शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

भारत में कम्युनिस्ट मूवमेंट 



जैसा की मै काफी समय से कहता और लिखता आया हूँ कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टिया हिंदी पट्टी के गिरते जनाधार की ओर से ग़ाफ़िल है जो चिन्ता का विषय भी है। जैसे की उत्तर प्रदेश में गन्ना पैदा करने वालो को समय पर भुगतान न होना, गन्ने के समर्थन मूल्य का मामला, मुफ्फरनगर के दंगे में बहुत बड़े पैमाने पर भूमिहीन किसानो का विस्थापन, उनके पुनर्वास को लेकर सरकारों की बेरुखी, किसानो की आत्महत्या का मामला, मौजूदा सरकार का सांप्रदायिक एजेंडा इत्यादि। यही सारे मुद्दे कमो-बेश सीपीएम के २१ वी अधिवेशन का चर्चा का मुद्दा बना और नेतृत्व की विफलता हाल के वर्षों में अपनी घटती राजनीतिक भाग्य निस्तारण करने के लिए जमीन पर अपनी ठोस कुछ भी करने में विफलता' की ओर इशारा करते हुए कार्यकर्त्ता ने सीपीएम की नीतियों और नीतिनिर्धारण करने वालो पर निशाना साधा। राजनीतिक लाइन पर दिन भर चली चर्चा के लिए अगले तीन साल के लिए अपनाई जाने वाली नीति, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे राज्यों हिंदी भाषी राज्यों से कई प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया तथा पर्याप्त नेतृत्व न दे पाने के लिये पार्टी नेतृत्व की आलोचना की। मेरा मानना है कि करात के नेतृत्व में पार्टी को जितना नुक्सान पंहुचा उतना शायद कभी नहीं पंहुचा था। नेतृत्व परिवर्तन के बाद यह देखना दिलचस्प होगा की कामरेड येचुरी अस्तित्व विहीन हो रही पार्टी को दुबारा कैसे पुनर्जीवित करते है। मेरी शुभ-कामनाये कामरेड येचुरी के साथ है। "हम लड़े गे हम जीते गे"

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें