बरगद का पेड़
गाँव के बीचो बीच यह बरगद का पेड़ इकलौता गवाह है गांव के बदलते हालात का - इस बरगद ने अंग्रेजी हुकुमरानों का रुआब देखा है इस गाँव के वह दिन भी देखे है जब गाँव के रहने वाले रोल्स रॉयल से आया करते थे और जिनके पास गाड़ी नही होती वह सजी हुई बग्गी से आता और जिनके पास वह भी नही थी वह ताँगे से आते। बरगद सब चुपचाप देखता और ख़ुशी से अपनी शाखों और पत्तों को लहराता। वह सब की हैसियत से वाकिफ़ था और गवाह भी। उसने वह भी देखा की जब सब ईमाम हुसैन के गम में शरीक होते तो न कोई अमीर होता न ही कोई ग़रीब सब के तन पर काले लिबास होते और नम आँखों से ईमाम हुसैन के गम में अपनी हैसियत को भुल आपस में ऐसा घुल मिल जाते जैसे सब एक हो।
बरगद ने दुखी मन से भारत का बटवारा भी देखा उसने महसूस किया की गाँव के नवजवान रोज़ी-रोटी के लिये देश छोड़ पाकिस्तान पलायनकर रहे है बरगद कहता है मैंने अपनी खुबसुरती से उन युवाओ को रिझाने की, रोकने के समस्त प्रयास किये परन्तु यह युवा न जाने किस उन्माद में मेरे पैग़ाम को अनदेखा कर अपने बूढ़े माँ-बाप को पीछे छोड़ नौकरी के और अच्छे भविष्य की आस में तेज़ी से पाकिस्तान की ओर दौड़े चले जा रहे थे मै बेबस सब देख रहा था। मैंने देखा १९५० से पहले उनमे से बहुत सारे युवा अपने अच्छे दिन के भ्रम को त्याग कर वापस अपने गाँव आते भी देखा मै अपनी कामयाबी पर खुश था।
आज जो बच्चे थे वह बुज़ुर्ग हो चुके है और अब उनके बच्चे पढ़े लिखे दुनिया के अन्य देशो में कार्यरत है परन्तु वह मुझे और इस गाँव की सरज़मी से बेपनाह मोहब्बत करते है और मोहर्रम की चाँद रात को मेरे ज़ेरेसाया जमा हो अपने ईमाम का मातम करते है और भावभीनी श्रदांजली देकर अपने रोज़गार पर चले जाते है और यह वादा भी करते है कि यदि ज़िन्दगी रही तो इंशाल्लाह अगले मोहर्रम में फिर इस बरगद के नीचे जमा होंगे।
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