बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

बरगद का पेड़ 

गाँव के बीचो बीच यह बरगद का पेड़ इकलौता गवाह है गांव के बदलते हालात का - इस बरगद ने अंग्रेजी हुकुमरानों का रुआब देखा है इस गाँव के वह दिन भी देखे है जब गाँव के रहने वाले रोल्स रॉयल से आया करते थे और जिनके पास गाड़ी नही होती वह सजी हुई बग्गी से आता और जिनके पास वह भी नही थी वह ताँगे से आते। बरगद सब चुपचाप देखता और ख़ुशी से अपनी शाखों और पत्तों को लहराता। वह सब की हैसियत से वाकिफ़ था और गवाह भी। उसने वह भी देखा की जब सब ईमाम हुसैन के गम में शरीक होते तो न कोई अमीर होता न ही कोई ग़रीब सब के तन पर काले लिबास होते और नम आँखों से ईमाम हुसैन के गम में अपनी हैसियत को भुल आपस में ऐसा घुल मिल जाते जैसे सब एक हो। 
गाँव का यह बरगद सारे धार्मिक और समाजिक समारोह का केन्द्र बना रहा और आज भी उसे इस बात का फ़क़्र महसूस करता है की गाँव ने उसके रुतबे में कोई कमी नही की। इस बरगद ने १८५७ का ग़दर देखा स्वतंत्रता संग्राम की आंधी देखी और उसमे पालारू का वह आज़ादी का दीवानापन भी देखा कैसे उसने यूनियन जैक को उतार राष्ट्रीय ध्वज को लहराया था। बरगद के सामने आठ एकड़ का तालाब पूर्व में सरकारी इमामबाडा और उसमे सरकारी दवाखाना उसके पड़ोस में राजा मेहमूदाबाद के मेनेजर रहे मेरे अब्बा के फूफा की आलीशान कोटी और मेरे दादा के भाई का खुबसूरत मकान पश्चिम में राहत मंज़िल और थोड़ी दुरी पर तीन गाँव के ज़मीदार स्वर्गीय नवाब हुसैन (मेरे नाना) का मकान। बरगद खुश होता अपने आस-पास इन शख्सियतों को देख कर और ख़ुशी का इज़हार भी करता अपनी शाखों और पत्तों को हिला कर। 
बरगद ने दुखी मन से भारत का बटवारा भी देखा उसने महसूस किया की गाँव के नवजवान रोज़ी-रोटी के लिये देश छोड़ पाकिस्तान पलायनकर रहे है बरगद कहता है मैंने अपनी खुबसुरती से उन युवाओ को रिझाने की, रोकने के समस्त प्रयास किये परन्तु यह युवा न जाने किस उन्माद में मेरे पैग़ाम को अनदेखा कर अपने बूढ़े माँ-बाप को पीछे छोड़ नौकरी के और अच्छे भविष्य की आस में तेज़ी से पाकिस्तान की ओर दौड़े चले जा रहे थे मै बेबस सब देख रहा था। मैंने देखा १९५० से पहले उनमे से बहुत सारे युवा अपने अच्छे दिन के भ्रम को त्याग कर वापस अपने गाँव आते भी देखा मै अपनी कामयाबी पर खुश था। 
आज जो बच्चे थे वह बुज़ुर्ग हो चुके है और अब उनके बच्चे पढ़े लिखे दुनिया के अन्य देशो में कार्यरत है परन्तु वह मुझे और इस गाँव की सरज़मी से बेपनाह मोहब्बत करते है और मोहर्रम की चाँद रात को मेरे ज़ेरेसाया जमा हो अपने ईमाम का मातम करते है और भावभीनी श्रदांजली देकर अपने रोज़गार पर चले जाते है और यह वादा भी करते है कि यदि ज़िन्दगी रही तो इंशाल्लाह अगले मोहर्रम में फिर इस बरगद के नीचे जमा होंगे।

