शनिवार, 1 अगस्त 2015



" क्या फांसी टाली जा सकती थी "



जुलाई ३१, २०१५ को दा ट्रिब्यूनल ने अपने सम्पादकीय "क्या फांसी टाली जा सकती थी, अपराध से अधिक सज़ा" शीर्षक से याकूब मेमन के विषय में लिखा है और ट्रिब्यूनल कहता है कि पूर्व राष्ट्रपति जिनकी मृत्यु भी उसी दौरान हुई उन्होंने अपने कार्यकाल में किसी भी दया याचिका को नहीं ठुकराया और दूसरी तरफ वर्त्तमान राष्ट्रपति ने देर रात तक जदो-जहद कर इस बात से आश्वस्त हो जाना चाहते थे की याकूब की फांसी में किसी प्रकार का विलम्ब न हो। नई दया याचिका प्राप्त होते की वर्त्तमान राष्ट्रपति ने उसे गृह मंत्रालय को भेजा और गृह मंत्री ने तत्परता दिखाते हुए अपने पूर्व-नियोजित फैसले से अवगत करने राष्ट्रपति के दरबार में हाज़िर हो गये। दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायलय ने सब को अचंभित करते हुए दया याचिका को उसी रात सुनने का फैसला किया तथा २ घण्टे के भीतर याचिका को ख़ारिज कर मृत्यु दण्ड को और फांसी पर लटकने की पृष्टि कर दी। पूरी प्रणाली ने उद्देश्य और गति की भावना के साथ काम किया।
न्याय प्रणाली ने अतिरिक्त समय तक काम कर यह सुनिश्चित कर लेना चाहती थी की फांसी अपने निर्धारित समय और तारीख पर अंजाम दी जाये इसके पलट अब्दुल कलाम फांसी के विरोधी थे। यह विरले ही देखने को मिलता है की सर्वोच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश भी फांसी विरोधी अभियान का हिस्सा बने और बी. रमन के खुलासे के आधार पर पुनः दया याचिका की सुनवाई की अपील की। ट्रिब्यूनल कहता है की जिरह की सारी सम्भावनाये निरस्त कर दी गयी और प्रक्रियाओं का पालन कर रहे थे लेकिन इस प्रणाली के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिया था। रिपोर्ट के अनुसार याकूब मेमन ने कुछ समझौतों के तहत आत्मसमर्पण किया था उसने इन धमाको में पाकिस्तान का हाथ होने का खुलासा किया था इत्त्यादि दलीले बेअसर साबित हुई। शासन मानो दावूद इब्राहिम और टाइगर मेमन को न ला पाने की खीज निकल रहा हो।

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें