सुखा पीड़ित को नज़रअंदाज़ करना क्या एक खुनी संघर्ष को आमंत्रित करना है - नाना पाटेकर
साधारण कुर्ते पायजामा पहने और कुर्ते की आस्तीन कोहनी तक मोड़े यह व्यक्ति कौन है - भाई यह बॉम्बे के फ़िल्मी जगत का जाना माना व्यक्ति नाना पाटेकर है जो आपने व्यस्त जीवन में से हफ्ते में दो दिन मराठवाड़ा और विदर्भ के किसानो के लिये निकाल कर उन्हें यह समझने का प्रयत्न करता है की आत्महत्या समस्या का समाधान न है न हो सकता है। वह नित्य मराठवाड़ा और विधर्भ के सुखा पीड़ित किसानो की आर्थिक मदद के अलावा इस बात का भी भरोसा दिलाते देखे गये है की वह ऐसा न करे और कम से कम आत्महत्या करने से पहले उनसे फ़ोन पर बात करे ताकि उन किसानो की समस्या का फौरी तौर समाधान किया जा सके।
फ़िल्मी स्केन पर सख्त और गुस्सवर इन्सान का यह मानवीय पहलु सराहनीय है और अनुशरण करने योग्य है। यह उन नेताओ पर कटाझ है जो पांच सितारा होटल में बैठ कर देश को भोजन देने वाले किसानो की समस्या का निराकरण करते अक्सर दिख पड़ते है यह उन चुनिंदा नेताओ के मुह पर तमाचा है जो सार्वजनिक बयान देते है की नहर में पानी नहीं है मेरे मुतने से काम चल जाये तो बताओ। नाना NDTV को दिये अपने एक साक्षात्कार में बताया की उन्होंने शुरुआत में इस मुहीम को अपने द्वारा अर्जित की गयी कमाई और बचत से इस अभियान को प्रारम्भ किया और अब उनके इस सराहनीय कार्य को देख कर बहुत से उनके मित्र और प्रशंसक इस मुहीम का हिस्सा बनने को इच्छा रखते है।
आज दुःख की बात है देश के सामने नाना प्रकार की समस्या मुह बाये खड़ी है और सरकार उदासीन, मीडिया की अनदेखी का आलम यह है की उसे इन्द्राणी के पतियों की गिनती और उनके आपसी सम्बन्धो को खोजने और कड़ी जोड़ने के अलावा कोई विशेष कार्य नहीं बचा है। यह बात साफ़ तौर पर समझ लेनी चाहिये जो व्यक्ति अपनी जान ले सकता है वह दूसरे की भी हत्या करने में संकोच नही करेगा और वह स्थिति भयानक होगी, खुनी संघर्ष होगा और तानाशाहों का तख्ता पलट जाये गा। वह एक नये इन्क़लाब की बुनियाद होगी।
क्या सरकारे उसी दिन के इंतेज़ार में है।
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