सोमवार, 25 अगस्त 2014

अंतर्जातीय विवाह के इतिहास पर एक नज़र



अंतर्जातीय विवाह के इतिहास पर नज़र डाले तो ज्ञात होता है की हिन्दू और मुसलमानो के बीच शादिया १४०० साल पहले भी होती थी और उन शादियों का उदाहरण इतिहास के पानो में दर्ज है। क्या वे लव - जेहादी थे यह हिन्दुस्तान में मुसलमानो की जनसँख्या बढ़ाने के उदेश्य से ऐसा किया गया था? नहीं यह विवाह आपसी सम्बन्धो को सुदृण बनाने की नियत से किये जाते थे और रिश्तो को अपने खून से सींचा जाता था। इतिहासकारो के अनुसार रसूल अल्लाह मोहमद साहेब और उनके खानदान की हिंदुस्तान गहरे रिश्ते थे। इस्लाम से काफी पहले से ही भारत, इरान और अरब में व्यापारिक रिश्ते थे इस्लाम के आने से ठीक पहले इरान में सासानी खानदान के २९ वें और अंतिम आर्य सम्राट "यज्देगर्द (५९०ई) की हुकूमत थी। उस समय ईरान के लोग भारत की तरह अग्नि में यज्ञ किया करते थे। इसी लिए "यज्देगर्द" को संस्कृत में यज्ञ-कर्ता भी कहते थे।

प्रसिद्ध इतिहासकार राज कुमार अस्थाना ने अपने शोधग्रंथ "Ancient India" में लिखा है कि सम्राट यज्देगर्द की तीन पुत्रियाँ थी, जिनके नाम निम्नलिखित थे मेहर बानो, शेहर बानो और किश्वर बानो थे। यज्देगर्द ने अपनी बड़ी पुत्री की शादी भारत के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय से करावा दी थी। उस समय उनकी राजधानी उज्जैन थी और भूरिया दत्त राजा के सेनापति हुआ करते थे। भूरिया दत्त के एक भाई रिखब दत्त व्यापारी थे और यह लोग कृपाचार्य के वंशज कहे जाते हैं। चन्द्रगुप्त ने मेहर बानो का नाम चंद्रलेखा रख दिया था क्योंकि मेहर का अर्थ चन्द्रमा होता है राजा के और मेहर बानो से एक पुत्र समुद्रगुप्त पैदा हुआ। यह सारी घटनाएँ छटवीं शताब्दी की हैं। यज्देगर्द ने दूसरी पुत्री शेहर बानो की शादी इमाम हुसैन से करवाई थी और उनसे जन्मे पुत्र का नाम "जैनुल आबिदीन" रखा गया। इस तरह समुद्रगुप्त और जैनुल अबिदीन मौसेरे भाई थे। इस बात की पुष्टि "अब्दुल लतीफ़ बगदाद( ११६२ -१२३१) ने अपनी किताब "तुहफतुल अलबाब" में भी की है और जिसका हवाला शिशिर कुमार मित्रा ने अपनी किताब "Vision of India" में भी दिया है।

जब सन ६८१ में हजरत अली का निधन हो गया और मुआविया बिन अबू सुफ़यान खलीफा बना वह बहुत कम समय तक रहा। उसके बाद उसका लड़का यजीद सन ६८२ में खलीफा बन गया जो एक अय्याश, अत्याचारी और दुराचारी ख़लीफ़ा था। वह सारी सत्ता अपने हाथों में रखना चाहता था और इसी नियत से उसके द्वारा सूबों के सभी अधिकारीयों को पत्र भेजा और उनसे अपने समर्थन में बैयत (oath of allegiance) देने का दबाव बनाया कुछ लोगों ने डर या लालच के कारण यजीद का समर्थन देने को सहमत हो गये परन्तु इमाम हुसैन ने बैयत करने से साफ इन्कार कर दिया। यजीद को आशंका थी कि यदि इमाम हुसैन बैयत नहीं करते तो ऐसी सूरत में आवाम इमाम के पक्ष में हो जाये गी। यजीद अपने मनसूबे के तहत यह तय कर चूका था की इमाम की बैयत होने पर इमाम हुसैन अपनी ताकत के ज़ोर पर दबाव बनाये गा। यज़ीद युद्ध की समस्त तैयारी कर चूका था मगर इमाम हुसैन युद्ध और खूंरेज़ी से बचना चाहते थे। वहा के मौजूदा हालात को देखते हुए शहर बानो ने अपने पुत्र जैनुल अबिदीन के नाम से एक पत्र उज्जैन के राजा चन्द्रगुप्त को भिजवा दिया था। जो आज भी जयपुर महाराजा के संग्राहलय में मौजूद है। बरसों तक यह पत्र ऐसे ही दबा रहा, फिर एक अंगरेज अफसर Sir Thomas Durebrught ने २६ फरवरी १८०९ को इसे खोज लिया और पढ़वाया गया और और १८१३ में प्रकाशित हुआ जिससे सारी घटना को उजागर किया।

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