बुधवार, 30 सितंबर 2015

Asad Jafar: दादरी मोहम्मद अखलाक़ की दर्दनाक मौत के बाद यह स...

Asad Jafar:
दादरी 

मोहम्मद अखलाक़ की दर्दनाक मौत के बाद यह स...
: दादरी  मोहम्मद अखलाक़ की दर्दनाक मौत के बाद यह सवाल पैदा होता है की गॉव और शहरों में क्या पुलिस की ज़िमेदारी अब तथाकथित कट्टर हिन्...


दादरी 



मोहम्मद अखलाक़ की दर्दनाक मौत के बाद यह सवाल पैदा होता है की गॉव और शहरों में क्या पुलिस की ज़िमेदारी अब तथाकथित कट्टर हिन्दू विचारधारा के संगठन निभायेगे और पुलिस घटना के उपरान्त होने वाली औपचारिकता को पूरा करने के लिये ज़िम्मेदार होगी। इंडिया एक्सप्रेस के अनुसार दादरी स्थित गॉव बिसारा के १० कम की परिधि में एक गुमनाम संस्था जिसका नाम समाधान सेना बताया जा रहा है और उसका संचालक गोविन्द चौधरी पिछले ४ महीनो से सक्रीय है और गाय के क़त्ल और तस्करी की झूटी अफवाह फैला कर कुछ दिनों पहले भी ३ मुस्लमान युवको को पीट पीट के मौत की आगोश में पंहुचा चुके है। 
पहला सवाल : क्या पुलिस और लोकल इंटेलिजेंस यूनिट को समाधान सेना के विषय में कोई जानकारी है?
दूसरा सवाल : क्या पुलिस और लोकल इंटेलिजेंस यूनिट ने इनकी गतिविधियों की जानकारी राज्य सरकार और अपने आला अधिकारियो को दी, यदि दी तो उसके रद्देअमल में संस्था के खिलाफ क्या कार्यवाही हुई और यदि सुचना नहीं दी तो क्यों नहीं दी क्या सम्बंधित थाने के अधिकारियो को हत्या के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना जाना चाहिये ?
तीसरा सवाल : संस्था के मुखिया गोविन्द चौधरी को जारचा गॉव के प्रधान के लड़के को मारने की आरोप में गिरफ्तार किया गया था और पिछले हफ्ते उसको ज़मानत मिली है, उसके आपराधिक इतिहास को देखते हुए ज़मानत कैसे मिली और क्या पुलिस या सम्बंधित विभाग किसी उच्च न्यालय में उसकी ज़मानत को चुनौती देने हेतु आवेदन किया ?
ज्ञात हो समाधान सेना पिछले कुछ महीनो से स्थानीय मुसलमानो को गॉव छोड़ने और और उनकी दुकानो को ख़ाली करने की मुहीम चला रही है और स्थानीय प्रशासन उससे अनजान रहे ऐसा मुमकिन नहीं है। यदि मुसलमानो से इतनी ही नफरत है तो खुल के ऐलान क्यों नहीं कर देते, हंगरी की तरह हम भी शरणार्थी बन किसी भी देश की शरण में चले जायेगे जहाँ सुकून हो मेरे और मेरे परिवार की सुरक्षा हो, आज़ादी हो। जहाँ हिन्दू राष्ट्र नेपाल लोकतंत्र को अपने संविधान में शामिल कर लोकतंत्र में अपनी आस्था की मिसाल दुनिया के सामने रख रहा है वही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के प्रति कृत्यसंकल्प है, दुःखद।

शनिवार, 19 सितंबर 2015

सामाजिक धुर्वीकरण का ताज़ा उदाहरण अहमदाबाद



सामाजिक धुर्वीकरण का ताज़ा उदाहरण अहमदाबाद में देखने को मिला वह भी उस राज्य से जहा से प्रधानमंत्री आते है और "सब का साथ सबका विकास" का नारा और गुजरात मॉडल के आधार पर या तर्ज़ पर हिन्दुस्तान का विकास करने दावा करने वाली सरकार के राज्य में हिन्दू बाहुल्य छेत्र को हिन्दुस्तान और मुस्लमान बाहुल्य छेत्र को मिनी पाकिस्तान या पाकिस्तान के नाम से चिन्हित किया गया है यह मुस्लमान बाहुल्य वह इलाके है जहाँ २००२ के दंगो के उपरान्त बड़े पैमाने पर शहर के मुसलमानो के अस्थायी पुनर्वास किया गया था हिन्दू और मुस्लमान आबादी को विभाजित करने वाली सड़क को बॉर्डर का नाम दिया गया है टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार यह सड़क साझा स्थान है ना ही हिन्दुस्तान की है और नाहि पाकिस्तान की मुसलमानो की बड़ी आबादी जुहापुरा को मिनी-पाकिस्तान और हिन्दुओ की बड़ी आबादी वेजलपुर को विभाजित करती यह सड़क "वगह बॉर्डर" के नाम से चिन्हित की जाती है आश्चर्य की बात यह है की इस व्यवस्था को सरकारी दस्तावेज़ों में इसी प्रकार दर्ज किया गया है

यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक विवाद को लेकर कुछ लोगो की रखीअल पुलिस ठाणे में बबलू अज़ीज़भाई और फैज़ान अज़ीज़भाई निवासी वात्वा - पाकिस्तान के नाम से प्राथमिकी दर्ज की गयी उसी प्रकार थाने नालासोपारा जहाँ ५०० के लगभग मुसलमानो की आबादी है और बिजली / पानी की सुविधा प्राप्त है उसे सरकारी दस्तावेज़ में छोटा पाकिस्तान के नाम पर दर्ज दिखाया गया है

इसी सन्दर्भ में साबरमती के किनारे बसाये गये ४००० परिवार जिसमे २५०० मुस्लमान और दूसरे ब्लॉक में पुनर्स्थापित किये गए १५०० परिवार हिन्दू और मुस्लमान दोनों है जिनका मकानो का आवंटन जाति के आधार पर किया गया है इसका निर्माण अहमदाबाद म्युनिसिपल कारपोरेशन ने पांच साल पहले किया था इस प्रकार समाज पूर्ण रूप से विभाजित है और हर समाज की कोशिश है की वह आत्मनिर्भर रहे और किसी भी प्रकार की निर्भरता रखे

रखीअल पुलिस निरीक्षक बरकत अली चावड़ा कहते है यह बड़ा सामान्य है वहां रहने वाले लोग भी पाकिस्तान के निवासियों के रूप में खुद की पहचान करवाते है और प्राथमिकी में पते के रूप में पाकिस्तान दर्ज करने का आदेश उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से प्राप्त हुआ था और आदेश के प्रतिपादन हेतु पकडे गए दोनों भाईयो के स्थानीय पते पर पाकिस्तान लिखा गया

इन दोनों आबादी के दरमियाँ एक इलाक़ा और है जिसमे हिन्दू-मुस्लमान मिल-जुल कर रहते है सरकारी दस्तावेज़ में इलाके का नाम दर्ज है "सद्भावना कॉलोनी" टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार पिछले साल पहले इस मौहल्ले में पथराव की घटना पेश आयी तो सरकार ने एक पुलिस चौकी स्थापित कर दी जो अभी मौजूद है उसका नाम है "सद्भावना पुलिस चौकी" समीर शेख़ बताते है की अब हम लोग इस बात के आदि हो चुके है अब ऑटो वाले भी मौहल्लो को इसी नाम से जानते है और अब यह मौहल्ले अहमदाबाद की पहचान बन चुके है

गुजरात मॉडल की जय हो इंसान बाटा, मौहल्ले बाटे बाट दिये इन्सान




शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

साइबर बुलीइंग क्या है

साइबर बुलीइंग क्या है


साइबर बुलीइंग क्या है आसान शब्दों में यह इंटरनेट पर गुण्डागर्दी के सिवा कुछ नहीं है और इसकी ज़द में आये लोग उसी प्रकार परेशान हो जाते है जैसे मोहल्ले का गुण्डा रोज़ाना किसी व्यक्ति विशेष को सुबह-शाम आते जाते छेड़े, उसका चरित्र हनन करे और उसके विषय में झूठी, मनगढ़ंत अफवाहों को प्रचारित करे यह सब जब इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से होता है तो उसे इंटरनेट बुलीइंग कहते है जो वास्तविक गुंडागर्दी से अधिक प्रभावी होता है और असहनीय भी यह भी देखने सुनने में आता है की कमज़ोर लोग इस बुलीइंग से तंग आकर आत्महत्या तक कर लेते है

आज युवा पहले से कहीं ज्यादा इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं और ज्यादातर इसका उपयोग घर से किया जाता है स्कूलों में इंटरनेट के प्रयोग अध्यापक की निगरानी में होता है आज इंटरनेट ने हमारे नित्य-प्रतिदिन के कार्यो और दिनचर्या में इतनी पैठ जमा ली है की यदि किसी कारण सर्वर डाउन हो और इंटरनेट बन्द हो जाये तो अधिकांश युवा/आप आदमी असहज हो जाता है बच्चो के सारे पाठ्यक्रम, अध्यन सामग्री होम वर्क सभी ईमेल के माध्यम से प्राप्त होता है यह तक की कई बच्चों ट्यूशन भी ऑनलाइन लेते है सवालो के जवाब, स्कूल के प्रोजेक्ट के काम भी कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से ही सम्पन होता है इंटरनेट बस के अनुसंधान के लिए एक सुविधाजनक तरीका या एक मजेदार आफ्टरस्कूल गतिविधि नहीं है - यह उनके सामाजिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा है लेकिन कई अन्य सामाजिक स्थितियों की तरह, कुछ बच्चे एवं युवा ऑनलाइन धमकाने चरित्र हनन, अपने सहपाठियों की अश्लील चित्र डाल कर उन्हें परेशान करने में भी आनन्द की अनुभूति प्राप्त करते है जो साइबर बुल्लिंग का निराशाजनक पहलु भी है उससे बचने के लिये राज्य एवं केंद्र सरकार ने साइबर सेल का गठन किया है परन्तु अफ़सोस के साथ कहना होगा की वह इनता प्रभावी नहीं है जितना होना चाहिये

ऑनलाइन धमकाने के कुछ साधारण तरीके जिसके द्वारा बच्चे / युवा / वा असामाजिक तत्व किसी व्यक्ति विशेष के साथ साइबर बुलीइंग को अपना साधन बनाते है:

* ईमेल, त्वरित संदेश, या पाठ संदेश
* नकली ईमेल ID या सोशल मीडिया की ID से झूठी और भ्रम की स्थिति पैदा करना
* व्यक्ति विशेष का ईमेल/सोशल मीडिया एकाउंट हैक कर आपत्तिजनक तथ्य डालना ताकि   व्यक्ति
  विशेष को अपमानित होना पड़े तथा उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को  नुक्सान पहुंचे
* फोटोशॉप का प्रयोग कर व्यक्ति विशेष का चरित्र हनन करना
* ऑनलाइन या टेक्स्ट संदेशो के माध्यम से अफवाहें फैलाना
* सामाजिक नेटवर्किंग साइटों या वेब पन्नों पर हानिकारक या धमकी भरे संदेश की पोस्टिंग करना

साइबर बुलीइंग के प्रभाव

साइबर धमकी के शिकार लोग अपने को समाज से अलग-थलग पड़ने लगते है उनके पास इस समस्या से निपटने के कारगर उपाय नहीं सुझते अक्सर वह उन्हें अपने आत्मसम्मान में गिरावट की अनुभूति होती है, उनके अवसाद में जाने का ख़तरा बढ़ जाता और यह भी देखा गया है की वह अवसाद की स्थिति में आत्महत्या तक कर लेते है


साइबर बुलीइंग के बचाव का कोई कारगर तरीका मेरी नज़र में नहीं आया परन्तु यह आवश्यक है की समस्त आपत्तिजनक टेक्स्ट और सामग्री को सेव कर अपने शहर क़स्बे और करीबी पुलिस के साइबर सेल से संपर्क करे और बेझिझक समस्त जानकारी से अवगत करवाये मुजरिम तक पहुचने का असरदार तरीक़े मौजूद है और साइबर बुलीइंग की समस्या से नजात पाई जा सकती है