रविवार, 23 अक्टूबर 2016




मेरा गॉव 


कलांपुर तहसील शाहगंज ज़िला जौनपुर का एक गॉव जिसका इतिहास बहुत रोचक है मेरी बहन नाहीद वर्मा में सन १९७३ में जब गांव के बारे में एक शोध किया और इस सिलसिले में गांव के कुछ विद्वानों से बात की तो पता चला कि कलाँपुर का इतिहास मोहम्मद बिन तुग़लक़ के आगमन से जुड़ता है। कहते है तुग़लक़ के साथ एक महान सूफ़ी भी भारत आये थे और उस समय कलाँपुर पर राजभर का शासन था और राजभर के नौयते पर सूफ़ी कलाँ ने कलाँपुर में बसने का फैसला किया। 
सूफी कलाँ पर्सिया के एक छोटे से गॉव के रहने वाले थे और शायद बानी-उम्मिया जो की शिया विरोधी था उससे अपनी जान को खतरा देख वो भारत आ गये थे। उस समय कलाँपुर जंगल हुआ करता था और राजभर के प्रेम ने उन्हें अपनी तमाम उम्र यही रहने के लिये विवश किया। शाह सयेद कलाँ के वंशज भी कलाँपुर में ही बस गये। कहते है उनके बेटे सयेद ताहा और सयेद मीर उम्मे जरी मशहुर सुलेखक थे जो कलाँपुर में आबाद हो गये। सयेद मीर जरी के पाँच बेटे थे १. मीर मोहम्मद अली २. मीर तसद्दुक अली ३. मीर अली नक़ी ४. मीर तुफैल अली ५. मीर अली हुसैन। इन पाचो बेटो की नस्ल कलाँपुर की शिया आबादी का मुख्य कारण रही और कलाँपुर की गैर-मुस्लिम आबादी में अक्सरियत दलित और भर (एक जाति जो कृषि प्रधान है) की रही। विकास और समय के साथ अन्य जातीय दूसरे गॉव से आकर यहाँ बस्ती गयी जैसे तेली, लुहार, कुम्हार और फूलो का काम करने वाले। इस तरह गांव अपने आप में स्व-निर्भर होता गया, यही सामाजिक संरचना आज भी देखी जा सकती है। कलाँपुर के मुख्य विशेषता यह रही की मिया लोगो ने अन्य जातियों का सदा की सम्मान किया और इतिहास में किसी भी प्रकार के उत्पीड़ण का कोई उद्धरण समान्यता नही मिलता। मोहर्रम यहाँ बड़ी श्रदा के साथ मनाया जाता है जो बिना गैर-मुस्लमान आबादी के सहयोग के मुमकिन नही हो सकता गांव की गैर-मुस्लिम आबादी को ईमाम साहेब (ईमाम हुसैन) से काफी उम्मीदे रहती है वो उनकी सारी मुरादे पुरी करते है। शिया मुसलमानो की अनदेखी और व्यवहार से गैर-मुस्लमान आबादी मोहर्रम से कुछ वर्ष दुर रही मगर ईमाम हुसैन से दुरी उन्हें वापस आने के लिये प्रेरणास्रोत बनी और आज भी उनकी बड़ी संख्या ईमाम हुसैन की आखरी विदाई को ग़मगीन बनाने में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है। 
कलाँपुर पहली बार चर्चा में १८५७ में आया जब अँगरेज़ हुकुमरानों ने ग़दर को कुचलने के लिये नागरा के तहसीलदार मीर सुब्हान अली, सब-इंस्पेक्टर हाजी मीर आबिद हुसैन शैख़ मोहम्मद मेहंदी को ग़दर कुचलने और अँगरेज़ हुकुमत को सहयोग करने के एवज़ में काफी ईनाम और ज़मीन दी। इसी के साथ गाँधीवाद जो व्याप्त था अदृष्‍ट प्रभाव भी दिखने लगा था उसकी अगुवाई स्वर्गीय सयेद मोहम्मद जाफ़र कर रहे थे जो इसी गॉव से सम्बन्ध रखते थे और मेरे बड़े अब्बा थे और परिवार के दबाव को दरकिनार कर वह स्वन्त्रता संग्राम में पुरी तरह सक्रीय भूमिका निभा रहे थे। यहाँ बताना आवश्यक होगा की स्वर्गीय सयैद मोहम्मद जाफ़र के पिता यानि मेरे दादा तहसीलदार थे और उनको यह घोषणा करनी पड़ी की उनका अपने पुत्र से कोई सम्बन्ध नही है कारण पारिवारिक ज़िम्मेदारिया खुल कर अपने पुत्र का समर्थन करने से रोकती रही। सन १९३०अन्तरिम सरकार का गठन होना था और खुटहन निर्वाचन-क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार स्वर्गीय केशव देव मालवीय मैदान में थे मुक़ामी ज़म्मीदार उनके विरोध में थे और क्षेत्र के लोगो पर उनका काफी प्रभाव था स्वर्गीय मोहम्मद जाफ़र ने अपने काम और गांधीवादी विचारधारा के प्रचार और प्रसार के बल पर स्वर्गीय श्री मालवीय को विजय दिलाई। इसी कलाँपुर के एक किसान जिसका नाम पालारू था यूनियन जैक को उतार कर हिन्दुस्तान के झण्डे को लहरा कर गॉव के लिये एक मिसाल बना। आगे चल कर स्वर्गीय सयैद मोहम्मद जाफ़र ने नेता सुभाष चन्द्र बोस के साथ मिल फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

हिटलर जिन्दा है 


मित्रोआप में से कितने लोगो को पता है कि इसी दुनिया ने एक विचारधारा को भी स्थान दिया जिसका दावा था कि यदि वह सत्ता में आयी तो वह उनकी समस्त परेशानियों से मुक्त कर एक सुन्दर जीवन प्रदान करेगी उस विचारधारा को नाज़िस्म कहते है जिसका जन्म १९३० में जर्मनी में हुआ
इस विचारधारा को समझने के लिए हमे जर्मनी में चल रही उस समय की राजनीतिक गतिविधियों की पृष्ठभूमि को जानना अवश्य होगा जो मै बिना विस्तार में जाये थोड़े में समझने का प्रयास करुगा१९१८ में हुई जर्मनी क्रांति के उपरान्त जर्मनी में एक नई राजनीतिक व्यवस्था ने जन्म लिया जिसका कार्यकाल मात्र कुछ साल था उसे नाम दिया गया वेईमार रिपब्लिक जिसका एक संविधान था जिसमे रिपब्लिकनदक्षिणपंथीवामपंथी के विचारो को जगह दी गयी परन्तु उस समय के राजनीतिक कारणों के कारण संविधान के कार्यान्वयन में काफी समस्या का सामना करना पड़ा जर्मनी प्रथम विश्वयुद्ध में अपमानजनक हार से उभरने की कोशिश कर रहा था वर्साय की संधि की शर्तो को अमल में लाना एक बड़ी चुनौती थी जर्मनी एक बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा था जर्मनी की आन्तरिक स्थिति ख़राब थी बेरोज़गारीमुद्रास्फीतिअपने चरम पर थी सत्ताधारी पार्टी विभिन्न आरोप से घिरी थी उसी समय एक और विचारधारा अपने पैर पसार रही थी जो इन सारी मुश्किलो के समाधान का दावा पेश कर रही थी और सत्ताधारी पार्टी के प्रति आक्रामक रुख बनाये हुए थी उसका नाम था नाज़ी पार्टी

भारत में भी कई प्रकार के विचारो को स्थान दिया और उनके प्रचार प्रसार की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जहाँ एक तरफ १९१५ के बाद कांग्रेस ने भारत के स्वन्त्रता संग्राम में बढ़-चढ़ के हिस्सा लिया वही वाम विचारधारा भी रूस की क्रांति से प्रभावित हो भारत को आज़ाद करने ले लिये अपने विचारो से युवको को आकर्षित करने में सफल रही और क़ुर्बानी में अपना स्थान भारत के इतिहास में सूचिबद्ध किया मुस्लमान जो १९४७ तक भारतीय राजनीती की मुख्यधारा का हिस्सा थी उसने अपनी भागीदारी का परचम लहरायाक्रन्तिकारी कविता से युवा और आम जन में जान फुकीलेखको ने समाजिक बुराइयों को अपनी लेखनी से उजागर किया बहुत कम लोग जानते होंगे आज दलित कहे जाने वाले समाज का भारतीय समाजिक दोषो और कुरीतियो को समाप्त करने हितु जो योगदान किया वह आज इतिहास के पन्नो में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है और अपनी गौरवशाली इतिहास का परिचय देता है १९४७ के बाद मुस्लमान और दलितों को हाशिये पर धकेलने का योजनाबद्ध तरीके से प्रयास हुआ और उसमे सफलता भी मिली मगर कहते है जिन्दा कौम कभी नही मरती और शायद यही कारण है यह कौमे हाशिये पर धकेले जाने के बाद भी अपने जिन्दा रहने का सबूत पेश कर रही है

