रविवार, 31 अगस्त 2014

क्या विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस भारत लाना संभव नहीं हो पाएगा।


जिन लोगों ने विदेशी बैंकों में काला धन जमा किया है, वे आम भारतीय नागरिक की श्रेणी में नहीं आते बल्कि यह वह लोग है जो देश का सञ्चालन करते है नीतिकार है जो देश के कानून का निर्माण करते है और आला प्रशासनिक अधिकारी और उद्योगपति हैं। मौजूदा सरकार का यह वादा था की सत्ता में आते ही वह काले धन को देश में वापस लायेगे और इस वादे को आम जनता ने सराहा तथा सत्तारूड पार्टी को समर्थन भी दिया। आज सरकार के १०० दिन पुरे होने को है और वादा पूरा करना तो छोड़िये सरकार या सरकार के मंत्री इस विषय में बात करने से कतराते नज़र आते है। बाबा राम देव जो काले धन वापस लाने को कृत्यसंकल्प किया था वह सरकार बनने के बाद से ही अज्ञातवास में चले गये है। 

विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई अधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं लेकिन स्विटजरलैंड के स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए न्यूनतम जमा राशि 50 करोड़ रुपये बताई जाती है। इतनी मोटी रकम जमा करने वाला व्यक्ति कोई आम आदमी तो हो नहीं सकता है। दूसरी बात अभी तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत वापस लाने के लिए हमारे पास ठोस कानून का अभाव और और सरकारी इच्छा शक्ति दोनों का न होना भी एक बड़ा कारण है और न ही निकट भविष्य में इस दिशा में कोई कठोर कानून के निर्माण होने की आशा ही की जा सकती है क्योंकि कानून बनाने वाले हमारे राजनेताओं, कानून का पालन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और कानून बनवाने और तोड़ने में अहम भूमिका रखने वाले उद्योगपतियों का ही विदेशी बैंकों में काला धन जमा है। कानून की यह तिकडी इतनी मुर्ख तो हो नहीं सकती है कि काले धन की पोल खोलकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ले। क्योंकि काले धन की सच्चाई का पता चलते ही कई बड़े चेहरों और सफ़ेद पोश लोगो के चेहरे से शराफ़त और देशभक्ति के काले नकाब भी हट जायेगे और वह तमाम शरीफ़ लोग मुजरिमो की सूचि में होगे। जिसके लिए उनके ऊपर कई आपराधिक मुकदमो की ज़द में आ जाये गे। तो ऐसे में विदेशी बैंको में पड़े काले धन की वापसी कैसे सम्भव है यह एक घम्भीर सवाल है। 

फिर यह मन में सवाल उठता रहता है कि भारत से काला धन होता क्या है और यह स्विस बैंक में पहुंचता कैसे है और वह किसका पैसा होता है? दरअसल हमारे देश में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी है। कोई भी काम करवाने के लिए रिश्वत देने और लेने का चलन पारंपरिक है यदि कोई काम रिश्वत के बिना हो रहा हो तो यह शंका अंत तक बानी रहती है की काम होगा या नहीं रिश्वत देने के बाद देने वाले को भी संतुष्टि मिल जाती है की उसका कानूनी तौर पर सही काम अपने अंजाम तक अवश्य पहुंच जाये गा। ऐसी मानसिकता दोनों लोगो में घर कर गयी है। छोटी-मोटी रकम रिश्वत में जब दी जाती है तो वह देश में ही छिप जाती है लेकिन जब रिश्वतखोरी करोड़ों रुपये में होती है तो उसके लिए सबसे सुरक्षित जगह के लिए विदेशी जमीन का चयन किया जाता है जहाँ अमुक व्यक्ति का धन सुरक्षित रहे और कानून की नज़रो से दूर। करोड़ों रुपये के लेन-देन में हवाला एजेंटों का सहारा लिया जाता है। बड़े और भष्ट अधिकारी और नेता करोड़ों रुपये घूस किसी ठेके को दिलाने या मलाईदार पोस्टिंग करने के एवज़ में लेते हैं। इसमें अधिकारी या नेता लेन-देन का माध्यम हवाला एजेंटों के जरिये कराते हैं और यही हवाला एजेंट संबंधित अधिकारी या नेता के स्विस बैंक के खाते में जमा करा देते हैं। अवैध तरीके से देश के अंदर कमाये गए काले धन को विदेशी बैंकों में जमा कराने में अहम भूमिका निभाने वाले हवाला एजेंट लचर कानून के चलते देश को चूना लगा कर अधिकारियों, नेताओं और उद्योगपतियों के खाते पैसा जमा करा देते हैं। हवाला एजेंटों को फॉरेन एक्सचेंज रेग्यूलेटर्स ऐक्ट का जो डर था, वह भी खत्म हो गया है। इसके तहत गलत तरीके से मुद्रा की हेराफेरी करने पर जुर्माना, गिरफ्तारी और आपराधिक मुकदमे का प्रावधान था। लेकिन सरकार अंतरराष्ट्रीय कारोबार को बढ़ावा देने के नाम पर इस कानून की जगह फॉरेन एक्सचेंज मेंटीनेंस ऐक्ट लेकर आई है। इस कानून के तहत सिर्फ जुर्माना वसूला जाता है। यानी मुद्रा की हेरा फेरी करने वालों के बीच कानून का डर लगभग खत्म हो गया है। दूसरी एक बात और आज जमाना बहुत हाईटेक हो गया है अब नकद रकम की जगह लोग हेरा फेरी करते वक्त इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं जिससे उनके पास नकद रकम भी नहीं मिलती है।

