उन्होंने शुरू में विरोध भी किया था परन्तु अंतः पुत्र के दबाव और समझाने पर परिवार शादी के लिये तैयार था।
नारायण भदौरिया को इस बात का अफ़सोस है कि रामेन्द्र की मौत के अगले ही दिन व्यापमं घोटाले की जांच करने वाली एसटीएफ ने कहा कि उनका नाम तो पहले ही अभियुक्तों की सूची से हटा दिया गया है। हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी क्योंकि रामेन्द्र की मौत के बाद उनकी माँ कुसमा ने भी आत्महत्या कर ली। ये मामला इस बात का भी गवाह है कि व्यापमं घोटाले की जांच पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
पिता नारायण कहते हैं, "बेटा होनहार निकला था तो उम्मीदें बंध गई थी, अब तो रिश्तेदारों के लाये भोजन से काम चलता है"
बीबीसी हिन्दी के सौजन्य से

