क्या इस्लाम में सुधारवादी आन्दोलन की आवश्यकता नहीं है
क्या इस्लाम में सुधारवादी आन्दोलन की आवश्यकता नहीं है ? क्या हम आज भी १४०० सालो पहले की ज़िन्दगी जीना चाहते है ? अमली तौर पर हम अपने को ज़माने के साथ चलने का दावा पेश करते है और जब मज़हबी ऐतेक़ात की बात आती है तो तर्कहीन तरीके किसी भी सुधार को ख़ारिज कर देते है यह कह कर की यह इस्लाम की तालीम से मेल नहीं खाता।
मसलन बखरीद को ही ले खुदा ने हज़रात इब्राहिम से यह फ़रमाया की जो तुम्हे सब से अज़ीज़ है उसे तुम खुदा की बारगाह में क़ुर्बान कर दो। हज़रात इब्राहिम के पास अपनी औलाद के अलावा कोई और चीज़ नहीं थी जिसे वह खुदा की बारगाह में क़ुर्बान कर सकने की स्तिथि में थे तो उन्होंने अपने ख़्वाब और खुदा की इस ख्वाहिश का ज़िक्र अपनी औलाद से किया और नेकमंद औलाद ने ऐसा करने की हामी भर दी। नतीजा यह की हज़रात इब्राहिम अपनी औलाद को ले कर एक पहाड़ी पर पहुंचे अपनी आँखो पर पट्टी बांधी बेटे को लिटाया और गर्दन पर छुरी फेर दी। ग़मज़दा बाप ने जब अपनी आँखों से पट्टी हटाई तो देखा बेटा मुस्कुरा रहा है और उसकी जगह दुम्बा हलाल हो चूका था। इस तरह हज़रात इब्राहिम खुदा के दिये हुक़्म की तामील कर खुदा के विश्वसनीय बने रहे। आज उसकी याद में बखरीद मनाई जाती है। इस घटना के सैकड़ो साल बाद इस्लाम वजूद में आया।
आज हमारे पास सैकड़ो चीज़े ऐसी है जो हमे अज़ीज़ है मसलन मेरा आशियाना, मेरी कार, मेरा क़लम, मेरी घड़ी, मेरा अहम, मेरा अहंकार मेरा रूतबा और न जाने क्या क्या खुदा की बारगाह में उसको क़ुर्बान न कर हमने एक आसान रास्ता हख्तियार कर लिया अपनी औक़ात के मुताबिक बाजार से एक बकरा ख़रीदा उसके लिए भी मोलभाव किया और चिक्वे से हलाल करवा दिया १०% गोस्त बाटा ९०% खुद हज़्म कर गये। अपने क्या क़ुर्बान किया कभी दिमाग़ से सोचे। खुदा जो रब्बुल अल्मीन है क्या उसको आपके इस शार्ट कट का इल्म नहीं है। है खुदा सब जानता है और यही वजह है क़ौम की बदहाली की। यही पैसा आप प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगो को दे, ग़रीब को दे जो पैसे अभाव में मरने की दुआ माग रहा है और इसके कई बेहतर इस्तेमाल हो सकते है। यह हमको और आप को सोचना और तय करना है उल्मा मौल्वी इस पर कोई राय क्यों नहीं बनाते क्योकि उनकी रोजीरोटी खतरे में पड़ जाये गी।
आइये मिल कर एक नयी पहल करे।
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