मेरे अनुभव के अनुसार यह कह पाना कठिन है की यह सरकार अपने वादे को पूरा कर सकने में सक्षम होगी और काले धन का मुद्दा केवल चुनावी मुद्दा बन कर रह जाये गा। 

सोमवार, 25 अगस्त 2014

अंतर्जातीय विवाह के इतिहास पर एक नज़र



अंतर्जातीय विवाह के इतिहास पर नज़र डाले तो ज्ञात होता है की हिन्दू और मुसलमानो के बीच शादिया १४०० साल पहले भी होती थी और उन शादियों का उदाहरण इतिहास के पानो में दर्ज है। क्या वे लव - जेहादी थे यह हिन्दुस्तान में मुसलमानो की जनसँख्या बढ़ाने के उदेश्य से ऐसा किया गया था? नहीं यह विवाह आपसी सम्बन्धो को सुदृण बनाने की नियत से किये जाते थे और रिश्तो को अपने खून से सींचा जाता था। इतिहासकारो के अनुसार रसूल अल्लाह मोहमद साहेब और उनके खानदान की हिंदुस्तान गहरे रिश्ते थे। इस्लाम से काफी पहले से ही भारत, इरान और अरब में व्यापारिक रिश्ते थे इस्लाम के आने से ठीक पहले इरान में सासानी खानदान के २९ वें और अंतिम आर्य सम्राट "यज्देगर्द (५९०ई) की हुकूमत थी। उस समय ईरान के लोग भारत की तरह अग्नि में यज्ञ किया करते थे। इसी लिए "यज्देगर्द" को संस्कृत में यज्ञ-कर्ता भी कहते थे।

प्रसिद्ध इतिहासकार राज कुमार अस्थाना ने अपने शोधग्रंथ "Ancient India" में लिखा है कि सम्राट यज्देगर्द की तीन पुत्रियाँ थी, जिनके नाम निम्नलिखित थे मेहर बानो, शेहर बानो और किश्वर बानो थे। यज्देगर्द ने अपनी बड़ी पुत्री की शादी भारत के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय से करावा दी थी। उस समय उनकी राजधानी उज्जैन थी और भूरिया दत्त राजा के सेनापति हुआ करते थे। भूरिया दत्त के एक भाई रिखब दत्त व्यापारी थे और यह लोग कृपाचार्य के वंशज कहे जाते हैं। चन्द्रगुप्त ने मेहर बानो का नाम चंद्रलेखा रख दिया था क्योंकि मेहर का अर्थ चन्द्रमा होता है राजा के और मेहर बानो से एक पुत्र समुद्रगुप्त पैदा हुआ। यह सारी घटनाएँ छटवीं शताब्दी की हैं। यज्देगर्द ने दूसरी पुत्री शेहर बानो की शादी इमाम हुसैन से करवाई थी और उनसे जन्मे पुत्र का नाम "जैनुल आबिदीन" रखा गया। इस तरह समुद्रगुप्त और जैनुल अबिदीन मौसेरे भाई थे। इस बात की पुष्टि "अब्दुल लतीफ़ बगदाद( ११६२ -१२३१) ने अपनी किताब "तुहफतुल अलबाब" में भी की है और जिसका हवाला शिशिर कुमार मित्रा ने अपनी किताब "Vision of India" में भी दिया है।

जब सन ६८१ में हजरत अली का निधन हो गया और मुआविया बिन अबू सुफ़यान खलीफा बना वह बहुत कम समय तक रहा। उसके बाद उसका लड़का यजीद सन ६८२ में खलीफा बन गया जो एक अय्याश, अत्याचारी और दुराचारी ख़लीफ़ा था। वह सारी सत्ता अपने हाथों में रखना चाहता था और इसी नियत से उसके द्वारा सूबों के सभी अधिकारीयों को पत्र भेजा और उनसे अपने समर्थन में बैयत (oath of allegiance) देने का दबाव बनाया कुछ लोगों ने डर या लालच के कारण यजीद का समर्थन देने को सहमत हो गये परन्तु इमाम हुसैन ने बैयत करने से साफ इन्कार कर दिया। यजीद को आशंका थी कि यदि इमाम हुसैन बैयत नहीं करते तो ऐसी सूरत में आवाम इमाम के पक्ष में हो जाये गी। यजीद अपने मनसूबे के तहत यह तय कर चूका था की इमाम की बैयत होने पर इमाम हुसैन अपनी ताकत के ज़ोर पर दबाव बनाये गा। यज़ीद युद्ध की समस्त तैयारी कर चूका था मगर इमाम हुसैन युद्ध और खूंरेज़ी से बचना चाहते थे। वहा के मौजूदा हालात को देखते हुए शहर बानो ने अपने पुत्र जैनुल अबिदीन के नाम से एक पत्र उज्जैन के राजा चन्द्रगुप्त को भिजवा दिया था। जो आज भी जयपुर महाराजा के संग्राहलय में मौजूद है। बरसों तक यह पत्र ऐसे ही दबा रहा, फिर एक अंगरेज अफसर Sir Thomas Durebrught ने २६ फरवरी १८०९ को इसे खोज लिया और पढ़वाया गया और और १८१३ में प्रकाशित हुआ जिससे सारी घटना को उजागर किया।

रविवार, 24 अगस्त 2014

लव - जिहाद क्या है। 


लव जिहाद को लेकर देश का सियासी बहस और उससे सम्बधित सरगर्मी उफान पर है। उत्तर प्रदेश भाजपा की मथुरा के बृंदावन में दो दिवसीय बैठक में लव-जिहाद पर प्रस्ताव पारित करने की घोषणा और फिर उसपर यू-टर्न ने विपक्षी पार्टियों और मीडिया को बहस का एक विषय थमा दिया है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लव-जिहाद शब्द को तूल देकर केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में सियासी फायदा उठाना की नीयत उछाल रही है। चूंकि इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को होगा इसलिए मुलायम और अखिलेश परेशान हैं। 

लव-जिहाद है क्या?

जवान मुसलिम लड़कों द्वारा अन्य धर्म की लड़कियों को प्यार के जाल में फंसाकर उनका धर्म-परिवर्तन करना लव जिहाद या रोमियो जिहाद कहा गया है। बीजेपी में कितने लव-जिहादी मौजूद है क्या सत्तारूढ़ बीजेपी इसका आकड़ा सार्वजानिक करने को तैयार है, मुख्तार अब्बास नक़वी लव-जिहादी जिसने राजपूत जाति की हिन्दू लड़की से ब्याह रचाया और अपने समाज से तिरस्कारित नक़वी ने बीजेपी की शरण ली अपने बच्चो के नाम मुसलमानो के नाम पर रखे लड़के का ख़तना करवाया और बड़े होने पर शादी मुस्लिम परिवार में की।  इस लव-जिहादी को बीजेपी ने उच्च पद पर आसीन किया क्यों। बीजेपी को इसका जवाब देश को देना चाहिये। शहनाज़ा दूसरा जिहादी पत्नी का नाम रेनू भगा के शादी की इस जिहादी को सम्मान क्यों दिया गया इसका कारण साफ है सार्वजानिक रूप से मुसलमानो को गाली देने वाले मुसलमानो का बीजेपी में स्वागत है। सिकंदर बख्त बीजेपी का पहला लव-जिहादी जिसने अपनी पूरा जीवन बीजेपी को दे दिया उसकी भी कहानी औरो से जुदा नहीं थी। 

