सोमवार, 31 अगस्त 2015

ख़ाकी निक्कर मार्ग 





मैंने आज तय किया है "खक्की निक्कर मार्ग" पर जा कर देखुंगा की नाम बदलने से और क्या क्या बदला है। ऐसे तो मै अक्सर औरंगज़ेब मार्ग से गुज़रता हो परन्तु नाम बदलने के बाद वहाँ जाने की अपनी प्रबल इच्छा को टाल न सका और पहुंच गया "खाकी निक्कर मार्ग।" अपनी खोजी नज़रो से निक्कर मार्ग का शुरू से अन्त तक जायज़ा लिया वही बंगले वही पेड़ वही लोग, न लोगो की तासीर बदली है न सड़क की। वह लोग ख़ुशी मना रहे है जो आज की मौजुदा परेशानियों से लोगो का ध्यान बाटना चाहते है और अपने को भारत का असली सपूत और राष्ट्रवादी कहते है। 
ऐसे तो बदलने के लिये दिल्ली में बहुत सारी सड़के है जो दुनिया के उन विभूति को समर्पित है जिन्होंने समाज और मानवता के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया और इतिहास के पन्नो में अपना नाम दर्ज कराने में सफल रहे हमने उनको सदा याद रखने के इरादे से उनके नाम से विभन्न मार्गो को चिन्हित कर दिया। आज हमारे राष्ट्रवादी उन लोगो के नाम को उन लोगो के नाम से बदल देना चाहते है जो इतिहास के पन्नो में समलित होने का सौभाग्य प्राप्त न कर सके। 

क्यों न नेल्सन मण्डेला का नाम बदल के महान क्रन्तिकारी नाथूराम गोडसे मार्ग कर देना चाहिये। आखिर कौन है नेल्सन मण्डेला जिसने रंग-भेद को खत्म करने के लिए अपने जीवन के २७ साल जेल में गुज़ारे जिसको रोनाल्ड रीगन और मार्ग्रेट थैचर ने आतंकवादी की संज्ञा दी। ऐसे आतंकवादी को भारत की ज़मीन पर आदर क्यों? नेल्सन मण्डेला के विचारो की इस देव-भूमि पर क्या स्थान है जहाँ आज भी खाप पंचायत अपने फ़रमान जारी करते हो जहाँ दलित बच्चियों के साथ बलात्कार होते हो जहाँ पंचायते सज़ा के नाम पर कमसिन लड़कियों के साथ बलत्कार का हुकुम सुनाते हो। वहाँ नेल्सन मण्डेला जैसे आतंकी का कोई स्थान नहीं है - बदल दो नेल्सन मण्डेला को नाथूराम गोडसे से जो अधिक वास्तविक और प्रभावी है। 

यह राष्ट्रवादियो के सोचने का विषय है यह है तीसरी सड़क "आर्कबिशप मकारियोस मार्ग": इस सड़क को नये नामांतरण की सूचि में आना चाहिये और मेरा सुझाव है इसका नवीनतम नाम आर्कबिशप आशाराम बापू मार्ग रखने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। चाहे तो "आर्कबिशप" का हिंदी में कोई उपयुक्त शब्द ढूंढ ले बेहतर होगा। इस देव-भूमि पर ईसाई का कोई स्थान नहीं है इसको लन्दन भेजो। 

दिल्ली न जाने ऐसे कितने नामो से पटी पड़ी है जिनका नाम बदल कर राष्ट्रवादियो के नाम पर रखा जा सकता है आशा है टीम इंडिया बिहार चुनाव के बाद प्रधानमंत्री जी को इस विषय में अवगत कराये गी और नाम बदलने के क्रम में तेज़ी आये गी। एक सड़क का नाम और मेरे दिमाग में आता है जिसको jnu के झोलाछाप व्यक्ति के नाम पर रखा गया था जिसने समाज को बदलने में अपनी क़ुरबानी दी। जिसने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से समाज को आईना दिखने की कोशिश की और सदा की पूंजीवादी और राष्ट्रीयवादियो के निशाने पर रहा। "सफ़्दर हाश्मी मार्ग" जो उसके कार्यो को समर्पित है, अब उसके विचारो आवश्यकता नहीं रही तो उसके नाम की सड़क क्यों?

आज मै सोच कर ख़ुशी महसूस करता हूँ की पिछले शासको ने आमिर खुसरो, हज़रात निजामुद्दीन और उनके सरीके के महान सूफियों को इस सड़क की राजनीती में नहीं घसीटा वरना आज उनके साथ होने वाली दुर्दशा के बारे में सोच कर दिल सिहर जाता है। 

बुधवार, 19 अगस्त 2015


मोदी का विशेष पैकेज 




प्रधानमंत्री के द्वारा बिहार को दिये जाने वाले विशेष पैकेज की घोषणा जिस नाटकीय अंदाज़ में की गयी जैसे किसी प्रदेश की नीलामी हो रही हो जो संवेदनाहीन और राज्य के लोगो और सत्ता में बैठी सरकार का अपमान है। अफ़सोस की बात यह है की भीड़ में बैठे बिहार के रहवासी उत्साह से तालिया बजा रहे थे। बिहार ऐसा राज्य है जहाँ सवेरा होते ही लोगो का छोटा छोटा समुह चाय की दूकान पर चाय की चुस्की के साथ वहाँ मौजुद २-३ समाचार पत्रो को ध्यान से पढ़ राजनैतिक चर्चा का अंग बन जाता है। नीबू की चाय फूटपाथ के चाय के खोनचे की शान होती है जो हर वर्ग का आदमी पिता है, मेरे कहने का तात्पर्य यह है की हर बिहारी राजनैतिक रूप से सजग और सक्रिय है। दिया गये 1.25 लाख करोड़ रुपये के विशेष पैकेज लेकिन कोई समय सीमा या धन का संभावित स्रोत के ब्रेक अप सूचीबद्ध किया गया हो उसकी जानकारी नहीं दी गयी गयी है। रुपये 54,713 करोड़: एक सबसे बड़ा घटक राष्ट्रीय राजमार्गों पर किए गए वादे के अनुसार खर्च होना संभावित है। इससे पहले इस साल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार से सहायता के रूप में रुपये 1.10 लाख करोड़ रुपये की मांग की थी (भाजपा को छोड़कर) एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने एक ज्ञापन प्रस्तुत किया था। इस विशेष पैकेज की घोषणा के साथ प्रधानमंत्री जी बिहार और बिहार के रहवासियो को ताना देना भी नहीं भूले उन्होंने बिहार को बीमारू राज्य की संज्ञा दी और कहा 'उनके (नीतीश कुमार के) मुँह चीनी और शहद से भरा हो सकता है। लेकिन एक आदमी बीमार नहीं है, तो वह क्यों वह चिकित्सक के पास जाना पड़ता है, मुझे बताओ? अगर बिहार में सब ठीक है, वह क्यों केंद्र सरकार से चीजों की मांग रखता है?"



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा





प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा जिन दो कारणों से भारत के आम लोगों में काफ़ी दिनों तक चर्चा में रहेगी, उनमें से एक है शेख़ ज़ायद मस्जिद में उनका जाना और दूसरा अबूधाबी में मंदिर निर्माण के लिए ज़मीन दिया जाना। यह मेरी जानकारी में नहीं है कि मोदी इससे पहले कभी किसी मस्जिद में गए हों। शेख़ ज़ायद मस्जिद में उनके जाने को लेकर तरह-तरह के निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं इसको बिहार के चुनाव से भी जोड़ कर देखना गलत न होगा जहाँ मुसलमानो को रिझाने का कोई अवसर मोदी जी छोड़ना नहीं चाहेंगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद वे नेपाल, बांग्लादेश, चीन और जापान की यात्राओं के दौरान कई हिंदू और बौद्ध मंदिरों में गये। इसी तरह, मंदिर की बात को मोदी-भक्तों का एक वर्ग यह कहकर प्रचारित कर रहा है कि यह नरेंद्र मोदी का ही प्रताप है कि वहाँ की सरकार मंदिर के लिए ज़मीन देने को तैयार हो गई। यह जान कर मोदी भक्तो को थोड़ी निराशा होगी कि दुबई में शिव और कृष्ण मंदिर के अलावा अक्षरधाम की स्वामीनारायण संस्था का सत्संग भवन, गुरुद्वारा और गिरजाघर भी हैं। जहाँ मोदी जी ने जाने की आवश्यकता नही समझी। दुबई का पहला हिंदू मंदिर 1958 में बना था और यह एक मस्जिद के निकट है। लेकिन यह सही है कि यूएई सरकार ने मोदी की यात्रा के साथ-साथ मंदिर की घोषणा कर एक सद्भावना संदेश देने और दोनों देशों के बीच रिश्ते प्रगाढ़ करने की अपनी इच्छा साफ़ तौर पर जताई है। नये मंदिर की घोषणा उनके हिंदुत्ववादी समर्थकों के बीच उनकी छवि क़ायम रखने में मददगार होगी। जहाँ तक शेख़ ज़ायद मस्जिद की बात है, मेरे ख़्याल से बड़ी ख़बर तब होती जब मोदी वहाँ नहीं जाते! शेख़ ज़ायद मस्जिद अबूधाबी का नंबर एक टूरिस्ट स्पॉट है. मक्का, मदीना के बाद वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाती है। अबूधाबी जानेवाला शायद विरला ही कोई टूरिस्ट वहाँ न जाता हो. ऐसे में मोदी अगर वहाँ न जाते तो क्या यह वाक़ई विचित्र न होता?

शनिवार, 15 अगस्त 2015

बीजेपी का सच 



प्रधानमंत्री के लाल क़िले से दिये गये दूसरे भाषण में १२५ करोड़ देश वासियो के सम्बोधन में प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिक सद्भाव पर ज़ोर दिया और बोले "हमारी एकता, हमारी सरलता, हमारा भाईचारा और हमारा सद्भाव ये हमारी बहुत बड़ी पूंजी है। इस पूंजी को कभी दाग़ नहीं लगना चाहिए, कभी चोट नहीं पहुँचनी चाहिए।" परन्तु TOI के अनुसार बीजेपी की पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के तमाम हिस्सों में तेजी से अपनी पैठ बढ़ा रहा है। पिछले पांच साल के दौरान इसकी सबसे छोटी इकाई यानी शाखाओं में ६१ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। एक आंकड़े के मुताबिक, २०१५ में देश भर में हर दिन नियमित रूप से ५१३३५ शाखाएं लग रही हैं।
आलोचकों की निगाह में संघ भले ही अतिवादी संगठन है, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि जमीनी स्तर पर इसके संगठन का कोई तोड़ नहीं। हालांकि, शाखा से जुड़ने वाले स्वयंसेवकों की कोई आधिकारिक सदस्यता नहीं होती, लेकिन हर साल शाखाओं की संख्या के अध्ययन के आधार पर पाया गया है कि २०१०-२०११ से २०१४-२०१५ के दौरान दैनिक शाखाओं में २९ फीसदी, साप्ताहिक शाखाओं में ६१ फीसदी और मासिक शाखाओं में ४० फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह है सांप्रदायिक सद्भाव के प्रमाण।

क्या है बाबा की तरक्की का राज़? 


बाबा एक शक्ति का केंद्र है, उसके पहले घेरे में पूंजीपति, सरकार के बड़े अफसर, रसूकदार लोग और नेता होते है। दूसरा घेरा उनका होता है जो पहले घेरे वालो के आश्रित होते है। तीसरा घेरा अपना ट्रांसफर पोस्टिंग, रिश्वत में फसे लोग, भगोड़े, कानून के मुजरिम और शराब के ठेकेदारो - उत्खनन माफिया का होता है। यह सब मिल कर एक कड़ी बनाते है और उसका नाभिक केंद्र बाबा होता है। चौथा और आखरी घेरा भक्तो और श्रदालु लोगो का होता है जो बाबा की प्रसिद्धि और उनके धर्मोपदेश / प्रवचन से प्रभावित होकर अपने को समर्पित कर देते है और यह एक बड़ी भीड़ का हिस्सा होते है जो किसी न किसी चमत्कार की आस में अपने सारे काम को छोड़ हर प्रवचन में दिखाई देते है। 

