बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

ने - ता 




नेता शब्द दो अक्षरों से बना है- “नेऔरता इनमें एक भी अक्षर कम हो तो कोई नेता नहीं बन सकता ने - अर्थात नेतृत्व और ता - ताकत को दर्शाता है आज के नेता बड़ी भागदौड़ में रहते है दिन गेस्ट हाउस में गुजारते रातें डाक बंगलों में लंच अफसरों के साथ लेते डिनर सेठों के साथ इस बीच जो वक्त मिलता उसमें भाषण देते कार्यकर्ताओं को संबोधित करते कभी कभी खुद संबोधित हो जाते मतलब यह कि बड़े व्यस्तनेऔरतादो अक्षरों से मिलकर तो बने थे एक दिन यह हुआ कि उनकाताखो गया सिर्फनेरह गया जिसका नतीजा दिल्ली के चुनाव में स्पष्ट दिखाई देता है

इतने बड़े नेता थे औरतागायब शुरू में तो उन्हें पता ही नहीं चला बाद में सेक्रेट्री ने बताया कि सर आपकातानहीं मिल रहा है लगता है कही खो गया है आप सिर्फनेसे काम चला रहे हैं नेता बड़े परेशान हो गये "ता" के खो जाने से नेता जी ताकत चली गई सिर्फ नेतृत्व रह गया तालियाँ खत्म हो गईं जोताके कारण बजती थीं ताजगी नहीं रही नेता बहुत चीखे मेरे खिलाफ यह हरकत विरोधी दलों ने की है इसमें विदेशी शक्तियों का हाथ है यह मेरी छवि धूमिल करने का प्रयत्न है पर जिसकाताचला जाए उस नेता की सुनता कौन है सी आई डी लगाई गई सी बी आई ने जाँच की रौ की मदद ली गईतानहीं मिला इस "ता" की तलाश में ओबामा से संपर्क किया उसे भारत आने का आमंत्रण दिया, चाय पर चर्चा भी हुई, बेशकीमती सूट भी पहना, प्रभावित करने के प्रयास भी हुए परन्तु नतीजा सिफर ही निकला सोचा "ता" किसी धन-कुबेर के ताले से उधार मांग ले परन्तु वहाँ भी निराशा हाथ लगी धन-कुबेर का जवाब बहुत रोचक और तर्कसंगत था वह सोच के बोला की भाईतामेरे लिये बहुत जरूरी है कभी तालाबंदी करनी पड़े तो ऐसे वक्त तू तो मजदूरों का साथ देगा मुझेताथोड़े देगा सो माफ़ करोसेठ जी को नेता ने बहुत समझाया जब तक नेता रहूँगा मेराताआपके ताले का समर्थन और रक्षा करेगा आपतामुझे दे दें और फिर "ले" जब तक मेरे पास "ता" रहेगा आप लेते रहना मैं कुछ नहीं कहूँगा सेठ जी नहीं माने नेता क्रोध से उठकर बाहर चले आये

विरोधी मजाक बनाने लगे अखबारों में खबर उछली कि कई दिनों से नेता कातानहीं रहा कही खो गया है लगता है की वह केजरीवाल को पड़ा मिला है अब चिन्ता थी की अगर "ने" भी चला गया तो कहीं का नहीं रहुगा खुद नेता के दल के लोगों ने दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष से शिकायत की आपने एक ऐसा नेता हमारे सिर पर थोप रखा है जिसके पासतानहीं है पार्टी अध्यक्ष भी चिन्ता में थे, गुजरात स्थित बुद्धिजीवियों से और दूसरे नेताओ से चर्चा करी और फैसला किया की अपने सारे मंत्री और संतरी को "ता" तलाश में लगाया जाये नतीजा सारे के सारे मंत्री और संतरी दिल्ली की गलियों की धूल फाकते रहे परन्तु "ता" का पता नहीं चला

नेता दुखी था पर उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह जनता में जाए और कबूल करे कि उसमेंतानहीं है यदि वह ऐसा करता तो जनता शायद अपनाताउसे दे देती पर उसे डर था कि जनता के सामने उसकी पोल खुल गई तो क्या होगा

एक दिन नेता जी अजीब काम किया, कमरा बंद कर जूते में सेतानिकाला औरनेसे चिपकाकर फिर नेता बन गया यद्यपि उसके व्यक्तित्व से दुर्गंध रही थी मगर वह खुश था कि चलो नेता तो हूँ केन्द्र के मंत्रियो और पार्टी अध्यक्ष ने भी उसके इस जुगाड़ का समर्थन किया पार्टी ने भी कहा- जो भी नेता है ठीक है हम फिलहाल परिवर्तन के पक्ष में नहीं हैं समस्या सिर्फ यह रह गई कि लोगों को इस बात का पता चल गया था आज स्थिति यह है कि लोग नेता को देखते हैं और अपना जूता हाथ में उठा लेते हैं उन्हें डर है कि कहीं वो इनके जूतों में से "ता" चुरा ले

लेकिन मेरा विश्वास है मित्रों जब भी संकट आएगा नेता का "ता" नहीं रहेगा लोग निश्चित ही जूता हाथ में ले बढ़ेंगे और प्रजातंत्र की प्रगति में अपना योग देंगे