मेरा गॉव
कलांपुर तहसील शाहगंज ज़िला जौनपुर का एक गॉव जिसका इतिहास बहुत रोचक है मेरी बहन नाहीद वर्मा में सन १९७३ में जब गांव के बारे में एक शोध किया और इस सिलसिले में गांव के कुछ विद्वानों से बात की तो पता चला कि कलाँपुर का इतिहास मोहम्मद बिन तुग़लक़ के आगमन से जुड़ता है। कहते है तुग़लक़ के साथ एक महान सूफ़ी भी भारत आये थे और उस समय कलाँपुर पर राजभर का शासन था और राजभर के नौयते पर सूफ़ी कलाँ ने कलाँपुर में बसने का फैसला किया।
कलाँपुर पहली बार चर्चा में १८५७ में आया जब अँगरेज़ हुकुमरानों ने ग़दर को कुचलने के लिये नागरा के तहसीलदार मीर सुब्हान अली, सब-इंस्पेक्टर हाजी मीर आबिद हुसैन शैख़ मोहम्मद मेहंदी को ग़दर कुचलने और अँगरेज़ हुकुमत को सहयोग करने के एवज़ में काफी ईनाम और ज़मीन दी। इसी के साथ गाँधीवाद जो व्याप्त था अदृष्ट प्रभाव भी दिखने लगा था उसकी अगुवाई स्वर्गीय सयेद मोहम्मद जाफ़र कर रहे थे जो इसी गॉव से सम्बन्ध रखते थे और मेरे बड़े अब्बा थे और परिवार के दबाव को दरकिनार कर वह स्वन्त्रता संग्राम में पुरी तरह सक्रीय भूमिका निभा रहे थे। यहाँ बताना आवश्यक होगा की स्वर्गीय सयैद मोहम्मद जाफ़र के पिता यानि मेरे दादा तहसीलदार थे और उनको यह घोषणा करनी पड़ी की उनका अपने पुत्र से कोई सम्बन्ध नही है कारण पारिवारिक ज़िम्मेदारिया खुल कर अपने पुत्र का समर्थन करने से रोकती रही। सन १९३०अन्तरिम सरकार का गठन होना था और खुटहन निर्वाचन-क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार स्वर्गीय केशव देव मालवीय मैदान में थे मुक़ामी ज़म्मीदार उनके विरोध में थे और क्षेत्र के लोगो पर उनका काफी प्रभाव था स्वर्गीय मोहम्मद जाफ़र ने अपने काम और गांधीवादी विचारधारा के प्रचार और प्रसार के बल पर स्वर्गीय श्री मालवीय को विजय दिलाई। इसी कलाँपुर के एक किसान जिसका नाम पालारू था यूनियन जैक को उतार कर हिन्दुस्तान के झण्डे को लहरा कर गॉव के लिये एक मिसाल बना। आगे चल कर स्वर्गीय सयैद मोहम्मद जाफ़र ने नेता सुभाष चन्द्र बोस के साथ मिल फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया।
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