एक किताब ऐसी जिसे गुजरात पुलिस छपने नहीं देना चाहती - लेखक अक्षरधाम केस में ११-साल जेल में रहा।
पुस्तक
किस
प्रसंग
में
लिखी
गयी
उसकी
पृष्ठभूमि
को
समझना
अत्यंत
आवश्यक
होगा। लेखक
के
अनुसार
घटना
देर
दुपहर
सितम्बर
२४,
२००२
की
है
जब
मुर्तज़ा
हाफ़िज़
यासीन
और
अशरफ
अली
मुहम्मद
फारूक
नाम
के
दो
बंदूकधारियों
ने
गांधीनगर
स्तिथ
अक्षरधाम
मन्दिर
के
परिसर
में
प्रवेश
करते
ही
मन्दिर
में
उपस्थित
अनुयायिओं
पर
अंधाधुंध
फायरिंग
कर
३३
भक्तों
को
शहीद
और
८६
अन्य
को
घायल
कर
दिया। नेशनल
सिक्योरिटी
गार्ड
के
जवानो
ने
बिना
समय
गवाये
उन
दोनों
आतंकवादियों
को
मार
गिराया। तफ्तीश
से
पता
चला
की
दोनों
आंतकवादियो
का
सम्बन्ध
पाकिस्तान
आधारित
आतंकवादी
संगठन
लश्कर-ए-ताइबा
से
था।
बिना
समय
गवाये
मामला
गुजरात
की
एंटी-टेररिज्म-स्क्वार्ड
को
स्थान्तरित
कर
दिया
गया
जिसका
काम
पुरे
मामले
की
तफ़्तीश
करना
तथा
यह
पता
करना
था
की
इसमें
गुजरात
स्थित
किसी
आंतकवादी
संगठन
की
भागीदारी
भी
है
या
नहीं
परन्तु
एक
साल
के
अथक
परिश्रम
के
बाद
अ.
टी.
एस
को
अक्षरधाम
केस
में
स्थानीय
आतंकी
संगठन
की
भागीदारी
के
सबूत
नहीं
मिले।
दिनाँक
अगस्त
२८
२००३
में
पुरा
केस
श्री
जी
एस
सिंघल
की
अध्यक्षता
में
गुजरात
क्राइम
ब्रांच
को
सौप
दिया
गया। केस
प्राप्त
होने
के
कुछ
ही
घण्टो
में
श्री
डी
जी
वंज़ारा,
जोकि
भूतपूर्व
डिप्टी
इनस्पेक्टर
जनरल
पुलिस,
गुजरात
और
गुजरात
की
एंटी-टेररिज्म
स्क्वाड
भूतपूर्व
अध्यक्ष
रहे
झूठे
मुठभेड़
/ हत्या से काफी
प्रसिद्धि
प्राप्त
की,
जो
२००७
से
२०१५
तक
जेल
में
रहे
इलज़ाम
संभावित
झूठी
मुठभेड़
के
मामले,
के
द्वारा
यह
इशारे
आने
लगे।
अगले
दिन
श्री
डी
जी
वंज़ारा
ने
अक्षरधाम
केस
को
सुलझा
लेने
का
दावा
करते
हुए
यह
खुलासा
किया
की
अक्षरधाम
पर
हुआ
हमला
एक
बड़ी
अंतर-राष्ट्रिय
साज़िश
के
तहत
हुआ
एक
आतंकी
हमला
था
जिसमे
अहमदाबाद
के
कुछ
मुस्लिम
संगठन
के
शामिल
होने
के
प्रमाण
मिले
है। प्राप्त
सबूतो
और
प्रमाण
के
आधार
पर
अगस्त
२९,
२००३
में
पोटा
के
तहत
६
लोगो
की
गिरफ़्तारी
हुई। २००६
में
गुजरात
पोटा
कोर्ट
ने
६
में
से
३
लोगो
को
मौत
की
सज़ा
का
हुकुम
सुनाया
और
बाकि
३
लोगो
को
उम्र-क़ैद
का
आदेश
पारित
किया
जिसे
२०१०
में
गुजरात
हाई-कोर्ट
ने
बरक़रार
रखा। मई
१६,२०१४
को
उच्चतम
न्यायालय
ने
सभी
अभियुक्तो
को
बाइज़्ज़त
बरी
कर
दिया। मई
१६,२०१४
की
तारीख
वही
तारीख
थी
जिस
दिन
श्री
नरेंदर
मोदी
लोक
सभा
का
चुनाव
जीतने
का
जश्न
मना
रहे
थे।
क़य्यूम
जिसकी
उम्र
अब
४४
साल
के
करीब
है
जो
एक
मदरसे
में
शिक्षक
की
हैसियत
से
काम
करता
है
और
उन
६
तथाकथित
आतंकवादियों
में
से
एक
था
जिस
पर
पोटा
कोर्ट
ने
सज़ा
का
आदेश
पारित
किया
था
उसने
सर्वोच्च
न्यायलय
से
बरी
होने
के
बाद
अपने
११
साल
जेल
में
रहते
आये
बदलाव
पर
एक
किताब
लिखने
का
फैसला
किया
और
२००
पन्नो
की
किताब
लिख
डाली
जिसका
नाम
"११ साल सलाखों
के
पीछे"
रखा। इस
किताब
को
क़य्यूम
ने
उर्दू
और
गुजराती
में
लिखा
है। इस
किताब
का
केंद्र-बिन्दु
उसकी
गिफ्तारी
से
लेकर
रिहाई
तक
पुलिस
की
कारगुज़ाई
को
बयान
करता
है।
उसकी
किताब
"११ साल सलाखों
के
पीछे"
का
विमोचन
पिछले
मंगलवार
को
अहमदाबाद
में
हुआ
परन्तु
गुजरात
पुलिस
ने
कानून-व्यवस्था
का
हवाला
दे
कर
उसके
विमोचन
पर
प्रतिबन्ध
लगा
दिया। क़य्यूम
बताते
है
की
उनकी
गिरफ्तारी
के
पीछे
के
कारण
क्या
रहे,
वह
कहते
है
की
२००२
के
गुजरात
दंगो
के
बाद
वे
पहले
व्यक्ति
थे
जिन्होंने
दरियपुर
अहमदाबाद
में
नरोडा-पाटिया
और
गुलबर्गा
के
विस्थापितों
के
लिये
पहला
राहत
कैंप
लगाया
जिसमे
६००-७००
विस्थापित
थे
जो
दंगे
से
बच
कर
आये
थे
और
यहाँ
शरण
ली
थी। उस
समय
क़य्यूम
की
उम्र
लगभग
३१
वर्ष
की
थी। वो
बताते
है
की
राहत
कैंप
चलाने
के
लिये
उनके
पास
पैसे
तीन
स्रोत
से
आते
थे
१.
कलेक्टर
ऑफिस
गुजरात
सरकार
जो
६-७
रुपया
पर
व्यक्ति
देता
था
२.
गैर
सरकारी
संगठनों
के
माध्यम
से
और
३.
इस्लामिक
संगठन
जैसे
जमीअत-ए-इस्लामी।
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