बाबा अपने चौथे और आखरी घेरे को अपने साथ बनाये रखने के लिये विभन्न प्रकार का आडंबर करता है जिसे भक्त चमत्कार के रूप में लेते है और इतना समर्पित होते है की बाबा के द्वारा छोड़े गये भोजन और चाय को भी आपस में बाट कर खा जाते है इस विश्वास के साथ की उनके दुखो का निवारण होगा। बाबा को इस घेरे से आमदनी नाममात्र ही होती है मगर इनका हुजूम उसकी लोकप्रियता में चार-चाँद लगता है। 

बाबा की असली आमदनी का स्रोत पहले तीन घेरे से आता है यही कारण है की बाबा को आपने जीवन काल में सत्ता और पूजीपतियों का निरंतर सहयोग मिलता रहता है और उसकी अकूत सम्पति दिन दूनी रात चौगनी बढ़ती रहती है। पतन उस समय शुरू होता है जब सत्ता अपना मुह फेर लेता है।  

प्रधानमंत्री के भाषण की ग्यारह ख़ास बातें…


१. सांप्रदायिक सद्भाव पर ज़ोर - हमारी एकता, हमारी सरलता, हमारा भाईचारा और हमारा सद्भाव ये हमारी बहुत बड़ी पूंजी है। इस पूंजी को कभी दाग़ नहीं लगना चाहिए, कभी चोट नहीं पहुँचनी चाहिए। 
वास्तविकता क्या है : कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रता जिस दिन बीजेपी और उसके सहयोगी संघटन समाज के विघटन का प्रयास न करते हो, सांप्रदायिक सद्भाव को बिगड़ने के भरपूर प्रयास किया जा रहा है। लोग समझदारी से काम ले रहे है सोशल मीडिया विदेशी मीडिया सक्रीय है कोई बड़ी वारदात को अन्जाम देने में यह सफल नही हो पाये है। 

२. टीम इंडिया से बढ़ रहा है देश - सवा सौ करोड़ देशवासी जब टीम बन जाते हैं तो वो राष्ट्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाते हैं, राष्ट्र को बढ़ाते हैं, राष्ट्र को बनाते हैं और राष्ट्र को बचाते भी हैं। 
वास्तविकता क्या है: आम नागरिको को सरकारी परियोजना से जोड़ने में असफल रही सरकार। विसिलब्लोवर, सुचना के अधिकार कानून को कमज़ोर किया, जन-हित परियोजनाओं को प्राथमिकता की सूचि से बहार किया जैसे मनरेगा, खाद्य सुरक्षा बिल इत्यादि। बीमार और कमज़ोर टीम के भरोसे दुनिया फ़तेह करने निकले है जिसमे हार निश्चित है। 

३. देश के मन की बात - जनभागीदारी के ज़रिए देश के मन की बात सरकार तक पहुँच रही है माइगोव डॉट इन (MYGOV.IN), मन की बात और पत्रों के ज़रिए दूर दराज़ बैठे लोगों के सुझाव भी सरकार तक पहुँच रहे हैं। 

वास्तविकता क्या है: अपना मन हल्का करने में सफल परन्तु देश की बात जस की तस। 

४. जनधन योजना, बीमा योजना और पेंशन योजना - विश्व में फाइनेंसियल इंक्लूज़न की जो बात होती है उसे एक मज़बूत धरातल पर अगर लाना है तो देश के ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति को अर्थव्यवस्था से जोड़ना है। 

वास्तविकता क्या है: विशेषज्ञ की माने तो यह योजना पूर्णरूप से फ्लॉप है। ग्रमीण बैंको को कलेक्टर के द्वारा दिये गये टारगेट के मुताबिक बैंक का मैनेजर जबरन इन टारगेट की पूर्ति करता नज़र आता है।  देखने और सुनने में यह भी आया है की मैनेजर ने अपने पास से पैसे लगा कर अपने टारगेट की पूर्ती की है कारण उनकी वार्षिक बढ़ोतरी को टारगेट से जोड़ दिया गया है। 

५. श्रम क़ानूनों में सुधार - मज़दूरों को पीएफ़ खाते के लिए एक पहचान नंबर दिया। ४४ श्रम क़ानूनों को चार आचार संहिताओं में समेटा
वास्तविकता क्या है: श्रम कानून को लचर बनाया गया मज़दूरों के हितो की अनदेखी। 

