शनिवार, 27 सितंबर 2014

जयललिता का राजनैतिक सफर 



जयललिता का जन्म २४  फ़रवरी १९४८  को एक 'अय्यर' परिवार में, मैसूर राज्य (जो कि अब कर्नाटक का हिस्सा है) के मांडया जिले के पांडवपुरा तालुक के मेलुरकोट गांव में हुआ था। उनके दादा तत्कालीन मैसूर राज्य में एक सर्जन थे। महज   साल की उम्र में ही उनके पिता जयराम, उन्हें माँ संध्या के साथ अकेला छोड़ कर चल बसे थे। पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी मां उन्हें लेकर बंगलौर चली आयीं, जहां उनके माता-पिता रहते थे। बाद में उनकी मां ने तमिल सिनेमा में काम करना शुरू कर दिया और अपना फिल्मी नाम 'संध्या' रख लिया। उस समय फिल्मो में काम करने वाली महिलाओ को अच्छी नज़र से नहीं  जाता था।

जयललिता की  प्रारंभिक शिक्षा पहले बंगलौर और बाद में चेन्नई में हुई। चेन्नई के स्टेला मारिस कॉलेज में पढ़ने की बजाय उन्होंने सरकारी वजीफे से आगे पढ़ाई की।माली हालत अच्छी होने के कारण अपनी मजबूरी की वजह से जयललिता की मां ने फिल्मों में काम तो किया लेकिन बेटी जयललिता को फिल्मी माहौल से दूऱ रखने के लिए चेन्नई भेज दिया। बला की खूबसूरत जयललिता को पढ़ाई के साथ संगीत में रूचि थी, वो बहुत अच्छा नृत्य कर सकती हैं। वह काफी मेधावी थी उन्होंने अपनी सारी पढाई सरकारी वजीफे पर की। लेकिन जब जयललिता १३ वर्ष की आयु उसकी किस्मत ने करवट बदली, जो उनके जीवन का अहम मोड़ बन गया। 'संध्या' की फिल्म के एक निर्माता की नजर जयललिता पर पड़ी और उन्होंने उन्हें हिरोईन बनने का ऑफर दिया। जिसे उनकी मां ने स्वीकार कर लिया और जयललिता ने ना चाहते हुए भी  फिल्मों के लिए हां बोल दिया और वो हिरोईन बन गईं। मात्र १५ वर्ष की आयु में जयललिता ने 'एपिसल' नाम की अंग्रेजी फिल्म में काम किया उनके खूबसूरत अदायगी और मदमस्त काया की खबर दूसरे राज्यों में पहुंची और जयललिता देखते-देखते ही तमिल के अलावा तेलुगू, कन्नड और हिंदी फिल्मों की मशहूर हस्ती बन गईं।

लेकिन तभी उनकी मुलाकात सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन से हुईं, जिनकी नजदीकियों की वजह से जयललिता का जितना नाम हुआ उससे कहीं ज्यादा उन्हें बदनामी भी झेलनी पड़ी कहा जाता है कि एमजी रामचंद्रन और जयललिता एक-दूसरे से प्रेम करते थे लेकिन एमजी रामचंद्रन विवाहित थे और दो बच्चों के पिता थे, जिसकी वजह से उनकी और जयललिता की शादी नहीं हो सकती थी, इसलिए दोनों के रिश्तों को नाम नहीं मिला हालांकि सार्वजिनक रूप से जयललिता ने हमेशा कहा कि एमजी रामचंद्रन उनके मेंटर हैं और इससे ज्यादा और कुछ नहीं, वो जब १६ की आयु में जयललिता की भेट एमजी रामचंद्रन से हुई थी उस समय रामचंद्रन की आयु ४२ साल थी। अम्मा ने १९८२ में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्ना द्रमुक) की सदस्यता ग्रहण करते हुए एम॰जी॰ रामचंद्रन के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। १९८३ में उन्हें पार्टी का प्रोपेगेंडा सचिव नियुक्त किया गया। बाद में अंग्रेजी में उनकी वाक क्षमता को देखते हुए पार्टी प्रमुख रामचंद्रन ने उन्हें राज्यसभा में भिजवाया और राज्य विधानसभा के उपचुनाव में जितवाकर उन्हें विधानसभा सदस्य बनवाया।१९८४ से १९८९ तक जयललिता तमिलनाडु से राज्यसभा की सदस्य रहीं। बाद में, पार्टी के अंदरुनी कलह के कारण जयललिता एक तमिल पत्रिका में अपने निजी जीवन के बारे में कॉलम लिखती थीं पर रामचंद्रन ने दूसरे नेताओं के कहने पर उन्हें ऐसा करने से रोका। १९८४ में जब मस्तिष्क के स्ट्रोक के चलते रामचंद्रन अक्षम हो गए तब जया ने मुख्यमंत्री की गद्दी संभालनी चाही उस समय परन्तु वह सफल हो सकी।

वर्ष १९८७  में रामचंद्रन का निधन हो गया और इसके बाद अन्ना द्रमुक दो धड़ों में बंट गई। एक धड़े की नेता एमजीआर की विधवा जानकी रामचंद्रन थीं और दूसरे की जयललिता, लेकिन जयललिता ने खुद को रामचंद्रन की विरासत का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। वर्ष १९८९ में उनकी पार्टी ने राज्य विधानसभा में २७ सीटें जीत कर विधान सभा में पहुंची थी और जयललिता तमिलनाडू की पहली निर्वाचित नेता प्रतिपक्ष बनीं। वर्ष १९९१ में राजीव गांधी की हत्या के बाद राज्य में हुए चुनावों में उनकी पार्टी ने कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा और सरकार बनाई। वे २४ जून १९९१ से १२ मई तक राज्य की पहली निर्वाचित मुख्यमंत्री और राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

१९९६  में उनकी पार्टी चुनावों में हार गई और वे खुद भी चुनाव हार गईं। इस हार के बाद सरकार विरोधी जनभावना और उनके मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुये। पहली बार मुख्यमंत्री रहते हुए उनपर कई गंभीर आरोप लगे। उन्होंने कभी शादी नहीं की लेकिन अपने दत्तक पुत्र 'वीएन सुधाकरण' की शादी पर पानी की तरह पैसे बहाए। यह विषय भी इन मामलों का एक हिस्सा रहा। भ्रष्टाचार के मामलों और कोर्ट से सजा होने के बावजूद वे अपनी पार्टी को चुनावों में जिताने में सफल रहीं। हालांकि गंभीर आरोपों के कारण उन्हें इस दौरान काफी कठिन दौर से गुजरना पड़ा, पर २००१ में वे फिर एक बार तमिलनडू की मुख्यमंत्री बनने में सफल हुईं। उन्होंने गैर चुने हुए मुख्यमंत्री के तौर पर कुर्सी संभाल ली। दोबारा सत्ता में आने के बाद उन्होंने लॉटरी टिकट पर पाबंदी लगा दी। हड़ताल पर जाने की वजह से दो लाख कर्मचारियों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया, किसानों की मुफ्त बिजली पर रोक लगा दी, राशन की दुकानों में चावल की कीमत बढ़ा दी, ५००० रुपये से ज्यादा कमाने वालों के राशन कार्ड खारिज कर दिए, बस किराया बढ़ा दिया और मंदिरों में जानवरों की बलि पर रोक लगा दी। इसी बीच भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया और उन्हें अपनी कुर्सी अपने विश्वस्त मंत्री ओ॰ पन्नीरसेल्वम को सौंपनी पड़ी। जब उन्हें मद्रास हाईकोर्ट से कुछ आरोपों से राहत मिल गई तो वे मार्च २००२ में फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी सँभाल ली। हालांकि २००४ के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद उन्होंने पशुबलि की अनुमति दे दी और किसानों की मुफ्त बिजली भी बहाल हो गई। अप्रैल २०११ में जब ११ दलों के गठबंधन ने १४ वीं राज्य विधानसभा में बहुमत हासिल किया तो वे तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने १६ मई २०११ को मुख्यमंत्री पद की शपथ लीं और तब से वे राज्य की मुख्यमंत्री हैं।


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