जुमले की सरकार
हमारे देश में नाटक, नौटंकी और तमाशे को समाज में सदा से एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है मसलन पहले मदारी भालु ले कर चलते थे मोहल्लो में करतब दिखाते भीड़ जुड़ती भालू का नाच होता छोटे बच्चो को भालू की पीठ पर बिठाया जाता कहते थे ऐसा करने से बच्चे को डर नहीं लगता। मुझे भी मेरी दादी ने भालू की पीठ पर बिठाया। मदारी बन्दर का खेल दिखाते और जुडी भीड़ से उगाई करते।
कुछ इसी प्रकार से तमाशा सार्वजनिक स्थलों पर होता जहाँ आस-पास काफी सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तर होते। यहाँ के खेल मोहल्लो के खेल से काफी जुदा होते थे मसलन एक उस्ताद होता और एक जम्हुरा। यहाँ खोई जवानी वापस लाने की, ल-ईलाज पायरिया, काकोता बवासीर की दवाये बेचीं जाती यानि कुल मिला कर भीड़ को बेवकूफ बनाने का खेल। उस्ताद पकी दाढ़ी वाला और जम्हूरा काली दाढ़ी वाला। उस्ताद ज़ोर की आवाज़ लगता जम्हूरे - जी उस्ताद, इस दवा के खाने से क्या होता है - उस्ताद जवानी वापस आती है और बीवी रोते हुए कहती है मेरे सरताज माफ़ कर दो - उस्ताद: जम्हूरे और क्या होता है। उस्ताद घर का आँगन बच्चो की किलकारी से गूंजने लगता है। और न जाने क्या संवाद होते मगर होते रोचक थे।
कुछ देर बाद चोरी से लोग जवानी वापस आने की दवाईया खरीदने आ जाते थे शाम तक कमाई कर उस्ताद और जम्हूरा नदारत हो जाते और लोग इस बात का इंतेज़ार करते रहते कि बीवी कब सरताज माफ़ कर दो कहेगी। अब यही पकी दाढ़ी और काली दाढ़ी ने अपना पैर भारत की राजनीत में जमा लिया है। जुमले बेचे जाते है और अच्छे दिनों की सौगात समझ के लोग खरीदते जा रहे है।
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