६. एलपीजी सब्सिडी - बीस लाख लोगों ने एलपीजी सब्सिडी छोड़ी है। हम एलपीजी सब्सिडी के लिए डायरेक्ट बेनिफ़िट का प्रावधान लाए हैं जिससे दलाली और कालाबाज़ारी ख़त्म हुई है। 

सब्सिडी से बचे पैसो का इस्तेमाल कैसे और किस मत में हुआ जानकारी दे सरकार। 

७. कोयले की नीलामी - अगर मैं कोयला की चर्चा करूंगा तो कुछ राजनीतिक पंडित उसे राजनीति के तराजू से तोलेंगे। मैं जिस कोयले की चर्चा कर रहा हूँ उसे राजनीति से मत तोलिए।  हमने कोयले की नीलामी का प्रावधान किया और क़रीब तीन लाख करोड़ रुपए अब तक नीलामी से जुटाए हैं। 

८. भ्रष्टाचार नहीं हुआ - हमारी पंद्रह महीनों की सरकार पर अब तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। कालेधन पर हमने कठोर क़ानून बनाया है और लोगों ने अब तक ६५०० करोड़ रुपए की अघोषित आय घोषित की है। 
वास्तविकता क्या है: व्यापम, ललित मोदी घोटाला, चिक्की घोटाला, छत्तीसगढ़ का नमक और चावल घोटाला यह सब उपलब्धि किसकी है इस पर भी कुछ प्रकाश डालते मगर चुप रहना उचित समझा। 

९. कृषि मंत्रालय में किसान कल्याण जोड़ा : हमने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए पचास हज़ार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।  कृषि मंत्रालय अब कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के रूप में जाना जाएगा। 

वास्तविकता क्या है: किसान मरते रहे और आप और आपका मंत्रालय सोता रहा। किसानो की आत्महत्या में ४०% का इज़ाफ़ा दर्ज हुआ है जो पिछले सालो के अनुपात में बहुत अधिक है और सब अधिक प्रभवित राज्य महाराष्ट्र है। इस पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है प्रधानमंत्री जी। 

१०. वन रैंक वन पेंशन - पूर्व सैनिकों के लिए वन रैंक वन पेंशन का विषय हमारी सरकार के सामने हैं।  मैं विश्वास दिलाता हूँ कि सिद्धांततः इस सरकार ने वन रैंक वन पेंशन को स्वीकार कर लिया है।  संबंधित लोगों से बात चल रही है, बात को आगे बढ़ा रहे हैं। 
वास्तविकता क्या है: आंतरिक सुरक्षा के नाम पर धरने पर बैठे अपने पूर्व सैनिको के साथ अभद्र व्यवाहर अपने चुनावी वादे से पीछे हटना क्या फौज के मनोबल को गिराने के लिये काफी नहीं है। आज भी असमंजस की स्थिति बनी है और सैनिक फूटपाथ पर। 

११. स्टार्ट अप इंडिया-स्टैंड अप इंडिया - हमें भारत को स्टार्टअप्स में नंबर एक बनाना हैं। बैंक नए उद्यमियों को आसान क़र्ज़ देंगे।  देश की सवा लाख बैंक शाखाएं दलितों-वंचितों के लिए विशेष योजनाएं बनाएंगी। देश में सवा लाख दलित उद्यमी पैदा किए जाएंगे।  उन स्टार्टअप प्रोजैक्ट को अधिक मदद दी जाएगी जिनसे अधिक रोज़गार पैदा होंगे। 

वास्तविकता क्या है: दलित धर्म परिवर्तन कर रहे है असुरक्षित महसूस कर रहे दरिद्रता की अंतिम सीमा में जीवन यापन कर रहे है दबंगो के द्वारा उनकी बेटी और महिलाओ का शोषण हो रहा है सरकारे और स्थानीय प्रशासन निष्क्रिय है मुक़दमे दर्ज नहीं होते दर्ज हो भी जाये तो मुजरिमो को सज़ा नहीं होती। आप देश में सवा लाख दलित उद्यमी पैदा करने की बात करते है। क्या सरकार के पास कोई योजना है या यह भी एक चुनावी जुमला है। 

