रविवार, 9 अगस्त 2015

हरियाणा में दलितों का धर्मांतरण 



हरियाणा के दलितों के द्वारा धर्मांतरण का फैसला एक सराहनीय राजनैतिक पैतरा है जिसमे उन्होंने केंद्र और राज्य में बैठी राष्ट्रवादी सरकार को उनके हिन्दू राष्ट्रवाद को चुनौती दी है।
मेरा सवाल उन दलितों ने ईसाई बनने का फैसला क्यों नहीं किया जो अधिक सरल था ? शायद इन लोगो को ईसाई समुदाय का सहयोग म मिला हो, हालिया दिनों में हो रहे ईसाई समुदाय पर राष्ट्रवादियो की हमले और चर्च में हो रही तोड़फोड़ के कारण ईसाई मठादिष इस बात का जोखिम नहीं उठाना चाहते हो की उनपर किसी प्रकार का आरोप लगे और उन पर होने वाले आक्रामक हमलो में तेज़ी आये। 

वह बौद्ध धर्म अपना सकते थे जो किसी भी विवाद से परे था ? ऐसा करने से केंद्र और राज्य में बैठी सरकारों की प्रतिकिर्या नगण्य होती और उनकी पहल जाया जाती क्योकि दलितों का बौद्ध धर्म अपना लेना एक आम बात है और डॉक्टर अम्बेडकर के पदचिन्हो का अनुशरण करते हुए बौद्ध हो जाना मूल समस्या की तीव्रता को नज़रअंदाज़ करता है। 
ईस्लाम धर्म को क़बूल करना - बिना ईस्लाम की तह तक जाने एक पूरी तरह से सोचा समझा बेहतरीन और सटीक राजनैतिक पैतरा है जो की सराहनीय है। ऐसा कर उन दलितों ने समाज के हिन्दू समाज के ठेकेदारो को राजनैतिक रूप से अवश्य हिला देने में सफल रहे। 
१. बीजेपी शासित राज्य में दलितों की अनदेखी को उजागर करना 
२. न्याय में विलम्भ को उजागर करना 
३. खट्टर विरोधी खेमे को बल देना 
४. आरएसएस की चिंता को बढ़ाना 
५. धर्मांतरण का ऐलान जन्तर-मन्तर से कर अंतरराष्ट्रीय मीडिया को अपनी ओर आकृषित करना इत्यादि। 
मुस्लमान खुश है उसकी आबादी बिना कुछ किये बढ़ गयी, बढ़ी है तो जाओ उनकी लड़ाई को साझा लड़ाई की तरह आगे बढ़ाओ और उनकी बच्चियों के बलात्कारियो को अन्जाम तक पहुचाओ।

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