विमुद्रीकरण नफ़ा और नुक्सान
काले धन पर तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक एक व्यक्ति द्वारा देखे गये सपने को साकार करने का एक प्रयोग मात्र दिख पड़ता है जो कहने को तो काले पैसे आतंकवाद और बाजार में चल रही नकली मुद्रा को ख़त्म करने की अवधारणा से शुरू होकर कैशलेस सोसाइटी में परिवर्तित हो गया।
केवल
एक
ही
दिन
में
नोटबंदी
जैसा
अहम
फैसला
लेने
वाले
पीएम
मोदी
को
शायद
इस
बात
का
आकलन
करने
में
विफल
रहे
या
यु
कहा
जाये
उनके
सलाहकारों
ने
उन्हें
विमुद्रीकरण
की
जटिलता
के
विषय
में
सही
जानकारी
नही
दी
या
इस
बात
का
सही
आकलन
नही
किया
गया
कि
नोट
बदली
में
कितने
नये
नोट
की
आवश्यकता
होगी।
विमुद्रीकरण
का
शुरूआती
दिनों
में
लोगो
ने
मिश्रित
प्रतिकिर्या
व्यक्त
की
शायद
लोगो
को
भी
इससे
होने
वाली
दिक्कतों
का
अन्दाज़
नही
था
किसी
ने
भी
यह
नही
सोचा
था
की
अपनी
जमा
पूंजी
बैंक
में
डालने
के
पश्चात
अपने
ही
पैसे
की
निकासी
मुश्किल
या
नामुमकिन
हो
जायेगी उस
पर
रिज़र्व
बैंक
की
नीत
नये
दिन
बदलते
दिशा
निर्देशों
ने
पुरे
देश
में
भ्रम
की
स्थिति
उत्पन
कर
दी।
यकीनन
ये
सपना
सुदूर
भविष्य
की
दुनिया
है और
सुंदर
भी
है।
लेकिन
ये
आसान
नहीं
है और
उनका
यह
प्रिय ख्वाब अभी से सवालों के घेरे में है इसलिये विपक्ष सरकार की खिल्ली उड़ा रहा है जबकि सरकार भी मुश्किल समझ रही है।
ज्वालनशील
मुद्दे
पर
खामोश
रहने
वाले
प्रधानमंत्री
को
यह
बोलना
पड़ा
की
यह
समस्या
अल्पकालीन
है
और
शीघ्र
इसका
समाधान
होगा
और
देश
से
५०
दिनों
का
समय
माँगा
है
जिसमे
से
करीब
२८
दिन
निकल
चुके
है
और
समस्या
का
समाधान
नज़र
नही
आता।
नोटबंदी का फैसला लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने वर्तमान अर्थव्यवस्था से १००० तथा ५०० रुपये की ८० फीसदी से ज़्यादा मुद्रा हटा दी है।
बाजार
में
कैश
की किल्लत है और ऐसे में सरकार ने देश में कैशलैस सोसायटी की बहस को जन्म दे
दिया
है।
सवाल
यह
है
कि क्या ये संभव है।
यह
बहस
इस
बात
को
लेकर
है
कि
क्या
भारत
अभी
कैशलेस
अर्थव्यवस्था
बनने
के
लिए
तैयार
है
या
फिर
मोदी
सरकार
ने
आगामी
चुनावों
के
मद्देनजर
एक
नया
शिगूफा
छेड़
दिया
है
एक
सवाल
यह
भी
है
कि
क्या
यह
हमारे
देश
के
सामाजिक
एवं
आर्थिक
ढांचे
के
अनुरूप
फिट
बैठेगा विशेषज्ञ
मानते
हैं
कि
अभी
देश
को
कैशलेस
बनने
में
कम
से
कम
१०
से
१५
साल
लग
जाने
का
अनुमान
है।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव प्रोफेसर शार्दुल चौबे ने बताते हैं- वे कहते हैं- हम अभी ३ जी ४ जी पर ही अटके हुए हैं डिजिटल अज्ञानता के बारे में तो सोचा ही नहीं गया है।
देश
के
डिजिटल
बनने
में
अभी
कम
से
कम
१०
से
१५
साल
लग
सकते
हैं।
वे
कहते
हैं
सरकार
ने
अचानक
से
नोटबंदी
का
फैसला
लेकर
देश
की
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
प्रोफेसर
शार्दुल
चौबे
अनुसार
यह
फैसला
ग्रामीण
अर्थव्यवस्था
को
नजरअंदाज
कर
लिया
गया
है जहां
निरक्षरता
तो
चरम
पर
है
ही बल्कि भुखमरी गरीबी अशिक्षा भी बहुत है। बाजार विश्लेषक प्रदीप सुरेका कहते हैं देश की १२५ करोड़ की आबादी में से अधिकांश लोग गरीब और अशिक्षित हैं जिनके लिए कैशलेस लेनदेन की बात बेमानी है।
उन्हें
कैशलेस
की
आदत
डालने
से
पहले
शिक्षित
करना
पड़ेगा
जो
अपने
आप
में
एक
बड़ा
काम
है।
देश
की
एक
बड़ी
आबादी
को
शिक्षित
करने
के
बाद
समस्या
यहीं
खत्म
नहीं
होती बल्कि
देश
के
कई
क्षेत्रों
में
बुनियादी
सुविधाएं
भी
नहीं
हैं वहां
नकदी
रहित
लेनदेन
सोचना
बेमानी
होगा। अर्थशास्त्री नितिन पंत कहते हैं- देश के जिस एक तबके को स्मार्टफोन चलाना तक नहीं आता उनके लिए ई-बैंकिंग की डगर बहुत कठिन है।
देश
के
७०
करोड़
लोगों
के
पास
ही
बैंक
खाता
है
इनमें
से
२४
करोड़
खाते
पिछले
एक
साल
में
प्रधानमंत्री
जनधन
योजना
के
तहत
खुले
हैं
और
वे
इसे
लेकर
कितने
सजग
है
यह
भी
सोचने
वाली
बात
है।
दरअसल पीएम मोदी का कैशलेस सोसायटी का सपना आने वाले समय एवं भूमंडलीकरण पर नजर है भूमंडलीकरण के कारण मुद्रा वस्तु व्यक्ति को निरंतर क्षेत्रीय सीमा का अतिक्रमण करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
यकीनन
डिजिटल
मनी
और
ऑन
लाइन
ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देना अच्छी बात है लेकिन जैसा की पहले कहा देश की साक्षरता दर ही ७४ फीसदी है ऐसे में डिजिटल मनी ग्रामीण असाक्षर जनता के लिए एक बड़ा मायाजाल है क्योकि जब अभी हाल ही में आईसीआईसीआई बैंक सहित तमाम बड़े बैंकों के लाखों एटीएम पिन नंबर हैक कर लिए गये तो ऐसे में गांवों और कस्बो की जनता कैसी अपनी साइबर सुरक्षा कर पायेगी ये एक अहम सवाल है।
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