रविवार, 18 जनवरी 2015

कौन है ज़ाकिर नाइक

डॉ अब्दुल जाकिर नाइक का जन्म १८ अक्टूबर सन १९६५ में मुंबई में हुआ था भारत, उन्होंने मुम्बई शहर में सेंट पीटर हाई स्कूल (आईसीएसई) में पढ़ाई की। बाद में वे किशिनचंद चेलाराम कॉलेज में प्रवेश लिया और फिर टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज और नायर अस्पताल में दवा का अध्ययन किया और मुंबई विश्वविद्यालय से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की।
ज़ाकिर नाइक वहाबी विचारधारा का पोषक और दुनिया के कई देशो में मुस्लमान नव-जवानों को अपने विचारो से वहाबियत की तालीम देने में मशगूल है। जाकिर नाइक ने अपने डॉक्टरी पेशे के बजाय इस्लाम के प्रचार प्रसार को अपने लिए सबसे मुफीद व्यवसाय बना लिया है तो इसमें हर्ज़ ही क्या है? अगर एक साइकिल का पंचर लगाने वाला आसाराम बापू बन कर रासलीला खेल सकता है तो जाकिर फिर भी डॉक्टर रह चुके है वह भी कोई झोलाछाप नहीं एम बीबीएस। जाकिर ने बॉम्बे यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट जैसे संघटन का इस्तेमाल करके आम मुसलमानो में अपनी धौस ज़माने की चालाकी, इससे क्या फर्क पड़ता है। लेकिन जब जाकिर नाइक जैसे लोग सम्प्रदायों और समाज में विघटन और द्वेष का कारण बनने लगे तो उनके व्यक्तव्यों, भाषणो और प्रवचनों के पीछे छुपे मकसद को जानना क्या अनिवार्य नहीं है जाकिर ने अपने धार्मिक कैरियर की शुरुआत दूसरे धर्मो को इस्लाम के मुकाबिल तुच्छ साबित करने से की थी इसके लिए अन्य धर्मो के कुछ सभ्य किस्म के सीधे साधे धर्माचर्यो को अपने कार्यकर्मो में बुलाते थे और उनके धर्मो की त्रुटिया बताकर इस्लाम की महानता को सिद्ध करने की कोशिश करते थे। आम मुस्लमान दूसरे धर्माचार्यो को प्रतिसाद होता हुआ देख कर जाकिर नायक से बहुत प्रभावित होते थे।
ज़ाकिर नाईक साहब के कुछ प्रसिद्ध वक्तव्यों की एक बानगी देख लीजिये –
“यदि कोई व्यक्ति मुस्लिम से गैर-मुस्लिम बन जाता है तो उसकी सज़ा मौत है, यहाँ तक कि इस्लाम में आने के बाद वापस जाने की सजा भी मौत है…”
मुस्लिम देशों में किसी अन्य धर्मांवलम्बी को किसी प्रकार के मानवाधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिये, यहाँ तक कि किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल भी नहीं बनाये जा सकते…
ज़ाकिर नाईक के अनुसार मुस्लिम लोग तो किसी भी देश में मस्जिदें बना सकते हैं लेकिन इस्लामिक देश में चर्च या मन्दिर नहीं चलेगा।
यदि मुझसे पूछा जाये लादेन इस्लाम के विरोधियों से लड़ रहा है और वह इस्लाम का सच्चा योद्धा है।
यदि लादेन सबसे बड़े आतंकवादी देश अमेरिका को आतंक का सबक सिखा रहा है तो हर मुस्लिम को आतंकवादी बन जाना चाहिये।
यदि महिलाएं पश्चिमी परिधान पहनती हैं तो वह खुद को बलात्कार का शिकार बनने के लिये “पेश करती” हैं। 
(उक्त सभी महान विचार बाकायदा अखबारों और यू-ट्यूब पर मौजूद हैं…)

