सोमवार, 3 नवंबर 2014

यौमे-आशूरा 

हज़रत रसूले इस्लाम स.अ. फ़रमाते हैं: अगर समाज में कोई ऐसा ज़ालिम इंसान हुकूमत कर रहा हो जो अल्लाह तआला के हलाल को हराम और उसके हराम को हलाल कर रहा हो, जो ख़ुदा के प्रण को तोड़े, लोगों में अत्याचार, दुश्मनी और ईर्ष्या के साथ काम कर रहा हो अगर कोई इंसान ऐसी स्तिथियों को देखे और अपनी ज़बान या अमल से विरोध न करे तो ख़ुदा को यह अधिकार है कि उस इंसान को भी उसी जगह में ले जाए जहाँ उस ज़ालिम और अत्याचारी को ले जाएगा। आज दुनिया में बहुत से इस्लामी मुल्कों में ऐसे ज़ालिम बादशाह, शासक और रहनुमा हैं जो अल्लाह के हलाल को हराम करते हैं और उसके हराम को हलाल करते हैं, ख़ुदा के प्रण को तोड़कर सामंतवादी / साम्राज्यवादी देशो से हाथ मिलाते हैं, ख़ुदा को छोड़कर शैतान से गले मिलते हैं, आज का सबसे बड़ा शैतान यही सम्रायवादी पूंजीपति देश है जिनके सम्मुख आज का मुसलमान शासक सजदा करते हैं उनका महिमामण्डल करते है और दुनिया के सारे मुस्लमान चुप रहते हैं। इमाम हुसैन नें अपने ज़माने के इस ज़ालिम का विरोध किया जो अत्याचार कर रहा था, अल्लाह के हुक्म का और दीन का मज़ाक़ उड़ा रहा था और दुनिया के तमाम इंसानों को यह शिक्षा दी कि जब ऐसे हो तो उन्हे क्या करना चाहिये और किस तरह उसका विरोध करना चाहिये।

ख़ुदाई रंग और इलाही नियत को इमाम हुसैन के आंदोलन में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। इमाम ने सिर्फ़ व सिर्फ़ अल्लाह के लिये और तबाह हो चुके दीन को दोबारा ज़िंदा करने के लिये आंदोलन किया और कदापि कोई दुनियावी कारण या हुकूमत व पद या प्रतिष्ठा की लालच उसमें शामिल नहीं थी, कर्बला का चप्पा चप्पा इस दावे का गवाह है। इसलिए इमाम ने अपने इस आंदोलन में हमेशा अपनी इलाही ज़िम्मेदारी पर ध्यान दिया और नतीजा अल्लाह पर छोड़ दिया। इस सच्चाई को हर जगह आपके बयानों, अपने प्रवचन और अमली व्यवहार में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 

कर्बला की घटना की दूसरी ख़ास बात यह है कि इस घटना में न केवल यह कि मोमिन व हक़ परस्त बल्कि मासूम इमाम, असहाबे किसा का पांचवा सदस्य, रसूले इस्लाम की बेटी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का चहेता बेटा उन लोगों के हाथों जो अपने को पैग़म्बर के वंशजो में से थे, भयानक व बर्बर तरीक़े से शहीद कर दिया गया। दिन के उजाले में इमाम हुसैन को उस आध्यात्मिक व्यक्तित्व और परिवार व वंश की महानता के बावजूद। अवश्य ही किसी भी इंसान व मोमिन की हत्या एक बड़ा अपराध है लेकिन निश्चित रूप से किसी ऐसे इंसान को जो अल्लाह का दूत, ज़माने का इमाम हो और जिसने ज़ुल्म व अत्याचार के विरूद्ध आंदोलन किया हो, शहीद करना वह भी उस बर्बर व दर्दनाक तरीक़े से ऐसा बड़ा गुनाह है कि जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। शिया व सुन्नी किताबों में ऐसी रिवायतें मौजूद हैं जिनमें आपकी शहादत के बाद ज़मीन व आसमान में परिवर्तन, आसमान वालों और फ़रिश्तों के आंसू बहाने का उल्लेख है। 

इससे बड़ी अफ़सोस की बात यह है कि वह लोग जो मुसलमान होने का दावा करते थे, ज़ाहिर में नमाज़ भी पढ़ते थे, क़ुरआन की तिलावत भी करते थे अपने पैग़म्बर के जिगर के टुकड़े से मुक़ाबले के लिये उठ खड़े हुए (बिहारूल अनवार) और पूरी बेरहमी व निर्दयता के साथ तक़वा व ईमान के आदर्श को शहीद कर दिया और उनके परिवार का अपमान किया और उनका माल व सामान लूट लिया। 

