बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

बरगद का पेड़ 

गाँव के बीचो बीच यह बरगद का पेड़ इकलौता गवाह है गांव के बदलते हालात का - इस बरगद ने अंग्रेजी हुकुमरानों का रुआब देखा है इस गाँव के वह दिन भी देखे है जब गाँव के रहने वाले रोल्स रॉयल से आया करते थे और जिनके पास गाड़ी नही होती वह सजी हुई बग्गी से आता और जिनके पास वह भी नही थी वह ताँगे से आते। बरगद सब चुपचाप देखता और ख़ुशी से अपनी शाखों और पत्तों को लहराता। वह सब की हैसियत से वाकिफ़ था और गवाह भी। उसने वह भी देखा की जब सब ईमाम हुसैन के गम में शरीक होते तो न कोई अमीर होता न ही कोई ग़रीब सब के तन पर काले लिबास होते और नम आँखों से ईमाम हुसैन के गम में अपनी हैसियत को भुल आपस में ऐसा घुल मिल जाते जैसे सब एक हो। 
गाँव का यह बरगद सारे धार्मिक और समाजिक समारोह का केन्द्र बना रहा और आज भी उसे इस बात का फ़क़्र महसूस करता है की गाँव ने उसके रुतबे में कोई कमी नही की। इस बरगद ने १८५७ का ग़दर देखा स्वतंत्रता संग्राम की आंधी देखी और उसमे पालारू का वह आज़ादी का दीवानापन भी देखा कैसे उसने यूनियन जैक को उतार राष्ट्रीय ध्वज को लहराया था। बरगद के सामने आठ एकड़ का तालाब पूर्व में सरकारी इमामबाडा और उसमे सरकारी दवाखाना उसके पड़ोस में राजा मेहमूदाबाद के मेनेजर रहे मेरे अब्बा के फूफा की आलीशान कोटी और मेरे दादा के भाई का खुबसूरत मकान पश्चिम में राहत मंज़िल और थोड़ी दुरी पर तीन गाँव के ज़मीदार स्वर्गीय नवाब हुसैन (मेरे नाना) का मकान। बरगद खुश होता अपने आस-पास इन शख्सियतों को देख कर और ख़ुशी का इज़हार भी करता अपनी शाखों और पत्तों को हिला कर। 
बरगद ने दुखी मन से भारत का बटवारा भी देखा उसने महसूस किया की गाँव के नवजवान रोज़ी-रोटी के लिये देश छोड़ पाकिस्तान पलायनकर रहे है बरगद कहता है मैंने अपनी खुबसुरती से उन युवाओ को रिझाने की, रोकने के समस्त प्रयास किये परन्तु यह युवा न जाने किस उन्माद में मेरे पैग़ाम को अनदेखा कर अपने बूढ़े माँ-बाप को पीछे छोड़ नौकरी के और अच्छे भविष्य की आस में तेज़ी से पाकिस्तान की ओर दौड़े चले जा रहे थे मै बेबस सब देख रहा था। मैंने देखा १९५० से पहले उनमे से बहुत सारे युवा अपने अच्छे दिन के भ्रम को त्याग कर वापस अपने गाँव आते भी देखा मै अपनी कामयाबी पर खुश था। 
आज जो बच्चे थे वह बुज़ुर्ग हो चुके है और अब उनके बच्चे पढ़े लिखे दुनिया के अन्य देशो में कार्यरत है परन्तु वह मुझे और इस गाँव की सरज़मी से बेपनाह मोहब्बत करते है और मोहर्रम की चाँद रात को मेरे ज़ेरेसाया जमा हो अपने ईमाम का मातम करते है और भावभीनी श्रदांजली देकर अपने रोज़गार पर चले जाते है और यह वादा भी करते है कि यदि ज़िन्दगी रही तो इंशाल्लाह अगले मोहर्रम में फिर इस बरगद के नीचे जमा होंगे।

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