रविवार, 9 अगस्त 2015

हरियाणा में दलितों का धर्मांतरण 



हरियाणा के दलितों के द्वारा धर्मांतरण का फैसला एक सराहनीय राजनैतिक पैतरा है जिसमे उन्होंने केंद्र और राज्य में बैठी राष्ट्रवादी सरकार को उनके हिन्दू राष्ट्रवाद को चुनौती दी है।
मेरा सवाल उन दलितों ने ईसाई बनने का फैसला क्यों नहीं किया जो अधिक सरल था ? शायद इन लोगो को ईसाई समुदाय का सहयोग म मिला हो, हालिया दिनों में हो रहे ईसाई समुदाय पर राष्ट्रवादियो की हमले और चर्च में हो रही तोड़फोड़ के कारण ईसाई मठादिष इस बात का जोखिम नहीं उठाना चाहते हो की उनपर किसी प्रकार का आरोप लगे और उन पर होने वाले आक्रामक हमलो में तेज़ी आये। 

वह बौद्ध धर्म अपना सकते थे जो किसी भी विवाद से परे था ? ऐसा करने से केंद्र और राज्य में बैठी सरकारों की प्रतिकिर्या नगण्य होती और उनकी पहल जाया जाती क्योकि दलितों का बौद्ध धर्म अपना लेना एक आम बात है और डॉक्टर अम्बेडकर के पदचिन्हो का अनुशरण करते हुए बौद्ध हो जाना मूल समस्या की तीव्रता को नज़रअंदाज़ करता है। 
ईस्लाम धर्म को क़बूल करना - बिना ईस्लाम की तह तक जाने एक पूरी तरह से सोचा समझा बेहतरीन और सटीक राजनैतिक पैतरा है जो की सराहनीय है। ऐसा कर उन दलितों ने समाज के हिन्दू समाज के ठेकेदारो को राजनैतिक रूप से अवश्य हिला देने में सफल रहे। 
१. बीजेपी शासित राज्य में दलितों की अनदेखी को उजागर करना 
२. न्याय में विलम्भ को उजागर करना 
३. खट्टर विरोधी खेमे को बल देना 
४. आरएसएस की चिंता को बढ़ाना 
५. धर्मांतरण का ऐलान जन्तर-मन्तर से कर अंतरराष्ट्रीय मीडिया को अपनी ओर आकृषित करना इत्यादि। 
मुस्लमान खुश है उसकी आबादी बिना कुछ किये बढ़ गयी, बढ़ी है तो जाओ उनकी लड़ाई को साझा लड़ाई की तरह आगे बढ़ाओ और उनकी बच्चियों के बलात्कारियो को अन्जाम तक पहुचाओ।

बुधवार, 5 अगस्त 2015

६ ऐसी चीज़े जिससे पकड़ा गया आतंकवादी मंदबुद्धि प्रतीत होता है 

उस्मान उम्र २० वर्ष, लश्कर-ए-तैयबा का संदिग्ध आतंकवादी जो एक मुठभेड़ के उपरान्त ज़िन्दा पकड़ा गया जो जम्मू&कश्मीर के उधमपुर ज़िले में सम्पन हुआ जिसमे बोडर सिक्योरिटी फ़ोर्स के २ जवानो ने शाहदत पेश की एवं ११ व्यक्ति घायल हुए। पकडे जाने के तुरन्त बाद उसने अपना पहला परिचय क़ासिम खान के रूप में करवाया फिर उस्मान के रूप में। उस्मान की गिरफ्तारी पुलिस और आर्मी के साझा तलाश के दौरान एक स्कूल से हुई। टीवी पर दिये अपने इंटरव्यू में ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह इस अवसर की तलाश में था उसकी बाते, हुलिया आतंकवादी की छवि को ठेस पंहुचा रही थी वह खुश था जैसे उसे मौके की घंभीरता का अंदाज़ा न हो या मानसिक रूप बीमार हो। ऐसे ६ अवसर थे जिसमे ऐसा अहसास हुआ की वह मानसिक रोगी/सही दिमाग नहीं है। 