इन सब के साथ एक और विचारधारा जन्म ले चुकी थी और पल रही थी वह थी "राष्ट्रवादीविचारधारा जो पूरी तरह ऊपर उल्लेखित विचारधाराओ से भिन्न थी राष्ट्रवादी विचारधारा पूरी तरह नाज़ी विचारधारा से प्रभावित थी इसको समझने के लिये यह समझना आवश्यक होगा की क्या है राष्ट्रवादराष्ट्रवाद एक विश्वासपन्थ या राजनीतिक विचारधारा है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने गृह राष्ट्र के साथ अपनी पहचान बनाता या लगाव व्यक्त करता है यह एक ऐसी अवधारणा है जिसमें राष्ट्र को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है यह विचाधारा में कई संशोधन हुए और अन्तः राष्ट्रवाद को हिंदूराष्ट्रवाद से भी पहचान दिलाने के अथक प्रयास हुए - कुछ कामयाबी भी प्राप्त हुई यह भी विचार चर्चा का बिंदु बना कि जन्म के आधार पर खुद को हिन्दू कहने वाले या कहलाने वाले लोग ही भारतीय राष्ट्र के प्रथम नागरिक हो सकते हैं

यह बात सन १९२९-१९३३ के दरम्यान की है जब जर्मनी अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा था वह प्रथम विश्वयुद्ध हार चुका थाउसे वर्सेल्स ट्रीटी (Versailles Treaty) को मानने पर मजबूर किया गया जिसमे जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध का दोषी माना गया और उसके एवज़ में जर्मनी को काफी बड़ी रक़म के आलावा अपनी उपनिवेश बस्ती को छोड़ना पड़ा जर्मनी की आंतरिक स्थिति बहुत ख़राब थी वह बेरोज़गारी और मुद्रास्फीति को अपने काबू में कर सक्ने के भरसक प्रयासो में विफल होता दिखाई दे रहा था ऐसे में जर्मनी के नागरिको को नाज़ी पार्टी से कुछ बेहतर नतीजो की उम्मीद लगने लगी थी

यहाँ यह बताना ज़रूरी हो जाता है की १९३० के शुरू में नाज़ी पार्टी एक लोकप्रिय पार्टी नही थी परन्तु १९३२ के अन्त तक जर्मनी के नागरिक इस बात के प्रति आशावान थे की यदि कोई जर्मनी को उसकी बदहाली से बचा सकता है तो वह केवल नाज़ी पार्टी ही है उसके कारण भी थे उसका नेता एक ऊर्जावान नेता था वह शाकाहारी था शराब नही पीता था चरित्रवान था उसपर भष्टाचार के आरोप नहीं थे वह बेहतरीन वक्ता था उसकी रैलियों में लाखो लोग शामिल होते उसके भाषणों में जोश होता वह यह कहता की वह सबको नौकरी देगा,  मुद्रास्फीति पर लगाम लगायेगाजर्मनी को उसका पुराना सम्मान वापस दिलवाये गा और अच्छे दिन वापस लाने का दावा करता था रैली में जमा लोग उसके सुर में सुर मिला के "अच्छे दिन आने वाले हैको दोहराते थे जर्मनी आशावान था और बड़ी संख्या में युवकफौजीकिसानमज़दूर   तथा जर्मनी का मध्य वर्गीय समाज उसका समर्थन कर रहा था उस नेता का नाम अडोल्फ हिटलर था

