क्या विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस भारत लाना संभव नहीं हो पाएगा।
जिन लोगों ने विदेशी बैंकों में काला धन जमा किया है, वे आम भारतीय नागरिक की श्रेणी में नहीं आते बल्कि यह वह लोग है जो देश का सञ्चालन करते है नीतिकार है जो देश के कानून का निर्माण करते है और आला प्रशासनिक अधिकारी और उद्योगपति हैं। मौजूदा सरकार का यह वादा था की सत्ता में आते ही वह काले धन को देश में वापस लायेगे और इस वादे को आम जनता ने सराहा तथा सत्तारूड पार्टी को समर्थन भी दिया। आज सरकार के १०० दिन पुरे होने को है और वादा पूरा करना तो छोड़िये सरकार या सरकार के मंत्री इस विषय में बात करने से कतराते नज़र आते है। बाबा राम देव जो काले धन वापस लाने को कृत्यसंकल्प किया था वह सरकार बनने के बाद से ही अज्ञातवास में चले गये है।
विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई अधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं लेकिन स्विटजरलैंड के स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए न्यूनतम जमा राशि 50 करोड़ रुपये बताई जाती है। इतनी मोटी रकम जमा करने वाला व्यक्ति कोई आम आदमी तो हो नहीं सकता है। दूसरी बात अभी तक विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत वापस लाने के लिए हमारे पास ठोस कानून का अभाव और और सरकारी इच्छा शक्ति दोनों का न होना भी एक बड़ा कारण है और न ही निकट भविष्य में इस दिशा में कोई कठोर कानून के निर्माण होने की आशा ही की जा सकती है क्योंकि कानून बनाने वाले हमारे राजनेताओं, कानून का पालन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों और कानून बनवाने और तोड़ने में अहम भूमिका रखने वाले उद्योगपतियों का ही विदेशी बैंकों में काला धन जमा है। कानून की यह तिकडी इतनी मुर्ख तो हो नहीं सकती है कि काले धन की पोल खोलकर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ले। क्योंकि काले धन की सच्चाई का पता चलते ही कई बड़े चेहरों और सफ़ेद पोश लोगो के चेहरे से शराफ़त और देशभक्ति के काले नकाब भी हट जायेगे और वह तमाम शरीफ़ लोग मुजरिमो की सूचि में होगे। जिसके लिए उनके ऊपर कई आपराधिक मुकदमो की ज़द में आ जाये गे। तो ऐसे में विदेशी बैंको में पड़े काले धन की वापसी कैसे सम्भव है यह एक घम्भीर सवाल है।
फिर यह मन में सवाल उठता रहता है कि भारत से काला धन होता क्या है और यह स्विस बैंक में पहुंचता कैसे है और वह किसका पैसा होता है? दरअसल हमारे देश में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी है। कोई भी काम करवाने के लिए रिश्वत देने और लेने का चलन पारंपरिक है यदि कोई काम रिश्वत के बिना हो रहा हो तो यह शंका अंत तक बानी रहती है की काम होगा या नहीं रिश्वत देने के बाद देने वाले को भी संतुष्टि मिल जाती है की उसका कानूनी तौर पर सही काम अपने अंजाम तक अवश्य पहुंच जाये गा। ऐसी मानसिकता दोनों लोगो में घर कर गयी है। छोटी-मोटी रकम रिश्वत में जब दी जाती है तो वह देश में ही छिप जाती है लेकिन जब रिश्वतखोरी करोड़ों रुपये में होती है तो उसके लिए सबसे सुरक्षित जगह के लिए विदेशी जमीन का चयन किया जाता है जहाँ अमुक व्यक्ति का धन सुरक्षित रहे और कानून की नज़रो से दूर। करोड़ों रुपये के लेन-देन में हवाला एजेंटों का सहारा लिया जाता है। बड़े और भष्ट अधिकारी और नेता करोड़ों रुपये घूस किसी ठेके को दिलाने या मलाईदार पोस्टिंग करने के एवज़ में लेते हैं। इसमें अधिकारी या नेता लेन-देन का माध्यम हवाला एजेंटों के जरिये कराते हैं और यही हवाला एजेंट संबंधित अधिकारी या नेता के स्विस बैंक के खाते में जमा करा देते हैं। अवैध तरीके से देश के अंदर कमाये गए काले धन को विदेशी बैंकों में जमा कराने में अहम भूमिका निभाने वाले हवाला एजेंट लचर कानून के चलते देश को चूना लगा कर अधिकारियों, नेताओं और उद्योगपतियों के खाते पैसा जमा करा देते हैं। हवाला एजेंटों को फॉरेन एक्सचेंज रेग्यूलेटर्स ऐक्ट का जो डर था, वह भी खत्म हो गया है। इसके तहत गलत तरीके से मुद्रा की हेराफेरी करने पर जुर्माना, गिरफ्तारी और आपराधिक मुकदमे का प्रावधान था। लेकिन सरकार अंतरराष्ट्रीय कारोबार को बढ़ावा देने के नाम पर इस कानून की जगह फॉरेन एक्सचेंज मेंटीनेंस ऐक्ट लेकर आई है। इस कानून के तहत सिर्फ जुर्माना वसूला जाता है। यानी मुद्रा की हेरा फेरी करने वालों के बीच कानून का डर लगभग खत्म हो गया है। दूसरी एक बात और आज जमाना बहुत हाईटेक हो गया है अब नकद रकम की जगह लोग हेरा फेरी करते वक्त इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं जिससे उनके पास नकद रकम भी नहीं मिलती है।
मेरे अनुभव के अनुसार यह कह पाना कठिन है की यह सरकार अपने वादे को पूरा कर सकने में सक्षम होगी और काले धन का मुद्दा केवल चुनावी मुद्दा बन कर रह जाये गा।