शनिवार, 15 नवंबर 2014

छत्तीसगढ़ और परिवार नियोजन


महावीर और बुद्ध की पावन जन्म भूमि जिसमे माँ अपने दूध में बच्चे को सत्य अहिंसा और संवेदनशीलता का ज्ञान देती हो उस पावन भूमि को किस की नज़र लग गयी है जो बचपन के दिये ज्ञान को दर-किनार कर उन सारे कृत्यों में लिप्त है जो की इस देश की संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा। छोटी छोटी बेबुनियाद तर्को पर एक दूसरे की हत्या अफवाहों पर भरोसा आपसी भाई चारे में गिरावट और जातीय नरसंघार क्या हो गया है हमको इस पर विचार करने और एक सोच बनाने की आवश्यकता है।संवेदनहीनता का सबसे नया उदारण छत्तीसगढ़ में देखने को मिला जहाँ के मुख्य-मंत्री स्वम डॉक्टर है और उस प्रदेश में सरकारी तंत्र के उपजता नक़ली दवा का कारोबार और ग़रीब लोगो की ताबाड़तोड़ होती मौत सरकार मौत पर राजनीत करती और दोषियों को बचाती नज़र रही है। यह चिंता का कारण है की जिस प्रदेश का मुख्य मंत्री स्वयं डाक्टर है, और दस साल से लगातार वह प्रदेश के मुख्यमंत्री है फिर भी उनके राज्य मे कई करोड़ रुपये की दवाई, घटिया, नकली जहरीली आदि बनती रही, बिकती रही, मरीज उनका इस्तेमाल करते रहे, यह सब काम सिर्फ एक दिन मे नही हो गया वर्षो से जरूर चल रहा होगा, सरकारे किसी भी राज्य की हो जनता के प्रति अति संवेदनहीन हो चुकी है। वर्ना इन मासूम, निर्दोष, सरकार को सहयोग देने वाली १७ महिलाओ की मौत नही होती और करीब ५० महिलाये जीवन संघर्ष मे जूझ रही होती। इन महिलाओ की मौत पहले - घंटे मे ही - की हो चुकी थी फिर इतनी ही मौतों को हॉस्पिटल प्रशासन नहीं बचा पाया जिससे साबित होता है की अस्पतलो की "कुव्यवस्था'" कितनी ज्यादा है या दवा के नाम पर जो जहर दिया गया वह कितना जहरीला निकला।

नसबंदी कार्यक्रम से इस देश की माताये करीब ९५% से ज्यादा भाग लेती है, पुरुष वर्ग तो नाम मात्र के लिये सिर्फ % से भी कम अपनी नसबंदी करवाता है, इसके लिए भारतीय समाज की मानसिकता जिम्मेदार है। लोगों में यह गलत धारणा है कि नसबंदी कराने से पौरुष खत्म हो जाएगा. इसलिए महिलाओं को ही बलि का बकरा बनाया जाता है। परिवार नियोजन कार्यक्रम मे धन का बहुत बंटवारा होता है प्रेरित करवाने वाले को, आपरेशन करने वाले, नसबंदी करवाने वाली को आदि उसी तरह से सरकारी अस्पतलो मे दवाई की सप्लाई मे काफी कमीशन बाजी होती है नेताओ को, दलाओ को, मंत्रियो को, अधिकारियो को ,कर्मचारियो आदि को खूब रिश्वत दी जाती है तब अस्पतालो मे दवाई के नाम पर घटिया दवाई खूब सप्लाई की जाती है, इस महत्वाकांक्षी सरकारी योजना की पोल खोल दी है. यह मौतें बिना सोचे-समझे लगाए जाने वाले शिविरों, वाहवाही लूटने और प्रमोशन पाने के लिए आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने, चिकित्सीय लापरवाही और ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के घटिया स्तर का नतीजा है। नसबंदी से पहले भी मौतें होती रहीं हैं. लेकिन बावजूद इसके कभी सरकार ने इस ऑपरेशन के लिए कोई ठोस दिशा-निर्देश नहीं बनाए हैं। जो पैमाने तय हैं उनकी भी जमकर अनदेखी की जाती है।  हर बार ऐसी किसी बड़ी घटना की स्थिति में समस्या का ठोस समाधान तलाशने की बजाय एक-दूसरे पर दोषारोपण का दौर शुरू हो जाता है।  समस्या की जड़ में कोई नहीं जाना चाहता है। डॉक्टर, हॉस्पिटल प्रशासन और राजनितिक लोगो की मिली भगत से दवाई की आपूर्ती के लिए सरकारी कम्पनी को सप्लाई आर्डर नहीं दिए जाते है और उनकी प्राथमिकता होती है अपनी झूठी दलीलों के आधार पर प्राइवेट कम्पनी वह भी लोकल कंपनी को आपूर्ति के आर्डर दिया जाता है और नतीजा नकली और ख़राब किस्म की दवा की सप्लाई और फिर मौते फिर आरोप और एक दूसरे को फसाने की कवायत और बचाने की कवायत का सिलसिला शुरू हो जाता है।

अब सवाल यह है की क्या सरकार छत्तीसगढ़ में हुई मौत से चेते गी क्या नसबंदी जैसे मामूली ऑपरेशन के सम्बन्ध में किसी प्रकार का कोई दिशानिर्देश राज्यों को दिया जाये गा क्या नकली दवा निर्माता को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले गी जो आने वाले दिनों में नकली और ख़राब किस्म की दवा उत्त्पादको के लिए मिसाल बने।


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