१९३२ के अंत तक जर्मनी किसी भी प्रकार के विकल्प के लिए पूर्ण रूप से तैयार था और हिटलर अपने लुभावने सपने दिखाने में व्यस्त था। सब को काम सब को बेहतर ज़िन्दगी युवाओ को सुनहरा भविष्य ने उसकी लोकप्रियता को काफी बड़ा दिया था। जर्मनी की मीडिया और बड़े औद्योगिक घरानों का समर्थन प्राप्त था। ३० जनवरी १९३३ चांसलर का पद हासिल करने में सफल रहा जो मंत्रालयों के कैबिनेट का सबसे उच्च पद था। वोक्सवैगन जर्मनी की कार बनाने वाली कम्पनी उसने हिटलर को चांसलर जैसे उच्च पद को हासिल करने में अत्यधिक सहायता प्रदान की।

यहाँ यह बताना आवश्यक होगा की हिटलर की पृष्टभूमि क्या थी ? हिटलर का जन्म ऑस्ट्रिया में सन १८८९ में मध्य-वर्गीय परिवार में हुआ था। युवा होते ही वह जर्मनी की सेना का हिस्सा बना उसने प्रथम विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया तथा कई शोर्य पदक हासिल किये। वह प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की शर्मनाक हार से आहत था और ट्रीटी ऑफ़ वर्सेल्स ने उसे और उग्र बना दिया था। सेना छोड़ने के बाद उसने जर्मन वर्क्स पार्टी में अपनी जगह बनाई बाद में जिसका नाम बदल के नेशनल सोशलिस्ट जर्मनी वर्कर पार्टी हुआ जो अन्तः नाज़ी पार्टी के नाम से पहचान बनाई। हिटलर का बचपन संघर्षपूर्ण रहा परन्तु उसने कभी चाय या अखबार नही बेचा जैसा कुछ लोगो का कहना है। वह बहुत अच्छा वक्ता था वह जन आंदोलन का अच्छा संचालक के साथ साथ वह लोगो को यह विश्वास दिलाने में सफल रहा की अच्छे दिन आयेगे जो शायद कभी नहीं आये। वह कहता था कि वह एक मज़बूत राष्ट्र का निर्माण करेगा और सबको नौकरी देगा।

मौजूद दस्तावेज़ों के अनुसार जनवरी ३०,१९३३ में प्रेजिडेंट हिंडेनबर्ग के द्वारा हिटलर को चांसलर की ज़िम्मेदारी सौपे जाने के तुरन्त बाद हिटलर अपने सुनियोजित मनसूबो के तहत अपने काम को अंजाम देने में लग गया २८ फ़रवरी १९३३ में हिटलर ने अपने पहले हुकुमनामे को जारी कर समस्त मानव आधिकारो पर प्रतिबन्ध लगा दियाअब बोलने की आज़ादीलिखने की आज़ादी सभा करने की आज़ादी गैर-कानूनी घोषित करार किया गया बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई जिसमे अधिकांश कम्युनिस्ट और डेमोकैट्स और कैथोलिक ईसाई थे उन्हें कॉनसन्ट्रेशन कैंप में रखा गयाविरोध करने वालो को गोली मार दी गयी पुरा जर्मनी नये घटना कर्म को देख रहा था विरोध के स्वरों को कुचल दिया गया

जर्मनी के निवासी पिछले कुछ दशक से अपनी बदहाली से परेशान होने के कारण हिटलर के इस कृत्य को भी देश की और अपनी बेहतरी के रूप में देख रहे थे मार्च  १९३३ में बहुचर्चित इनेबलिंग एक्ट को मन्ज़ूरी दे दी गयी यहाँ इनेबलिंग एक्ट की विषय में थोड़ा विस्तार में बताना आवश्यक होगा इस कानून के अनुसार हिटलर को किसी कानून को पारित और संशोधन के लिये जर्मनी के संसद से मन्ज़ूरी की आवश्यकता नही थी जिसको अन्तः राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडनबर्ग ने हस्ताक्षर किये इस प्रकार हिटलर ने सारी औपचारिकताओं को पुरा कर वह जर्मनी का तानाशाह बन चुका था

उसका समस्त सरकारी प्रतिष्ठापन पर क़ब्ज़ा कर उनमे कार्यरत लोगो को कन्सेन्ट्रेशन कैंप में भेज दिया और उनकी जगह फौजी हुकुमरानों ने ले ली मीडिया और न्यायतंत्र पर पूर्ण रूप से हिटलर के अधीन थे और उसका समर्थन कर रहे थे अब हिटलर की सबसे बड़ी प्राथमिकता उस समाज का निर्माण था जो नाज़ी परिकल्पना के अनुरूप हो

हिटलर मन की बात करता लोगो को नाज़ी समाज की विशेषताओ से अवगत करवाता और लोगो में उत्साह भरता उसका व्यापक असर यह हुआ की लोग दुनिया और देश को नाज़ी की नज़र से देखने लगे अपने यहुदी पडोसी के घरो को चिन्हित करते ताकि उन्हें मारा या कॉनसन्ट्रेशन कैंप के हवाले किया जा सके लाखो की संख्या में नाज़ी में शामिल होने के आवेदन आने लगे मगर यह कहना भी अनुचित होगा कि पुरा जर्मनी हिटलर के साथ था एक बहुत बड़ा धड़ा दबे स्वर में उसकी कार्यशैली पर सवाल उठा रहा था

हिटलर सत्ता हतिया चुका था और उसने अपने तुरन्त दिये हुकुमनामे से अपनी सत्ता के स्वरुप और कार्यशैली के विषय में देश को अवगत करा दिया था। अब समस्त सरकारी प्रतिस्थानों में सेना के अधिकारियो ने काम-काज अपने हाथो में ले लिया था अधिकांश सरकारी मुलाज़िम जेल में भेजे जा चुके थे। वह मीडिया को अपने अधिकार में ले चुका था - मीडिया उसकी प्रसंशा में शोर्य गाथा का बखान कर रही थी हिटलर कम अंतराल पर "मन की बातसे फ़ौज और जर्मनी के नागरिको तक अपनी बात पंहुचा रहा था। अब वह समय  गया था जब सामाजिक संरचना नाज़ी अवधारण के अनुसार की जाये। 

प्रेजिडेंट हिंडेनबर्ग की मौत के बाद हिटलर ने राष्ट्रपति कार्यालय को चांसलर कार्यालय में विलय कर दिया अब वह पूरी तरह से जर्मनी का तानाशाह बन चुका था। उसका प्रचार प्रसार(propaganda) तंत्र बहुत मज़बुत और असरदार था। हिटलर और उसके प्रचार-प्रसार तंत्र ने इस बात का पुर्ण रूप से अपनी बात लोगो तक पहुचने में निपुण था वह ईसाई बाहुल्य समाज को विश्वास दिलाने में सफल रहा की ईसा की हत्या यहूदियो के द्वारा की गयी थी अर्थात उन्हें जीने का अधिकार नहीं है फिर क्या था लोगो ने यहूदियो को चिन्हित कर फौजी अधिकारियो को बताना शुरू कर दिया और इस प्रकार शुरू होता है यहूदियो का नरसंघार। नाजियों 'प्रचार हमले के एक प्रमुख साधन साप्ताहिक नाजी अखबार डेर Stürmer (हमलावरथा। हर मुद्दे के पहले पन्ने के नीचेबोल्ड अक्षरों मेंयह घोषणा की जाती, "यहूदियों हमारा दुर्भाग्य रहे हैंडेर Stürmer भी नियमित रूप से यहूदियों के कार्टून जिसमें वे के रूप में झुका नाक और बनमानुष नुमा झुकी कमर से चित्रित किया जाता। १९३८ में पत्रिका की डेढ़ लाख प्रतियों वितरित कि गयीअखबार के प्रभाव दूरगामी था। इसी दौरान मौजुदा दस्तावेजो के अनुसार लगभग ६० लाख यहूदियो की हत्या की जा चुकी थी जो दुनिया में यहूदियो की कुल आबादी का दो तिहाई थी। रिकार्ड्स के अनुसार १९३९ तक लगभग १६यहूदी नौकरी या छोटे कारोबार से अपनी जीविका चला रहे थे बाकि या तो कंसेंटेशन कैंप में थे या उनकी हत्या कर दी गयी थी

नमस्कार मित्रोअपनी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए आज हमारा प्रयास होगा कि नाज़ी समाज की संरचना क्या थी तथा उसमे महिलाओ की भूमिका क्या रही। यह बात ध्यान देने योग है कि १९३३-१९४५ के समय में जब हिटलर सत्ता में था उस समय समाज के विभिन्न अंगों की भूमिका का निर्धारण सत्ता के द्वारा तय किया जाता था तथा आदेशो की अवहेलना करने वाले व्यक्ति को कठोर यातना का फल भोगना होता था। आज ७० सालो के बाद हिटलर घृणा का नाम है परन्तु विभिन्न देशो में उसके प्रशंसक जीवित है और उसके द्वारा दी गयी नाज़ी विचारधारा की सरहाना करते है या सत्ता में आने के पश्यचात उसको किसी  किसी रूप में अमल में लाने के प्रति वचनबद्धता दर्शाते है जबकि उन्हें यह ज्ञान है की एक ऐसी विचारधारा जिसको पुरे विश्व ने नकार दिया हो उसे दोबारा जीवित करना आसान  होगा। 

नाज़ी समाज में महिलाओ की भूमिका बहुत विशेष थी और नाज़ी समाज की अवधारणा को पूर्णरूप से किर्यान्वित करने की दिशा में एक मज़बुत पहल के रूप में देखा जाता है। हिटलर इस विषय में बहुत ही स्पष्ट था उसका यह कहना था की महिला की भूमिका घर के भीतर है नाकि घर के बाहर। महिला के मुख्य ज़िम्मेवारी घर का रखरखाव और एक सुन्दर घर की स्थापना ताकि पति घर में आराम की अनुभूति कर सके तथा स्वस्थ बच्चे को जन्म देना जो नाज़ी योग्यता के अनुकूल हो तथा उनके संस्कारो में नाज़ी संस्कार हो। महिलाओ को इसके लिये प्रशिक्षण भी दिया जाता। 

शुरुआती दिनों में लड़कियों/महिलाओ को स्कूल में यह ज्ञान दिया जाता की उन्हें कम उम्र में स्वस्थ एवम प्रबल युवक को चिन्हित कर उससे शादी कर घर बसा लेना चाहिये। अच्छा और आरामदेह घर की अवधारणा के प्रति ज्ञान दिया जाता ताकि कामगर पति को किसी प्रकार की असुविधा  हो। १९३३ में हिटलर सत्ता में आते ही उसके शुरुआती दिनों में एक नया कानून पारित किया गया जो महिलाओ को जल्दी शादी करने तथा कम से कम  बच्चे पैदा करने के लिये प्रोत्साहित करता था कानून "Law for the Encouragement of Marriage" के नाम से जाना जाता है। इस कानून के प्रावधानों के अनुसार जल्दी शादी करने वाले जोड़ो को सरकारी कोष से १००० मार्क(जर्मन मुद्रादिये जाने का प्रावधान था जो की उस समय के  माह के वेतन के समतुल्य होता था। इस योजना का लाभ उठाते हुए ८००००० महिलाओ ने अपनी पसन्द के स्वस्थ एवम प्रबल युवको से विवाह किया। इस योजना का उत्साहवर्धक परिणाम सामने आयेयुवा उत्साहित थेइस कर्ज़े की आदायगी भी बेहद दिलचस्प थी। यदि महिला पहले स्वस्थ और आर्यन विनिर्देश के अनुसार बच्चे को जन्म देती है तो बतौर कर्ज़ १००० मार्क में से २५क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाता। इसी प्रकार  स्वस्थ बच्चे पैदा करने के पुरा क़र्ज़ माफ़ कर दिया जाता। इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्वस्थ युवा की आबादी में बढ़ावा जो आगे चल नाज़ी फ़ौज का हिस्सा बन सके। 