१. क्या उसे अपना नाम पता नहीं था? पकडे गये आतंकी ने तीन बार अपना नाम बदला पहले उसने अपना नाम क़ासिम खान बताया फिर उस्मान और अंत में मुहम्मद नावेद।  खुदा बेहतर जानता है क्या है उसका असली नाम और पहचान। 

२. शरीर की भाषा और ड्रेस कोड: उसकी शीतलता ऐसा प्रतीत होता है की वह पुरे घटना क्रम से भयभीत न होकर उस से मज़ा ले रहा है। उसे अपने किये गये कृत के प्रति कोई पश्चाताप नहीं है ऐसा तभी मुमकिन है जब इंसान मानसिक रोगी हो। आतंकवादी लगने के बजाय वो क्लास में पीछे की बेंच पर बैठा एक शरारती युवक लग रहा था जो इम्तेहान बिना पढ़े देने आया हो। इसको देखते हुए पाकिस्तान के आतंकियों के गिरते स्तर पर हसी आना स्वाभाविक है। कमीज़ का ऊपर वाला बटन खुला मुड़ी हुई कमीज़ की आस्तीन हास्यपूर्ण लग रही थी। 

३. पहली अभिव्यक्ति: वीडियो चालू होते ही किसी व्यक्ति ने सवाल किया "आज थोड़ी आया है तू पाकिस्तान से" उस आतंकी के भाव से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उस सवाल की कोई अहमियत न हो जैसे माँ पूछ रही हो बेटा पढ़ाई कर ली कल के टेस्ट की और बेटा गुस्‍से से भरा हुआ अपनी माँ की ओर देखे। फिर वह जवाब देता है "१२ दिन हो गये"

४. कुल आतंकियों की संख्या : जब रिपोर्टर ने पूछा "तुम कितने लोग थे?" उसका जवाब "दो ही थे" स्टाइलिश तरीके से उसका जवाब। फिर झटके से पीछे मुड़ता है जैसे सहमति ले रहा हो की "दो ही थे न" फिर बोला "नहीं दो ही थे"

५. तुम्हारी हमसे दुश्मनी क्या है? जब पूछा "क्यों करते है यह आप" उसका जवाब "छोड़ो आप" जब रिपोर्टर ने फिर पूछा "क्या आप को पैसा मिलता है" उसने अपने दाहिनी ओर बैठे व्यक्ति की तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोला "यह तो अल्लाह का काम है"

६. रिपोर्टर ने कहा "दिहाड़ी लगा लो" इस सवाल पर आतंकी मुस्कुराया और बोला "दिहाड़ी? दिहाड़ी क्या लगाये ?" और मज़ाकिया तरीके से बोला "तो मारना ही मारना है"

उसके हाव भाव से ऐसा लगता है की पुलिस और सिक्योरिटी एजेंसी के लिये उस आतंकी से तफ्तीश करना एक मुश्किल काम होगा सम्भवता हसते हसते वह कूदने फांदने लगे। मगर एक बात वीडियो देख कर लगता है की आतंकियों का स्तर गिरा है और हाफिज सईद भी इससे निराश होगा। 