जब उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ने लगी तो वे अपने भव्य कार्यकर्मो में धर्मपरिवर्तन भी कराने लगे। यह सिलसिला कुछ आगे यो बढ़ा की उन्होंने अपने ही धर्म के दूसरे सम्प्रदायों को गलत ठहरना शुरू कर दिया और इंतिहा तब हो गयी जब उन्होंने हज़रत मोहम्मद के नवासे हुसैन के हत्यारे यज़ीद को उचित ठहराते हुए उसे खुदा का प्रिय बंदा कह डाला। इमाम हुसेन का इस्लाम और उर्दू साहित्य में वही मुकाम हे जो हिन्दू मत में राम का है और यज़ीद के प्रति वही घृणा हे जो रावण के लिए है। पुरे विश्व के शिया और सुन्नी की यही आस्था हे जो केवल सऊदी अरब द्वारा प्रचारित इस्लाम को माने वाले ( जो की वहाबी कहलाते हे ) वही यज़ीद के प्रशंसक और इमाम हुसैन के आलोचक है। शायद यहाँ यह बताना गैर जरुरी नहीं होगा की पुरे विश्व में इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले सारे लोग वहाबी सम्प्रदाय के है।
फिर आखिर वहाबियत की विचारधारा गम-ए-हुसैन मनाने का विरोध क्यों करती है? वहाबियत क्यों नहीं चाहती कि यज़ीद की काली करतूतों तथा उसके दुष्चरित्र को उजागर किया जाये तथा हज़रत इमाम हुसैन की अज़ीम कुर्बानी के कारणों को दुनिया के सामने क्यों न पेश किया जाये? वहाबियत के पैरोकारों ने अपने पक्ष में कई दलीलें पेश कीं। स्थानीय स्तर पर सुनी गई उनकी दलीलों का हवाला देने के बजाए मैं यहां वहाबी विचारधारा के देश के सबसे विवादित व्यक्ति ज़ाकिर नाईक के विचार उद्धृत करना मुनासिब समझूंगी। ज़ाकिर नाईक यज़ीद को न केवल सच्चा मुसलमान मानते हैं बल्कि उसे वह जन्नत का हकदार भी समझते हैं। ज़ाकिर यज़ीद को बुरा-भला कहने वालों, उसपर लानत-मलामत करने वालों की भी आलोचना करते हैं। नाईक के अनुसार यज़ीद मुसलमान था और किसी मुसलमान पर दूसरे मुसलमान को लानत कभी नहीं भेजनी चाहिए। वहाबियत के भारत के प्रमुख स्तंभ व मुख्य पैरोकार समझे जाने वाले ज़ाकिर नाईक के यज़ीद के विषय में व्यक्त किये गये विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वहाबियत कैसी विचारधाराओं की पोषक है? यहां ज़ाकिर नाईक के या यूं कहा जाए कि वहाबियत के पैराकारों के मुताबिक तो अजमल कसाब, ओसामा बिन लाडेन, एवं अल-जवाहिरी तथा हाफिज़ सईद जैसे मानवता के सबसे बड़े गुनहगारों को भी सिर्फ इसलिए बुरा-भला नहीं कहा जाना चाहिये क्योंकि यह मुसलमान हैं?
Asad Jafar's photo.पिछले दिनों जाकिर ने यज़ीद को उचित ठहराते हुए उसकी प्रशंसा की तो स्वभाविक तौर पर भारत और पाकिस्तान में इसकी सख्त प्रतिकिर्या हुई सुन्नी और शिया उलेमा ने एकजुट होकर जाकिर की निंदा की थी और उन्हें चेतावनी दी थी तब उन्होंने अपने बयान पर माफ़ी तलब कर ली थी और यह मामला एक विस्फोटक रूप लेने के बाद दब गया था उन्होंने अपने भाषण में यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया की मुस्लमान सिर्फ अल्लाह से दुआ मांग सकता हे वह किसी भी दिवंगत व्यक्ति से दुआ नहीं मांग सकता, यहाँ तक की हज़रत मोहम्मद से भी नहीं। इस बयान ने आम मुस्लिम को ज़बरदस्त उत्तेजित किया और उन्होंने एकबार फिर एकजुट होकर इसकी निंदा की जिसके नतीजे में लखनऊ और इलाहबाद में जाकिर के बड़े पैमाने पर होने वाले कार्यकर्म राज्य सरकार ने रद्द करा दिए तथा उत्तर प्रदेश में ज़ाकिर के आने पर पाबन्दी भी लगा दी। क्या जाकिर नायक विवाद पैदा करके चर्चा में रहना चाहते है? या फिर वे मुसलमानो के वहाबी सम्प्रदाय में अपनी लोकप्रियता से इतने मुग्द है की उन्हें अब इस बात की परवाह नहीं रही की उनके व्यक्तव्यों से मुस्लिम सम्प्रदाय में कितना खतरनाक द्वेष फैल रहा है ?
