अफवाह
राजनीति के गलियारे में चर्चित अफवाह का अपना आस्तित्व होता है चाहे बुनयादी तौर पर वह अफ़वाह एक बेतुकी सी और निराधार लगे परन्तु उसके आस्तित्व को नकारना एक भूल हो सकती है आवश्यकता होती है उस अफवाह का अपनी राजनीतिक सुझ-बुझ और राजनीतिक परिपेक्ष में विश्लेषण किया जाये। कल श्री लाल कृष्ण आडवाणी का स्पीकर और संसदीय मामलों के मंत्री के प्रति गुस्से का इज़हार और संसद न चल पाने के लिये दोनों को ज़िम्मेदार ठहराने के बाद ऐसा आभास होता है बीजेपी में सब कुछ ठीक नही है। प्रधानमंत्री का अपने सांसदों को यह आदेश की वे अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र में जाये और अपने मतदाता को विमुद्रीकरण से होने वाले लाभ से अवगत कराये, यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल। विमुद्रीकरण के कारण मतदाताओ में असंतोष और व्याप्त आक्रोश सांसदों को अपने चुनावी क्षेत्र में जाना और मतदाताओ को सम्बोधित करना एक जोखिम भरा कार्य हो सकता है जबकि वह भलीभांति जानते है अगले २-३ सालो में उन्हें उन्ही के सहारे संसद में जाना है।
कल एक अफवाह चर्चा में थी परन्तु तुरन्त ही उसपर विराम लग गया, कहते है बीजेपी में चुनाव से पहले शामिल हुए १२० सांसदों ने श्री आडवाणी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की है और उनसे आग्रह किया है कि विमुद्रीकरण से उत्पन राजनीतिक उथल-पुथल को विराम दे और देश की बागडोर संभाले। कांगेस ने इस घटनाक्रम में साथ देने से इन्कार किया है उसका मानना है ऐसा करने से श्री मोदी को लोगो की सहानभूति प्राप्त होगी और यह सच भी है, ज्ञात हो श्री मोदी की कार्यशैली को लेकर बीजेपी अंतर्धारा में काफी असंतोष व्याप्त है।
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