रविवार, 2 अगस्त 2015

"हिन्दू आतकवाद" का जन्म और पहली बार इसका प्रयोग कब हुआ 


संसद में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के दिये बयान ने हंगामा खड़ा कर दिया जब उन्होंने यह कहाँ की "हिन्दू आतकवाद" नामक शब्द ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया था, और इसकी ज़िम्मेदार पिछली संप्रग सरकार है। बहुत कम लोगो को पता होगा की "हिन्दू आतंकवाद" की उत्पति कब हुई किसने की और पहली बार इस शब्द का प्रयोग किस सन्दर्भ में किया गया। ज्ञात हो बाबरी मस्जिद विध्वंस के उपरान्त न्यायमूर्ति लिब्रहान, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के तत्कालीन एक वर्तमान न्यायाधीश की अध्यक्षता एक आयोग का गठित किया गया था जो बाबरी मस्जिद विध्वंस प्रकरण की जाँच कर रहा था। आयोग के न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मनमोहन सिंह लिब्रहान पहली बार अपनी रिपोर्ट में यह शब्द "हिंदू आतंकवादियों 'का इस्तेमाल बाबरी मस्जिद विध्वंस के सन्दर्भ में किया वह कहते है "हाँ मैंने अपनी रिपोर्ट में 'हिंदू आतंकवादियों' शब्द का उल्लेख किया है। मैंने बहुत विचार किया कि इस शब्द की जगह किसी दूसरे उपयुक्त शब्द का प्रयोग करू परन्तु मैं ऐसा नहीं कर पाया। मैं एक राजनीतिज्ञ नहीं हूँ, न्यायमूर्ति लिब्रहान कहते हैं "किसी तरह का आतंकवाद खराब है। निर्दोष लोगों की हत्या बुरा है। न्यायमूर्ति लिब्रहान, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के तत्कालीन एक वर्तमान न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित आयोग को दिसंबर १९९२ में नियुक्त किया गया था और २००९ में १७ साल के बाद आयोग ने केंद्र सरकार को,अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमे १००० पन्ने में अपनी तफ्तीश और सिफारिशें है अफ़सोस किसी भी सरकार ने दोषियों को सज़ा देने में रूचि नहीं ली। उनका यह कहना की वर्त्तमान राजस्थान के राजपाल इस घटना की मुख्य भूमिका में थे और आज संवैधानिक पद पर आसीन है। वह यह कहने में भी नहीं चुके की यही हशर जस्टिस श्री कृष्णा कमीशन रिपोर्ट का हुआ जो मुंबई दंगो के बाद गठित की गयी थी।

शनिवार, 1 अगस्त 2015



" क्या फांसी टाली जा सकती थी "



जुलाई ३१, २०१५ को दा ट्रिब्यूनल ने अपने सम्पादकीय "क्या फांसी टाली जा सकती थी, अपराध से अधिक सज़ा" शीर्षक से याकूब मेमन के विषय में लिखा है और ट्रिब्यूनल कहता है कि पूर्व राष्ट्रपति जिनकी मृत्यु भी उसी दौरान हुई उन्होंने अपने कार्यकाल में किसी भी दया याचिका को नहीं ठुकराया और दूसरी तरफ वर्त्तमान राष्ट्रपति ने देर रात तक जदो-जहद कर इस बात से आश्वस्त हो जाना चाहते थे की याकूब की फांसी में किसी प्रकार का विलम्ब न हो। नई दया याचिका प्राप्त होते की वर्त्तमान राष्ट्रपति ने उसे गृह मंत्रालय को भेजा और गृह मंत्री ने तत्परता दिखाते हुए अपने पूर्व-नियोजित फैसले से अवगत करने राष्ट्रपति के दरबार में हाज़िर हो गये। दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायलय ने सब को अचंभित करते हुए दया याचिका को उसी रात सुनने का फैसला किया तथा २ घण्टे के भीतर याचिका को ख़ारिज कर मृत्यु दण्ड को और फांसी पर लटकने की पृष्टि कर दी। पूरी प्रणाली ने उद्देश्य और गति की भावना के साथ काम किया।
न्याय प्रणाली ने अतिरिक्त समय तक काम कर यह सुनिश्चित कर लेना चाहती थी की फांसी अपने निर्धारित समय और तारीख पर अंजाम दी जाये इसके पलट अब्दुल कलाम फांसी के विरोधी थे। यह विरले ही देखने को मिलता है की सर्वोच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश भी फांसी विरोधी अभियान का हिस्सा बने और बी. रमन के खुलासे के आधार पर पुनः दया याचिका की सुनवाई की अपील की। ट्रिब्यूनल कहता है की जिरह की सारी सम्भावनाये निरस्त कर दी गयी और प्रक्रियाओं का पालन कर रहे थे लेकिन इस प्रणाली के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिया था। रिपोर्ट के अनुसार याकूब मेमन ने कुछ समझौतों के तहत आत्मसमर्पण किया था उसने इन धमाको में पाकिस्तान का हाथ होने का खुलासा किया था इत्त्यादि दलीले बेअसर साबित हुई। शासन मानो दावूद इब्राहिम और टाइगर मेमन को न ला पाने की खीज निकल रहा हो।