जैसा हम पहले चर्चा किया की नाज़ी समाज की क्या स्तिथि थी और किस प्रकार एक कानून के तहत महिलाओ को जल्दी शादी और कम से कम  बच्चे पैदा करने के किये अधिकृत किया गया था बाद में इस कानून को निरस्त कर दिया गया

इस कानून का मुख्य उद्देश्य नाज़ी आबादी को बढ़ाना था जो नाज़ी संस्कारो से युक्त नाज़ी सेना का प्रमुख अंग बन सके इस के पीछे नाज़ी लीडरशिप की अवधारणा यह भी थी की जर्मनी की उन्नति के साथ एक बड़े कामगारों की सेना की आवश्यकता को पुरा करने के किये हिटलर को नाज़ी संस्कार युक्त बड़े पैमाने पर युवको की आवश्यकता होगी जर्मनी की संभावित बड़ी हुई आबादी को ध्यान में रखते हुए यूरोप ने अपने देश में गर्भ निरोधक दवा एवं गर्भपात के कानूनों में संशोधन किया इस बात का प्रावधान था यदि एक पति अपने परिवार में  बच्चे पैदा करने के पश्चात् और बच्चे पैदा करने की इच्छा रखता है तो आपसी सहमति से किसी दूसरी औरत से और बच्चे पैदा करने के लिये स्वतंत्र था परन्तु इस प्रावधान को कानून की शक्ल नही दी जा सकीनाज़ी नेतृत्व का यह सोचना था की अतरिक्त बच्चे पैदा करने वाले प्रावधान को कानून का रूप देने से समाज में अराजकता फैल सकती है

नाज़ी समाज में औरतो को घर के बाहर काम करने की आज़ादी नहीं थी जबकि वेइमार जर्मनी में १००००० शिक्षिका३००० महिला चिकित्सक१३००० महिला संगीतकार काम करते थे १९३३ में हिटलर के सत्ता में आने के बाद इन सारी महिलाओ को नौकरी से निकाल दिया गया १९३७ में कौशल की कमी को ध्यान में रखते हुए महिलाओ को कारखाने में काम करने की अनुमति प्रदान की गयी इसी साल महिलाओ को मिलने वाला १००० मार्क का बच्चे पैदा करने को बढ़ावा देने वाले कानून को निरस्त कर दिया गया

महिलाओ की वेश-भूषा के विषय में भी हिटलर के द्वारा दिशा निर्देश जारी किये गये थे और उनका अनुपालन  करने पर कठोर दण्ड के प्रावधान थे महिलाओ को परंपरागत परिधान धारण करने की सलाह दी गयी थी जीन्स या अन्य किसी प्रकार की पोशाक पर प्रतिबन्ध था वह फैशन नहीं कर सकती थीबालो को रंगना मना था,फ्लैट जूते प्रतिबंधित थे और अपने शरीर को सुन्दर और दुबला रखने हेतु किसी भी प्रकार की औषधि का प्रयोग वर्जित था नाज़ी हुक़ूमत का यह मान्यता थी ऐसा करने से महिलाओ में प्रजनन में कठिनाई  सकती है प्रत्येक वर्ष १२ अगस्त को हिटलर की माँ के जन्मदिन धुमधाम से मनाया जाता था तथा उसी दिन सबसे अधिक स्वस्थ बच्चे पैदा करने वाली महिलाओ को समानित किया जाता था जो महिला  या उससे अधिक स्वस्थ बच्चे पैदा करती उसे गोल्ड क्रॉस से और  बच्चे पैदा करने वाले को सिल्वर और क्रमशा ब्रोंज क्रॉस से नवाज़ जाता

अब यह समझ में आया की अपने देश में महिलाओ को - बच्चे पैदा करने के लिये बिना बच्चे वाले क्यों प्रोत्साहित करते है तथा महिलाओ को घर में रहने की नसीहत किस आधार पर दी जाती हैजीन्स पहनने से बलात्कार की घटना में इज़ाफ़ा होने का तर्क कहाँ से आया महिलाओ के प्रति संकीर्ण मानसिकता के पीछे का सत्य क्या है