आज का चण्डूखाना
हमारे देहात में हर गाँव में एक ओखलसार हुआ करती थी जहाँ बहू-बेटियाँ, नई नवेली से लेकर बूढ़ी दादी माई तक चूड़ियाँ खनकाते हुए, सदाबहार गीत गाती हुई धान कूटा करती थी और ओखलसार के बगल में आसपास मर्दखाना का चंडूखाना होता था। चटाइयां बिछी रहती थी और गौ-तकिये लगे होते थे जहाँ नशेड़ी लोगो का जमावड़ा लगता था लोग और गोलाई में बैठ जाते और घेरे के बीच में एक तश्तरी में लकड़ी के कोयले में चण्डू सुलगायी जाती और चारो तरफ बैठे लोग एक दूसरे की गर्दन में हाथ डाल कर अपने सर को तश्तरी के करीब ले जा कर तश्तरी से निकलने वाले धुये को ज़ोर से खीचते और फिर कोई यह पड़ा है कोई उधर उलटा पड़ा है चंडू का स्वाद कड़ुआ जरूर लगता था, पर नशा बहुत मीठा होता था। घंटों यों ही शिथिल होकर आनन्द लेते रहते थे. बहुत दूर दूर की बातें सूझने लगती थी। चाँद-तारों की सैर तक कर आते थे। ऐसी ऐसी फेंकू खबरे सुनी-सुनाई आती थी, जिन पर अविश्वास करने की कोई गुंजाइश नहीं होती थी। हाय, ये सब अब कहाँ? हमारी सारी सामाजिक विधाएं बदल गयी हैं परन्तु पिछले कुछ दिनों से उस चण्डूखाने की झलक दिखने लगी है लगता है पुराने और अच्छे दिनों की वापसी हो गयी है। अब तो फेसबुक पर ‘फेकिंग न्यूज’ में कभी कभी चंडूखाने की सी ख़बरें दिखाई देती हैं, अथवा कभी कभी अपने न्यूज चैनलों को ज्यादा लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से कुछ संपादक/संवाददाता ऐसी-वैसी चंडूखाने की सी खबरें उछालते रहते हैं।
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