लव-जिहाद एक वास्तविकता है, लेकिन साथ ही लव और जिहाद दोनों विरोधाभासी भी हैं। लव कभी जिहाद नहीं हो सकता और जिहाद कभी लव नहीं हो सकता है। दरअसल लव-जिहाद कोई ऐसा शब्द नहीं जिसको सियासी जामा पहनाया जाए। यह बेहद गंभीर शब्द है और इसको कायदे से समझने की जरूरत है। जिसने इसका गूढ़ अर्थ समझ लिया उसके लिए यह अमृत और जिसने नहीं समझा उसके लिए जहर। लव-जिहाद में दो शब्द हैं। लव का मतलब होता है प्यार और जिहाद का मतलब होता है संघर्ष, जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करना। भाजपा को इन शब्दों के अर्थ में शायद कोई रूचि नहीं है और सियासी ध्रुवीकरण में लगी है। निश्चित रूप से इसका स्याह पक्ष भी है, लेकिन उसको गंभीरता से समझकर उसका शांतिपूर्ण समाधान करने की जरूरत है।

विश्व हिन्दू परिषद के नेता पिछले साल सितम्बर में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के पीछे लव-जिहाद का हाथ होने की रट लगा रहे हैं। महाराष्ट्र में भी संघ से जुड़े संगठनों ने लव-जिहाद का मुकाबला करना शुरू किया है। यहां इसी साल विधानसभी के चुनाव होने हैं। भाजपा और हिन्दूवादी संगठनों की राय में लव-जिहाद का मतलब मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियों को बहला-फुसलाकर पहले शादी करते हैं, फिर धर्म परिवर्तन कराकर लड़की को आतंकवादियों के हवाले कर देते हैं या फिर किसी और को बेच देते हैं। इस तरह की घटनाएं देश के कई राज्यों में घटित हो रही हैं, लेकिन इसको लव-जिहाद की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। इस तरह की घटना तो हिन्दू लड़के और लड़की की शादी से भी तो पनप सकती हैं और घटनाएं हो भी रही हैं। जरूरत इस बात की है कि किसी भी संगठन को या फिर राज्य सरकारों के संज्ञान में ऐसी घटनाएं आती हैं तो उसे चिह्नित कर उसका सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाना चाहिए और उसका स्थायी हल ढूंढा जाना चाहिए।

यहां बड़ा सवाल यह भी उठता है कि आखिर मुस्लिम लड़कों में ऐसा क्या होता है जो हिन्दू लड़कियां उसके मोहपाश में फंस जाती हैं और शादी करने व धर्म परिवर्तन तक का फैसला कर लेती हैं। कुछ समाज विज्ञानियों का मानना है कि हिन्दू लड़कियां जानती हैं कि दुनिया में सिर्फ मुस्लिम कौम ही ऐसी है जो सबसे कम शराब पीती हैं क्योंकि धार्मिक रूप से उनपर सख्त पाबन्दी है, वे जानती हैं कि मुस्लिम कौम ही ऐसी कौम है जो सबसे कम मक्कारी करती है क्योंकि धार्मिक रूप से उन पर सख्त पाबन्दी है, वे यह भी जानती हैं कि मुस्लिम कौम ही ऐसी कौम है जो सच्चाई की खातिर अपनी जान भी कुर्बान कर सकती है। कहने का मतलब यह कि मुस्लिमों में धार्मिक कट्टरता ज्यादा होती है और धर्म के प्रति निष्ठा भी। हिन्दू धर्म उसके मुकाबले उदार है और हिन्दुओं में धर्म के प्रति निष्ठा भी उतनी नहीं होती जितना मुस्लिमों में। इसलिए मेरी दृष्टि में दुनियाभर में फैले हिन्दू संगठनों को हिन्दुओं में धर्म के प्रति कट्टरता का भाव जगाना होगा। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि हिन्दुत्व जीवन जीने का एक तरीका है।

एक बात और, दक्षिण पंथियों की लव-जिहाद की बात सैद्धांतिक रूप से अपनी जगह सही हो सकती है, मगर लव-जिहाद के बाद जो कुछ होगा या हो सकता है उसकी कल्पना तो कीजिए। मुस्लिम लड़के का ससुराल हिन्दू होगा और पत्नी की तरफ के सारे रिश्तेदार भी हिन्दू होंगे। थोड़ी देर के लिए लड़की को यदि मुसलमान बना भी दिया जाता है तो जो बच्चे पैदा होंगे क्या वे जिहादी मानसिकता के हो सकते हैं? बच्चे के चाचा, ताऊ, दादा-दादी मुस्लिम हैं और मामा, मामी, मौसी, नाना-नानी, ममेरे-मौसेरे भाई हिन्दू। क्या ऐसा बच्चा किसी भी समुदाय से नफरत कर सकता है? इसके बाद तो खुद लव-जिहाद करने वाला की दिल परिवर्तित हो जाएगा।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

कहानी दाढ़ी की 


यह बात १९८३-८४ की होगी मैने दाढ़ी रखी बड़ी दाढ़ी और ऊपर से फुल मास्क हेलमेट सवारी भी येज़दी थी दिन कट रहे थे इस बीच सिख आतंकवाद की घटनाओ में एक दम से बढ़ोतरी हुई और कुछ आतंकवादियों ने चितरंजन पार्क में हो रहे दुर्गा पूजा के उत्सव में गोली बारी की और कई लोग हताहत भी हुए। उस ज़माने में पुलिस की नाकाबंदी बहुत अधिक होती थी ऐसी अब देखने को नहीं मिलती और (ईश्वर से प्रार्थना है आने वाले दिनों में हमारी आने वाली पीढ़ी को भी न देखने को मिले) मै फरीदाबाद में रहता था और ऑफिस आसिफ़ अली रोड पर होता था रोज़ का आना जाना था और रास्ते में करीब २० नाके मिलते थे और दिल्ली-हरियाणा का बॉर्डर अलग था। हेलमेट के बाहर से दाढ़ी देख पुलिस स्टेन गन मेरे सीने के करीब रख कर मेरी और मोटर साइकिल की सघन तलाशी लेती थी। 

जैसे जैसे पंजाब में या दिल्ली के आस-पास कोई आतंकी घटना घटित होती थी पुलिस की बौखलाहट दिल्ली की सड़को पर साफ़ नज़र आती थी और मेरी बड़ी हुई दाढ़ी भी। एक दिन मै ऑफिस से घर आ रहा था शाम के कोई ८ बजे होंगे आश्रम के आगे पुलिस का बैरिकेड लगा था दारोग़ा जी हाथ में खुली रिवॉल्वर लिए बीच सड़क पे खड़े थे और मेरा वहा पहुचना दारोग़ा जी का इशारा कर के रोकना मेरे लिए आम चूका था मगर उस दिन मुझे आज भी याद है दारोग़ा जी ने रिवॉल्वर मेरे सीने पर रख हेलमेट उतरवाई और मेरी मोटर साइकिल की ऐसी तलाशी जो पहले अभी नहीं हुई थी पेट्रोल की टंकी तक में टॉर्च से देखी गयी मेरी तलाशी मोटर साइकिल के कागज़ यानि २० मीनट के बाद आगे जाने की इजाज़त और घर तक ६-७ जगह यही हुआ। मै डर गया था और सोचा दाढ़ी नामक मुसीबत से पीछा छुड़ाने में ही बेहतरी है। 

यह सोच कर मै दूसरे दिन नाई की दूकान पर गया जहाँ से मै बाल कटवाया करता था और मेरा परिचित था मै दूकान में जाते ही कुर्सी पर विराजमान हो कर बोला नईम भाई दाढ़ी काट दो क्लीन शेव कर दो उसने मना कर दिया और बोला भाई बुरा न माने कही और कटवा ले हमने पूछा क्यों भाई आप हमे नहीं जानते है उसका जवाब था जानता हूँ मगर दाढ़ी नहीं काट सकता पता नहीं किसी मुसीबत में न पड़ जाऊ। मै परेशान था अपनी इस हिमाकत पर की दाढ़ी रखी ही क्यू। फरीदाबाद में मेरा दोस्त रहा करता था प्राण मेरे हर मर्ज़ का इलाज उसके पास होता था। आखिर में मुझे उसकी याद आयी और मै सीधे उसके घर पहुंच गया ३ बजे के आस-पास उसको दाढ़ी की कहानी सुनाई और मदद मांगी भाई प्राण तुम ही इसे काट डालो उसने तस्सली दिलाई खाना खिलाया और एक नाई के पास ले गया और उसे कहानी किस्सा सुना कर इस बात पर तैयार किया की वह मेरी मदद करे। भाई साहेब मुझे मुसीबत से नजात मिली और मै क्लियर शेव हो गया उस वक़्त उसने शेव करने के १०० रूपया लिया था मगर १०० रूपया में मुसीबत चली गयी मै राहत महसूस कर रहा था। 

उसके बाद मैंने वह हिमाकत अभी नहीं किया।