मौलाना सलमान हुसैनी नदवी और आतंकवाद एक नज़र
नाम मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी यकायक चर्चा का विषय बन गये आखिर कौन है मौलाना नदवी। मौलाना नदवी भारत के प्रतिष्ठा इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम नदवा, लखनऊ, में शरीयत के संकाय के डीन है जाहिर है की वह इस्लामी सर्किल में एक प्रभावशाली धर्मशास्त्री और उर्दू और अरबी में अनेक धार्मिक पुस्तको के लेखक प्रचण्ड विद्वान, एक बड़ा नाम। यह बताना गलत न होगा की मौलाना सलमान हुसैनी नदवी सुन्नी मत के नामचीन वेदान्ती है। दारुल उलूम नदवा, लखनऊ, का स्थान दारुल उलूम, देवबंद के समकक्ष है। इसके अलावा मौलाना ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की अदालत, अपने उच्चतम निर्णय लेने वाली संस्था के एक सदस्य है।
हालिया दिनों में मौलाना सैयद सलमान का सऊदी सरकार को लिखा अरबी में एक भावुक पत्र चर्चा का विषय बना हुआ है और उस पत्र के माद्यम से मौलाना ने इस बात की इच्छा जताई है की वह सऊदी सरकार को भेट स्वरुप ५००००० भारतीय सुन्नी युवा मुसलमानो का एक मिलिशिया देना चाहते है जो "शक्तिशाली वैश्विक इस्लामी सेना" का हिस्सा होंगे तथा जो ईराक़ में शिया मुसलमानो के ख़िलाफ़ तथाकथित ख़लीफ़ा बग़दादी की मदद करेंगे। मौलाना के द्वारा लिखे पत्र से भारत के मुसलमानो यहां तक कि रूढ़िवादी मुसलमानों को झटका लगा है।
विद्वान मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी का मत है है की यह इनको आतंकी कहना गलत होगा तथा यह ग्रुप भविष्य में वह एकल "शक्तिशाली वैश्विक शक्ति" में खुद
को बदल सकता है और सभी जिहादी संगठनों की 'परिसंघ "एक के लिए बुलाया गया और नेक काम"' है का सुझाव दिया।
इससे पहले, मौलाना नदवी ने अबू बकर अल बगदादी, कुख्यात सुन्नी आतंकवादी गुट इराक और सीरिया (आईएसआईएस) के इस्लामी राज्य और वह इराक सीरिया सीमा पर स्थापित करने की बधाई दी और 'खलीफा' को मान्यता दी है। अबू बकर अल बगदादी ने इराक में हज़ारो मुसलमानो को क़त्ल किया इस्लामिक और ईसाई महत्व की इमारतों को नेस्तनाबूद करने तथा शरीयत प्रशासन लागू कर झेत्र में भय का पर्याय बना हुआ है। हालिया फ़तवे के माद्यम से बगदादी हुकूमत ने छेत्र में रहने वाली महिलाओ को ख़तना करवाने का हुकूम जारी किया है।
नदवी ने बगदादी को मुबारकबाद दे कर और 'खलीफा' को मान्यता देकर वे ऐसा करने वाले पहले एशियाई धर्मशास्त्री है। ऐसा में नदवी ने वैश्विक इस्लामीकरण प्रवृत्ति को ललकारा है और युवा भारतीय मुसलमानों की बढ़ती कट्टरता को प्रोत्साहित किया जो चिंता का विषय है। मुस्लिम मिलिशिया जुटाने के उनके प्रस्ताव जो विदेशी भूमि पर लड़ने हेतु भारतीय सुन्नी मुस्लिम युवा को प्रेरित करता है, जिससे सामान्य रूप से भारतीय मुस्लिम क्वार्टर में एक हलचल पैदा कर दी है। इसके परिणाम स्वरुप मुंबई के चार शिक्षित मध्यम वर्ग मुस्लिम लड़कों (दो इंजीनियरिंग छात्रों, एक मेडिकल छात्र, और एक कॉल सेंटर की कर्मचारी) इराक और सीरिया में एक शातिर सांप्रदायिक युद्ध ज़िहाद में शामिल होने हेतु अपने देश से भाग गए हैं और अपने माता-पिता को यह सन्देश भेजा है की अब उनसे उनकी मुलाकात जन्नत में होगी। इस प्रकार के सन्देश प्रसारित होने से भारतीय सुन्नी मुस्लिम युवा जो वहाबी विचारधारा के पोषक है उनमे आतंकी गतिविधि में शामिल होने की होड़ लगने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह भी सवाल उठना शुरू हो गया है की क्या सुन्नी - वहाबी विचारधारा पोषक युवा पाकिस्तानी युवाओं के रास्ते जा रहे हैं। नदवी का बेतुका प्रस्ताव और सऊदी अरब सरकार को अरबी में लिखा गया पत्र भारत में सक्रीय विभिन्न इस्लामिक चरमपंथियों के किये उत्साहवर्धक सन्देश है और उनको उनके मिशन के प्रति उत्साहित करने वाला कदम। अब समय आ गया है की मुसलमानो को यह तय करना होगा की वह वहाबी विचारधारा उनके और उनके परिवार के लिए घातक है या नहीं तथा वहाबी विचारधारा इस्लामिक मूल विचारधारा से किस प्रकार भिन्न है, अब हिंदुस्तानी मुसलमानो को दो श्रेढ़ी में विभाजित करना भी आवश्यक होगा १. वहाबी विचारधारा का पोषक २. गैर-वहाबी अन्यथा सारे मुसलमानो पर आतंकी या आंतकवाद के लेबल लगने से बचाया जा सके। यह भी ज़रूरी होगा की मौलाना नदवी को मुस्लिम युवाओं कट्टरपंथी में लगे हुए उग्रवादी तत्वों को प्रोत्साहित / आतंक भड़काने के खिलाफ भारतीय कानून तोड़ा है तथा उनके आचरण की उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिये और भारितीय दंडसहिता के अन्तर्गत आंतकवाद को प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न धाराओ में मुकदमा कायम होना चाहिये। मौजूदा सरकार की चुप्पी पुरे मामले को और रहस्यमय बना रही है।
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