ख़ाकी निक्कर मार्ग
मैंने आज तय किया है "खक्की निक्कर मार्ग" पर जा कर देखुंगा की नाम बदलने से और क्या क्या बदला है। ऐसे तो मै अक्सर औरंगज़ेब मार्ग से गुज़रता हो परन्तु नाम बदलने के बाद वहाँ जाने की अपनी प्रबल इच्छा को टाल न सका और पहुंच गया "खाकी निक्कर मार्ग।" अपनी खोजी नज़रो से निक्कर मार्ग का शुरू से अन्त तक जायज़ा लिया वही बंगले वही पेड़ वही लोग, न लोगो की तासीर बदली है न सड़क की। वह लोग ख़ुशी मना रहे है जो आज की मौजुदा परेशानियों से लोगो का ध्यान बाटना चाहते है और अपने को भारत का असली सपूत और राष्ट्रवादी कहते है।
ऐसे तो बदलने के लिये दिल्ली में बहुत सारी सड़के है जो दुनिया के उन विभूति को समर्पित है जिन्होंने समाज और मानवता के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया और इतिहास के पन्नो में अपना नाम दर्ज कराने में सफल रहे हमने उनको सदा याद रखने के इरादे से उनके नाम से विभन्न मार्गो को चिन्हित कर दिया। आज हमारे राष्ट्रवादी उन लोगो के नाम को उन लोगो के नाम से बदल देना चाहते है जो इतिहास के पन्नो में समलित होने का सौभाग्य प्राप्त न कर सके।
क्यों न नेल्सन मण्डेला का नाम बदल के महान क्रन्तिकारी नाथूराम गोडसे मार्ग कर देना चाहिये। आखिर कौन है नेल्सन मण्डेला जिसने रंग-भेद को खत्म करने के लिए अपने जीवन के २७ साल जेल में गुज़ारे जिसको रोनाल्ड रीगन और मार्ग्रेट थैचर ने आतंकवादी की संज्ञा दी। ऐसे आतंकवादी को भारत की ज़मीन पर आदर क्यों? नेल्सन मण्डेला के विचारो की इस देव-भूमि पर क्या स्थान है जहाँ आज भी खाप पंचायत अपने फ़रमान जारी करते हो जहाँ दलित बच्चियों के साथ बलात्कार होते हो जहाँ पंचायते सज़ा के नाम पर कमसिन लड़कियों के साथ बलत्कार का हुकुम सुनाते हो। वहाँ नेल्सन मण्डेला जैसे आतंकी का कोई स्थान नहीं है - बदल दो नेल्सन मण्डेला को नाथूराम गोडसे से जो अधिक वास्तविक और प्रभावी है।
यह राष्ट्रवादियो के सोचने का विषय है यह है तीसरी सड़क "आर्कबिशप मकारियोस मार्ग": इस सड़क को नये नामांतरण की सूचि में आना चाहिये और मेरा सुझाव है इसका नवीनतम नाम आर्कबिशप आशाराम बापू मार्ग रखने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। चाहे तो "आर्कबिशप" का हिंदी में कोई उपयुक्त शब्द ढूंढ ले बेहतर होगा। इस देव-भूमि पर ईसाई का कोई स्थान नहीं है इसको लन्दन भेजो।
दिल्ली न जाने ऐसे कितने नामो से पटी पड़ी है जिनका नाम बदल कर राष्ट्रवादियो के नाम पर रखा जा सकता है आशा है टीम इंडिया बिहार चुनाव के बाद प्रधानमंत्री जी को इस विषय में अवगत कराये गी और नाम बदलने के क्रम में तेज़ी आये गी। एक सड़क का नाम और मेरे दिमाग में आता है जिसको jnu के झोलाछाप व्यक्ति के नाम पर रखा गया था जिसने समाज को बदलने में अपनी क़ुरबानी दी। जिसने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से समाज को आईना दिखने की कोशिश की और सदा की पूंजीवादी और राष्ट्रीयवादियो के निशाने पर रहा। "सफ़्दर हाश्मी मार्ग" जो उसके कार्यो को समर्पित है, अब उसके विचारो आवश्यकता नहीं रही तो उसके नाम की सड़क क्यों?
आज मै सोच कर ख़ुशी महसूस करता हूँ की पिछले शासको ने आमिर खुसरो, हज़रात निजामुद्दीन और उनके सरीके के महान सूफियों को इस सड़क की राजनीती में नहीं घसीटा वरना आज उनके साथ होने वाली दुर्दशा के बारे में सोच कर दिल सिहर जाता है।

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