शनिवार, 27 सितंबर 2014

महा गठबंधन में टूट 


२५ सालो से चले आ रहे बीजेपी और शिव सेना के गठबंधन के टूटने के कसाय काफी दिनों से लगाये जा रहे थे और आपसी आरोप / दोषारोपण का सिलसिला काफी दिनों से चल रहा था और आखिर वह दिन आ गया जब दोनों पार्टियो ने अपने आप को एक दूसरे से अलग करने का फैसला कर लिया। श्री अमित शाह प्रधान मंत्री के सिपाहे-सालार ने अपने मुम्बई दौरे को निरस्त करते हुए शिव सेना से किसी भी प्रकार के समझौते की अटकलों पर विराम लगा दिया। यह टूट अमित शाह के कार्य शैली और अपनी सहयोगी पार्टियों के प्रति बीजेपी के रवैया को उजागर करता है और आपसी सम्बन्धो पर भी सवालिया निशान लगता है। यह देखना दिलचस्प होगा की आगामी  सभा के चुनाव प्रचार में दोनों पार्टिया जो कट्टरवाद हिदुत्व की समर्थक है एक दूसरे पर किस प्रकार के आरोप - प्रत्त्यारोप लगाती है और उनका प्रभाव आने वाले चुनाव के नतीजों पर क्या होगा। मेरा सोचना है की ऐसी परिस्थिति में गैर-मराठी मानुस को लुभाने का प्रयास भी होगा और वह किसके पाले में जाता है, जो चुनाव किसी एक पार्टी के लिए निर्णायक साबित होगा। गौरतलब है की बीजेपी+शिव-सेना का गठबंधन मुम्बई म्युनिसिपल कारपोरेशन में काबिज़ है जो की सबसे अमीर म्युनिसिपल कारपोरेशन में गिनी जाती है और उसमे गठबंधन के खत्म होने का प्रभाव क्या होगा यह समय ही बताये गा। 

राष्ट्रीय स्तर पर शिव सेना अपने मंत्रियो को NDA गठबंधन से अलग करेगा और प्रधान मंत्री के "मेक इन इंडिया" अभियान में गीते की अहम भूमिका रही है ऐसे में प्रधान मंत्री के अभियान को धक्का लगना पक्का है। संसद में शिव सेना के १८ सांसद है और राज्य सभा में ३ ऐसे में संसद में शिव सेना का आचरण क्या होगा और मोदी सरकार के लिये कितना सर दर्द बनते है इसका भी पूर्व आभास लगाया जा सकता है। खबर यह भी है की राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को बचाये रखने के प्रयास किये जा रहे है और आगामी मंत्री मंडल विस्तार में शिव सेना के सांसदों को कुछ और मंत्री पद दिए जाने के कयास भी चर्चा में है। यह तो तय है की बहुत कठिन है डगर पनघट की। 

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