दरअसल जाकिर नाईक एक सोचे समझे मनसूबे के तहत इस तरह की बाते करते हे उन्होंने डॉक्टरी पेशे पर ध्यान देने के बजाय इस्लाम का प्रचार शुरू किया , जिसके लिए सऊदी सरकार ने अपने ख़ज़ाने का दस प्रतिशत सुरक्षित कर रखा है। क्या यह गौर करने की बात नहीं हे की हर सुशिक्षित भारतीय ये जानता है की बिन-लादेन जितना अमेरिका इज़राइल को दुश्मन मानता हे वह भारत को भी दुश्मन मानता है जिसका इज़हार वह १९९० से अपने विभिन्न साक्षात्कार में और अपनी वेबसाइट पर कर चूका है ग्यारह सितम्बर के बाद इसी ओसामा का समर्थन जाकिर नाईक अपने कार्यकर्मो में निरंतर करते चले आ रहे है। वे तो ऐलान तक करते चले आ रहे हे की बुश इस्लाम का दुश्मन हे और अगर ओसामा बुश का दुश्मन हे तो वे उसका समर्थन ही नहीं करते, बल्कि वे चाहेंगे की हर मुस्लिम ओसामा बन जाए।
जाकिर तमाम मुसलमानो को ओसामा बनने की शिक्षा दे रहे हे तो आखिर वे उन्हें ओसामा के किस रूप में देखना चाहते है ? अमेरिका विरोधी या भारत विरोधी ? क्या जाकिर इतने मासूम है की उन्हें यह नहीं पता की ओसामा रूढ़िवादी आतंकवादी और भारत विरोधी भीहै जाकिर नायक दूसरे धर्मो को तुच्छ साबित करके इस्लाम को एक महान धर्म के तौर पर पेश करने की कोशिश में ऐसी आग से खेल रहे है जिसमे ना केवल उनका बल्कि मुस्लिम सम्प्रदाय का भी हाथ जल सकता है मिसाल के तौर पर वे बाइबल से लेकर उपनिषदों में त्रुटिया निकालते है अगर दूसरे धर्मो का कोई प्रचारक इस्लाम में त्रुटिया निकालने लगे तो क्या सूरत होगी ? क्या जाकिर नायक और उनके माने वाले इस तरह की किसी बहस को तैयार है / यह प्रश्न इसलिए बहुत अहम हो जाता है की जाकिर नाईक से बहस करने वाले एक पादरी ने कहा था की वे ( जाकिर ) तो बाइबल और जीसस में कीड़े निकाल रहे थे क्या मै भी इस्लाम के लिए ऐसा ही करू ? मेरी राय में पादरी का यह सवाल सिर्फ जाकिर नायक से ही नहीं उन तमाम मुसलमानो से है जो जाकिर की याददाश्त को कोई देवीय चमत्कार मानते है की उन्हें उपनिषदों बाइबिल और कुरान की आयते कंठस्थ है और जब वे अपनी बहस में उनका हवाला देते है तो दूसरे धर्मो को माने वाला कैसे ढेर हो जाता है जाकिर नायक यह कोई नया धार्मिक कीर्तिमान नहीं कायम कर रहे है वास्तव में उनका आदर्श दिदात नाम का वह दक्षिणी अफ़्रीकी धर्मप्रचारक था, जिसने अस्सी के दशक में ईसाइयो को कुरान के माध्यम से इस तरह चुनौती दी थी उसे भी कुरान और बाइबिल के सैकड़ो शलोक कंठस्थ थे। यह न तो कोई देवीय चमत्कार है और ना ही असंभव कारनामा। अहमद दिदात और जाकिर नायक दोनों का धर्म का प्रचार उसी तरह व्यवसाय है जिस प्रकार की रामजेठमलानी का पेशा है। रामजेठमलानी को पूरा इंडियन क्रिमिनल ला कंठस्थ है तो क्या वह उनका कोई कारनामा है ? अगर उन्हें एक कामयाब वकील बने रहना है तो उसके लिए यह जरुरी है। जाकिर नायक भी इसी वास्तविकता से खूब वाकिफ है और उन्होंने स्वम् को सऊदी इस्लाम का एक कामयाब प्रचारक साबित कर दिया है, तभी तो केवल पंद्रह बरसो के भीतर वह सौ करोड़ रूपये के इस्लामी चैनल और पांच हज़ार रूपये महीने फीस वाले इस्लामी स्कूल का मालिक बन गये है। यही नहीं हर साल वह इस्लामी कॉन्फ्रेंस करते है जिस पर वे करोड़ो रूपये पानी की तरह खर्च करते है। मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है की वह धर्म का कारोबार क्यों कर रहे है। मेरी चिंता इस विषय को लेकर है की उनका अपने कारोबार को कामयाब बनाने का नुस्खा बहुत खतरनाक मोड़ ले चुका है जिसकी कीमत शायद उन्हें नहीं किसी और को चुकानी पड़ सकती है।
Asad Jafar's photo.
गो बैक ज़ाकिर नाईक, मुसलमानो का दुश्मन वापस जाओ, के नारो के साथ कल इस्लामिक सेंटर दिल्ली में ज़ाकिर के लेक्चर का विरोध करते हिंदुस्तानी हिन्दू और मुस्लमान।
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बुधवार, 7 जनवरी 2015