निसंदेह कर्बला में शहीद होने वाले इमाम के असहाब व साथियों की संख्या बहुत कम थी लेकिन उनकी ज़िंदगी उनकी बातचीत और उनके व्यवहार से पता चलता है कि सबके सब मोमिन, वफ़ादार व निस्वार्थ लोग थे और इसका सबसे बड़ा सुबूत दसवीं मुहर्रम की रात इमाम का अपने साथियों की प्रशंसा में यह कहना कि
"मेरे साथियों से बेहतर किसी के साथी नहीं और मेरे परिवार वालों से नेक और ज़िम्मेदार किसी का परिवार नहीं है।" 

इमाम हुसैन और उनके असहाब वैसे तो बहुत सी विशेषताओं के मालिक थे लेकिन एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता जो उनमें पाई जाती थी ज़िल्लत व अपमान को स्वीकार न करना और निडर होकर बहादुरी से ज़ुल्म से टकराना था। दुश्मन ने जितनी भी कोशिश की कि उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करे या एक भी शब्द यज़ीद की ख़िलाफ़त की पुष्टि में उनकी ज़बान से जारी हो जाये लेकिन कामयाब नहीं हुआ और उनके मुंह से कमज़ोरी व पछतावे पर आधारित एक भी शब्द के सुनने की हसरत दुश्मन के दिल में ही घुट कर रह गई। हम अपमान स्वीकार कर लें यह सम्भव ही नहीं, का नारा बुलन्द करते और अल्लाह की क़सम न मैं ज़िल्लत स्वीकार करूंगा और न ही ग़ुलामों की तरह फ़रार हो गा हमेशा हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गया। इब्ने अबिल हदीद मोतज़ेली ने अपनी किताब में नहजुल बलाग़ा के 51वें ख़ुत्बे की व्याख्या में ज़ुल्म स्वीकार न करने वालों का इतिहास के शीर्षक से एक चर्चा की जिसमें कुछ ऐसी हस्तियों का नाम बयान किया है जिन्होंने इसालमी इतिहास में ज़ुल्म व अत्याचार को क़बूल नहीं किया। इस चर्चा की शुरूआत में उन्होंने लिखा है:
दुनिया के ऐसे लोग जिन्होंने ज़ुल्म कबूल नहीं किया और तलवारों की छाया में मौत को ज़िल्लत व अपमान पर प्राथमिकता दी सबके सरदार व लीडर का नाम हुसैन इब्ने अली है जिन्हें और जिनके असहाब को अमान दी गई लेकिन उन्होंने ज़िल्लत के आगे सर नहीं झुकाया और मौत को स्वीकार कर लिया। न केवल इमाम हुसैन बल्कि उनके सारे साथी जो 10वीं मुहर्रम सन 61 हिजरी में कर्बला के मैदान में शहीद किये गए, आत्मसम्मान और हिम्मत व बहादुरी के शीर्ष पर थे। 

शिम्र के अमान नामे का हज़रत अबुल फ़ज़लिल अब्बास द्वारा रद्द किया जाना इस सच्चाई की एक मिसाल है। दुश्मनों ने उनके जिस्मों के टुकड़े टुकड़े कर दिये लेकिन उनकी इज़्ज़त, सम्मान और महानता को कम नहीं कर सके। एक अरब शाएर ने कहा हैः 
तलवारों और भालों ने उनके बदन के टुकड़े टुकड़े कर दिये *** लेकिन उनकी बड़ाई और महानता में को कम नहीं कर सके।

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने दुनिया को यह बताने के लिए कि दीन सिर्फ नमाज़ रोज़े का ही नाम नही है, यह ख़ूनी क़ियाम किया। ताकि अवाम में जज़ब-ए-शहादत ज़िन्दा हो और ऐशो आराम की ज़िन्दगी का ख़त्मा हो। इमाम अलैहिस्सलाम ने अपने एक ख़ुत्बे में इरशाद फ़रमाया कि मैं मौत को सआदत समझता हूँ। आपका यह जुम्ला दीन की राह में शहादत के लिए ताकीद है।  औरतों ने इस दुनिया की बहुत सी तहरीकों में बड़ा अहम किरदार अदा किया है। अगर पैग़म्बरों के वाक़ियात पर नज़र डाली जाये तो हज़रत ईसा, हज़रत मूसा, हज़रत इब्राहीम यहाँ तक कि पैग़म्बरे इस्लाम के ज़माने के वाक़ियात में भी औरतों का वुजूद बहुत असर अन्दाज़ रहा है। इसी तरह कर्बला के वाक़िये को अमर बनाने में भी हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा, हज़रत सकीना अलैहस्सलाम, असीराने अहले बैत और शोहदा-ए-कर्बला की बीवियों का अहम किरदार रहा है। किसी भी तहरीक के पैग़ाम को लोगो तक पहुँचाना बहुत ज़्यादा अहम होता है और इस काम को असीराने कर्बला ने अंजाम दिया।

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